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नेपाल में सम्पन्न चुनाव पर भारतीय प्रधानमंत्री का ट्विट : प्रवीण नारायण चौधरी

 

प्रवीण नारायण चौधरी, विराटनगर । इस वर्ष २०८२ (विक्रम संवत साल) में नेपाल में कई आशंकाओं-दुविधाओं के बीच सुशीला कार्की नेतृत्व में गठित नागरिक सरकार द्वारा वृहत् लोकतांत्रिक अभ्यास को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है । इस मौके पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ट्विट करके बधाई देते हुए इस चुनौतीपूर्ण लेकिन महान लोकतांत्रिक अभ्यास को पूरा करने पर प्रसन्नता जाहिर की गई है । साथ ही आनेवाले दिनों में नेपाल की नई सरकार के साथ भी सहयोग का वचनबद्धता भी व्यक्त किया गया है ।

२०७२ साल संविधान जारी होने से कुछ ही पहले भारत सरकार का विशेष दूत तत्कालीन विदेश सचिव एस. जयशंकर (वर्तमान विदेश मामला मंत्री, भारत सरकार) को भेजकर देश में व्याप्त असन्तोष के बीच संविधान जारी करना देशहित में नहीं होने का राजनयिक सन्देश दिया गया था। इसके बावजूद भी भारत की इस सलाह को दरकिनार करते हुए यहाँ के प्रमुख राजनीतिक दलों और नेताओं ने संविधान जारी कर दिये थे । उल्टा भारत को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम किया गया था । भारत हस्तक्षेपकारी भूमिका करती है यह भाष्य स्थापित करने का अथक चेष्टा किया गया था । कई तरह की भारत विरोधी भावनाओं को भड़काकर अपना-अपना सत्तारोहण का मार्ग प्रशस्त करने में लग गये थे यहाँ के राजनीतिक आका और खुद को महान राष्ट्रवादी समझनेवाले पैरोकार लोग ।

भारत विरोधी भावनाएं – नाकाबन्दी आदि का आड़ लेकर नेपाल-भारत सम्बन्ध को गर्त में पहुंचाकर राज्य संचालन करने का दम्भ भरा जाने लगा था ।

कभी असल अयोध्या नेपाल में कहकर तो कभी अपना नक्शा में सीमा विवाद के तहत की भूभागों को वगैर द्विपक्षीय सहमति-समझौते का एकतरफा रूप से जोड़कर सदन में सर्वसम्मति से पास कराके, कभी भारत के विरोध में अन्तर्राष्ट्रीय अदालतों में जानेवाली धमकी देकर – विभिन्न ढंग से एक प्राकृतिक न्याय के अथक सहयोगी को धौंस देते हुए खोखली रणनीति से नेपाल का हित देखते-दिखाते यहाँ के राजनीतिक दलों को आखिरकार १० वर्ष (२०७२-२०८२) के दरम्यान खुद के जनता की दृष्टि में नक्कारा-नपुंसक शक्ति सिद्ध करते हुए नेपाल में पूर्ण बहुमत की सरकार गठन होने पर यह बधाई सन्देश काफी अर्थपूर्ण लग रहा है । कम से कम अब भी समझें नेपाल के हितचिन्तक लोग । देशहित में नेपाल-भारत मैत्री के अतिरिक्त अन्य कोई भू-राजनीतिक हितचिन्तन कारगर नहीं हो सकती ।

याद करें १० वर्षों पर क्रान्ति और परिवर्तन की सिलसिलाओं को

विगत कुछ दशकों के नेपाली राजनीति और अग्रगामी परिवर्तन के नाम पर होनेवाली क्रान्ति का इतिहास देखते हुए ‘१० वर्ष’ का प्रभाव एवं परिणाम को समझना अत्यन्त जरूरी है ।

नेपाल में प्रत्येक १० वर्ष में एक न एक महत्वपूर्ण परिवर्तन होता आ रहा है । याद करें – २०४७ में बहुदल व्यवस्था लागू हुआ, २०४८ में चुनाव हुआ, नेपाली कांग्रेस बहुमत प्राप्त की । फिर क्या हुआ नहीं हुआ, २०५१ में ही मध्यावधि चुनाव हुआ । इस बार एमाले ने सरकार गठन किया । लेकिन प्रधानमंत्री बदलते रहना, स्थिति हमेशा ढुलमुल रहना, एक-दूसरे को लछाड़ते-पछाड़ते रहने का अजीबोगरीब राजनीतिक खेल चलते रहा ।

