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निधि की चेतावनी, कहा प्रदेश निर्माण के नाम पर तानशाह बनना उचित नहीं, सत्ताधारियों में बैचेनी

 
बिमलेन्द्र निधि
बिमलेन्द्र निधि

श्वेता दीप्ति , काठमांडू ,१७ अगस्त ०१५| आन्दोलित जनता को सम्बोधन करने के लिए अब तक सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया हैं और न ही उन्हें वार्ता के लिए बुलाया जा रहा है । गैरों की क्या सरकार तो अपनों की भी नहीं सुन रही है, आखिर यह कौन सी रणनीति या राजनीति है ? क्या चन्द चेहरों में ही पार्टियाँ सिमट गई हैं ? एक नेता जनता से आगे कैसे निकल सकता है जबकि वो जनता की वजह से ही सत्ता में आता है ? सुर्खेत, कर्णाली, थरुहट में हो रहे विरोध को सम्बोधित करने के लिए बुलाई गई बैठक देउवा जी की हठवादिता के कारण बीच में ही स्थगित हो गई । संवेदनशील माहौल में भी इनके गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य जारी हो जाते हैं । इससे तो यही लगता है कि ये देश के नेता नहीं हैं बल्कि प्रदेश विशेष के हैं । जिन्हें सिर्फ एक क्षेत्र की चिन्ता है ऐसे में इन्हें राष्ट्रीय नेता कहा जाय या नहीं सवाल यह भी उठता है ।

ऐसे मौके पर ही एक बार फिर काँग्रेस नेता एवं भौतिक पूर्वाधार तथा यातायात मंत्री विमलेन्द्र निधि जी अपनी प्रधानमंत्री के नाम लिखी सात पृष्ठों की चिट्ठी के कारण चर्चा में आ गए हैं । माना जा रहा है कि इस चिट्ठी ने सत्ताधारियों में बैचेनी पैदा कर दी है । विमलेन्द्र जी का काँग्रेस पार्टी में एक महत्वपूर्ण कद रहा है । पार्टी में इनकी एक अलग पहचान है । इस स्थिति में अगर पार्टी इनकी बातों का नजरअंदाज करती है तो यह कोई अच्छा संकेत नहीं होगा देश के लिए । निधि जी ने समय समय पर अपना विरोध जताया है किन्तु उनके विरोध को सरकार अनदेखा करती आई है । इस स्थिति में वर्तमान की चिट्ठी को सरकार कितना महत्व देती है यह देखना है । देश अभी जिस तरह हर तरफ से असंतोष की आग में जल रहा है, ऐसे में इस चिट्ठी को जनता की आवाज के रूप में लिया जा सकता है । किन्तु आलम तो यह नजर आ रहा है कि सरकार को न तो जनता की फिक्र है और न ही बन्द से हो रहे आर्थिक हानि की । रोज के राजस्व घाटे पर भी सरकार का ध्यान नहीं जा रहा । अनिश्चितकालीन बन्द से देश और जनता जिस बदहाली से गुजर रही है उसे सम्बोधन करने के लिए फास्टट्रैक नहीं दिख रहा किन्तु संविधान फास्ट ट्रैक से लाने के लिए सत्ता पक्ष प्रतिबद्ध है । प्रहरी का दमन जारी है, गोलियाँ चल रही हैं, आम जनता कराह रही है किन्तु इनकी ओर से जिस सम्बोधन की आवश्यकता जनता महसूस करना चाह रही है वो गौण है । न तो प्रधानमंत्री की और न ही गृहमंत्री की ओर से कुछ होने के आसार नजर आ रहे हैं ।

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निधि जी ने अपने पत्र में संविधान में निहित लगभग हर पक्ष पर ध्यानाकर्षण कराया है । सीमांकन के सवाल पर उन्होंने अपने पूर्व के विचारों को फिर से जाहिर किया है । उनका मानना है कि विकास क्षेत्र, अंचल, जिला, नगरपालिका, गाविस के विद्यमान सीमाओं को भूलकर सहमति हुए १६५ निर्वाचन क्षेत्र का सीमा निर्धारण करें और उस निर्धारण को करने के लिए २४० निर्वाचन क्षेत्र के सीमा के लिए जो मापदण्ड पहले से है उसी मापदण्ड का अवलम्बन करें । इसके बाद १६५ निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण होने के बाद प्रदेश संख्या निर्वाचन क्षेत्र संख्या में भाग कर के औसत संख्या निकालें अर्थात् एक प्रदेश में कितने निर्वाचन क्षेत्र होते हैं उसका निराकरण निकालें । और जो बाकी शेष संख्या हैं उसे एक दूसरे में अनुकूल रूप से व्यवस्थित करें और प्रदेशों का निर्माण करें । साथ ही जनता की भावनाओं का ख्याल रखें कि वो किधर रहना चाहते हैं उनकी इच्छा का सम्मान करें ।

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निधि जी ने सत्ता के प्रति अपने विरोध को स्पष्ट रूप से जताया है । उन्होंने सत्ता को यह चेतावनी भी दी है कि प्रदेश के निर्माण के नाम पर केन्द्र का तानशाह बनना उचित नहीं होगा । नागरिकता सम्बन्धी मसले पर भी उन्होंने स्पष्ट कहा कि अंगीकृत नागरिकता का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि हमारी संस्कृति में शादी के बाद औरत का सबकुछ उसका पति का घर होता है ऐसे में उन्हें अंगीकृत कहना उनकी अस्मिता के ऊपर प्रहार है । उन्होंने गैर नेपाली परुष नागरिकों के लिए भी उदारता की अपेक्षा की है । नागरिकता के प्रावधान में नेपाली मूल पर भी अपना विरोध जताते हुए कहा है कि मूल शब्द को हटाया जाना चाहिए ।

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समावेशी के लिए भी उनकी धारणा है कि समावेशी का विषय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक संविधान में सुव्यवस्थित होना चाहिए । कर्णाली, दलित, महिला, जनजाति, मधेशी, मुस्लिम, अल्पसंख्यक इन सबको राज्य की हर संरचना में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए । न्यायपालिका और संवैधानिक अंग और निकायों में स्वतन्त्रता और स्वायत्तता होनी चाहिए ।

अर्थात् सभी संवेदनशील मुद्दों पर उन्होंने सम्बद्ध पक्ष का ध्यानाकर्षण कराया है परन्तु सवाल यह उठता है कि सत्ता पक्ष का इस ओर ध्यान कितना जाता है । निधि का यह पत्र सिर्फ प्रधानम्रत्री के नाम नहीं है बल्कि संविधान निर्माताओं सभी के नाम है । खैर जो भी हो आन्दोलनकर्ताओं के लिए भी यह पत्र उर्जा का काम अवश्य करेगा और इससे आन्दोलित मधेश को काफी सहयोग मिलेगा ।

श्वेता दीप्ति
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