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गगन थापा का इस्तीफा: नैतिक जिम्मेदारी या राजनीतिक रणनीति ?

 

हिमालिनी डेस्क, 19 मार्च 026। नेपाल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। द्वारा चुनाव में अप्रत्याशित हार के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से दिया गया इस्तीफा अब नए राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उन्होंने इस्तीफा क्यों दिया, बल्कि यह भी है कि क्या यह इस्तीफा वास्तव में स्वीकार होगा या फिर यह महज़ एक राजनीतिक दांव है।

सूत्रों के अनुसार, थापा ने अपनी “नैतिक जिम्मेदारी” स्वीकार करते हुए उपसभापति को इस्तीफा सौंप दिया है। हालांकि, पार्टी ने अभी तक इसे सार्वजनिक नहीं किया है। आगामी केन्द्रीय कार्यसमिति बैठक में इस पर औपचारिक चर्चा होने वाली है, जहां यह तय होगा कि इस्तीफा स्वीकार किया जाए या वापस कराया जाए।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम थापा की छवि को मजबूत करने की कोशिश भी हो सकता है। चुनाव में पार्टी की करारी हार—सिर्फ 38 सीटों तक सिमटना—और स्वयं सर्लाही–4 से हारने के बाद उन पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक था। ऐसे में इस्तीफा देकर उन्होंने नैतिकता का संदेश तो दिया है, लेकिन इसके पीछे रणनीतिक सोच से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के भीतर ही दो तरह की धारणा बन चुकी है। एक पक्ष मानता है कि थापा को जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ देना चाहिए, ताकि पार्टी नए नेतृत्व के साथ आगे बढ़ सके। वहीं, दूसरा पक्ष उन्हें अभी भी परिवर्तनकारी नेतृत्व के रूप में देखता है और चाहता है कि वे इस्तीफा वापस लें और संगठन को मजबूत करें।

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इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में वह विशेष महाधिवेशन भी है, जिसके जरिए थापा नेतृत्व में नई कार्यसमिति बनी थी। उस समय और उनके गुट ने इसका विरोध किया था, जिसका मामला अभी भी अदालत में विचाराधीन है। ऐसे में थापा का इस्तीफा पार्टी के भीतर पुराने और नए गुटों के बीच शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या केन्द्रीय कार्यसमिति थापा का इस्तीफा स्वीकार करेगी, या फिर “पार्टी एकता” के नाम पर उन्हें वापस नेतृत्व में बनाए रखा जाएगा?

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राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ इस्तीफा नहीं, बल्कि एक “टेस्ट केस” मान रहे हैं—जहां से यह तय होगा कि नेपाली कांग्रेस नैतिकता की राजनीति को प्राथमिकता देती है या व्यावहारिक सत्ता संतुलन को।

आने वाले दिनों में होने वाली कार्यसमिति बैठक न सिर्फ थापा के भविष्य का फैसला करेगी, बल्कि पार्टी की दिशा और दशा भी तय करेगी।

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