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इसी बीच माओवादी द्वारा जन क्रान्ति आरम्भ होते हुए २०५६ में तीसरा चुनाव हुआ और २०५८ में राजा विरेन्द्र की सपरिवार हत्या (दरबार काण्ड) उपरान्त ज्ञानेन्द्र शाह का राजा बनने के बाद एक बार फिर से शासकीय स्वरूप में दलों की मान्यता घटी । राजा एक्जिक्युटिव पावर अपने हाथ में लेकर देश चलाने की कोशिश किये ।

पंचायतकालीन व्यवस्था अनुरूप उन्होंने वही कार्य आरम्भ किया जो कभी उनके पिता राजा महेन्द्र ने २०१७ में किये थे । फागुन ७ गते से आरम्भ हुआ प्रथम लोकतांत्रिक चुनाव ४५ दिन में चरणबद्ध रूप से चैत २८ गते २०१५ के दिन पूरा होने के बाद २०१६ के वैशाख २८ गते तक गिनती पूरा करके सरकार गठन किया गया था । परन्तु इसके कुछ ही दिनों बाद राजा महेन्द्र ने २०१७ में दलविहीन पंचायती व्यवस्था लागू कर दिये और सारे दल तकरीबन ३० वर्ष तक अमान्य बनी रही । लेकिन २०४६-४७ के जनआन्दोलन के परिणामस्वरूप नेपाल में दूसरी बार बहुदल प्रजातंत्र वाली नया संविधान के अन्तर्गत पहली बार वैशाख २९ गते २०४८ को चुनाव कराया गया ।

राजा ज्ञानेन्द्र के कार्यकाल में स्थानीय निकाय में जनप्रतिनिधि चुनने के लिये एक चुनाव कराया गया था, जिसमें कई मुख्यधारा पार्टी शामिल नहीं हुई थी, उन्होंने उसका बहिष्कार किया था । मुझे याद है कि कई नये चेहरे बिना महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धा का चुनाव जीत गये थे, पदभार भी ग्रहण किये थे, पर उनका महत्व और योगदान कहीं गणना योग्य भी नहीं हो पाया ।

इसी बीच दूसरा जनआन्दोलन आरम्भ हुआ और २०६२ में राजतंत्र की व्यवस्था ही समाप्त हो गया । २०६३ के अन्तरिम संविधान अनुसार चैत २८ गते २०६४ में संविधान सभा गठन करने के लिये आम निर्वाचन हुआ । विदित ही है कि यह संविधान सभा अपने कार्यकाल को २ वर्ष के बदले ४ वर्ष तक करने के बावजूद भी संविधान जारी नहीं कर पाई थी और इसे विघटन कर दिया गया था ।

फिर एक अन्तरिम सरकार जो न्यायपालिका के न्यायाधीश की अगुवाई में नेपाल के ब्यूरोक्रेट्स लोगों को शामिल करके बनाया गया था उसी के द्वारा २०७० साल के मंसीर महीने में चुनाव कराया गया । और इसी संविधान सभा ने आखिरकार २०७२ साल में विभिन्न विरोध और असन्तोष के बावजूद नेपाल का नया संविधान आश्विन ३ गते २०७२ के दिन जारी कर दिया ।

नया संविधान के आलोक में पहली बार २०७४ के मंसीर १० और २१ गते दो चरणों में चुनाव कराया गया । नया संविधान – नया जनादेश में किसी एक दल को पूरा बहुमत नहीं मिलने पर गठबन्धन और विभिन्न दलों के समर्थन से सरकार बनाने का सिलसिला चलने लगा । २०७९ साल के मंसिर में फिर दूसरा चुनाव कराया गया । जनादेश फिर से मिश्रित, हालांकि इस बार प्रि-पोल एलायन्स में नेपाली कांग्रेस के साथ माओवादी मिलकर चुनाव लड़ी, पर चुनावी परिणाम के तुरन्त बाद माओवादी प्रमुख प्रचण्ड ने पाला बदलकर एमाले के समर्थन से खुद प्रधानमंत्री बनकर नया सरकार गठन किये ।

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इस प्रकार गठबन्धन धर्म ठीक से न निभाने, पद के लिये स्वार्थलोलुपता और होड़बाजी में नेपाल फँसती चली गई, जनता में आक्रोश और असन्तोष व्याप्त होते चला गया और परिणाम जेन-जी आन्दोलन और संसद का विघटन करके फिर से सुशीला कार्की के नेतृत्व में नागरिक सरकार गठन करके अभी २०८२ में मध्यावधि चुनाव कराया गया है । इस मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रिय स्वतंत्र पार्टी अपार बहुमत के साथ जनादेश प्राप्त की है ।

अब देखना ये है कि यह ‘स्वतंत्र’ कहलानेवाली – यानि पुराने नीतिकारों से खुद को अलग और जनता के लिये नया विकल्प देने का दावा करनेवाली दल सरकार गठन करने का प्रथम जिम्मेदारी ‘मधेशी प्रधानमंत्री’ का वादा पूरा करती है और शासन व्यवस्था चलाने के लिये समय अनुसार नीति-नियम बनाकर जनाकांक्षाओं को पूरा करके चलती है; या फिर देश को वही प्रत्येक १० साल पर परिवर्तन की क्रान्ति ही करते रहने को बाध्य करती है । यह देखना बाकी है ।

एक हैरान करनेवाली सत्य

मेरे स्मरण में ‘मधेशी प्रधानमंत्री’ नेपाल में समान राष्ट्रियता की भावना को विकसित करनेवाली एक प्रचलित भाष्य (नैरेटिव) कई वर्षों से विमर्श में है । यहाँ के एकल भाषाभाषी और उसमें भी किसी खास जाति-समुदाय के लोग ही प्रधानमंत्री बनते आ रहे हैं, भले वो कितना भी असफल और अदूरदर्शी निर्णय क्यों न करें, पर अपनी ही जाति-विरादरीवाले अन्य सभी लोगों का साथ ले-लेकर आजतक अन्य एथनिक आइडेन्टिटी वालों को सत्ता के शीर्ष पर आने तक नहीं दिया – यह भाष्य हर व्यक्ति के मन में स्थापित थी ।

ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राजनीतिक दल ने अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार एक मधेशी चेहरा को बनाया । वो भी ऐरू-गैरू को नहीं बल्कि जिसने अपना विजन और मिशन देश के हित में स्थापित किया था उसको आगे लाकर अपार जनसमर्थन अपने पक्ष में कर लिया राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने । जो व्यक्ति काठमांडू का मेयर पद पर एक स्वतंत्र उम्मीदवार बनकर निर्वाचित हुआ था और जिसने मधेशी-पहाड़ी नस्लीय पहचान नहीं बल्कि सत्ता संचालन करने की वास्तविक बुद्धिमत्ता व कौशल का प्रदर्शन खुलकर किया, उस ‘बालेन साह’ को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा गया ।

इसका प्रभाव आम जनमानस में काफी बड़ा उत्साह पैदा किया यह अकाट्य सत्य है । कम से कम मधेशी समुदाय के लोगों का पूर्ण समर्थन हासिल करने का दाँव तो एकदम सटीक प्रभाव उत्पन्न किया । पहाड़ी समुदाय के लोगों में यथास्थितिवादी राजनीतिक शक्तियों के प्रति उनके खोखले वादा एवं सदा-सदा की उग्र राष्ट्रवादी बातों से पेट नहीं भरता समझ जाना बहुत बड़ी बात हुई । इस बीच नये पीढ़ी के युवाओं ‘जेन-जी’ द्वारा वीभत्स क्रान्ति को सबों ने देखा था । पुराने लोगों से ऊब चुके अपार संख्या के मतदाताओं ने उम्मीदवार को देखा तक नहीं, बस ‘घन्टी-घन्टी’ सभी के मन-माथे में हावी रही ।

नेपाल के हित का चिन्तन एकल नस्ल और अन्य के प्रति नस्लीय भेदभाव का अनेकों खुलेआम प्रदर्शन करनेवाले को २०८२ चुनाव का जनादेश बिल्कुल नकार दिया है । मधेशी प्रधानमंत्री को प्रचण्ड जनादेश देकर सचमुच नेपाल बहुजाति-बहुधार्मिक-बहुभाषा की सम्प्रभुतासम्पन्न राष्ट्र है और इसके राष्ट्रीयता प्रति मधेशी सहित सभी लोगों के मन में समान भावना है, इन जनादेश एक ‘मील के पत्थर’ बनकर यह साबित कर दिया है । आगे पहाड़ी-मधेशी पहचान नहीं, बल्कि नेपाली पहिचान, नेपाल देश के प्रति सभी का समर्पण दिखेगी । देश प्रगति के मार्ग पर बढ़ेगी ही ऐसा जनादेश दिया गया है । इसके विरूद्ध जानेवालों को देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी यह सुनिश्चित है ।

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भय-आशंका की स्थिति

पूर्व में दिखाये गये कई चरित्रों के कारण दुविधा की स्थिति अभी भी बनी हुई है । कई लोग यही मान रहे हैं कि बालेन साह को मधेशी प्रधानमंत्री के रूप में कुछ लोग नहीं पचा पायेंगे । असहयोग और असहिष्णुता जैसी वाकयाएं घट सकती है । और संसद विघटन का, पद से अपदस्थ करने का, कई तरह से घेरकर किसी के राजनीति व चरित्र का हत्या करने का, स्वार्थ के पदों की प्राप्ति के लिये अनेकों हत्याकाण्ड करने जैसा अनेकों घटनाओं से भरी पड़ी नेपाल की इतिहास आगे सब कुछ सहजता से सुखद और समृद्धि की ओर ले जाएगा ऐसा कह पाना मुश्किल लग रहा है ।

नेपाल में सर्वाधिक महत्व आर्थिक विकास के मुद्दों को देना ही होगा

‘भूखे भजन नहि होहि गोपाला’ – यह स्थानीय कहावत को सभी लोग समझें । भारत और चीन जैसी विकसित अर्थतंत्रों के बीच नेपाल ‘दलित राष्ट्र’ बनकर अन्य राष्ट्रों के अनुदान पर जीनेवाली राष्ट्र, आरक्षण पाकर सर्वाइव करने और फिर विकास की ओर बढ़नेवाली अम्बेदकरवादी सोच, सामाजिक न्याय और समाजवाद का झूठा जामा पहनकर और केवल अलंकारिक शब्दाडम्बरों में उलझकर-उलझाकर देश की प्रगति देखनेवाली सोच अब नहीं चल सकती । भारत के हिमालयी राज्यों के तर्ज पर, भुटान एक हिमालयी राष्ट्र के तर्ज पर, प्रतिस्पर्धी बाजार में ‘नेपाली उत्पादों’ को अलग स्थान (स्पेस) और संवर्द्धन दिलाकर ही नेपाल के लोगों में खुशहाली आ सकती है । इसे समझना होगा ।

नेपाल में निवेशकों के लिये खास नीति बनानी होगी । वैदेशिक लगानी वगैर आकर्षक पैकेज का कभी नहीं बढ़ सकता है, तो ऐसी औद्योगिक नीतियों और प्रदेश-प्रदेश का अलग से निवेशकों के लिये सुविधा देनेवाली स्वायत्तता देकर ही इस क्षेत्र में कुछ उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती है । टैक्स स्ट्रक्चर भी भारत और चीन के तुलना में जटिल और भारी बोझिला बनाने से यहाँ पर निवेशकर्ता कैसे आएंगे ? नेपाली उत्पादनों के लिये वैदेशिक बाजार आवश्यक है, सिर्फ नेपाल के लोग विदेश में श्रम बेचकर वैदेशिक मुद्रा आर्जन कर लेने से राष्ट्र की आर्थिक प्रगति भला कैसे होगी ? इन्हीं कुछ महत्वपूर्ण विन्दुओं पर मन्थन करते हुए आन्तरिक भ्रष्टाचार को कैसे नियंत्रण में किया जा सकता है, नयी सरकार इन चीजों पर ध्यान दे । हरिः हरः!!

प्रवीण नारायण चौधरी
समीक्षक, विराटनगर।

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