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हम एैसें है एैसे ही रहेगें : डा.अशोक महासेठ

 

हम एैसें है एैसे ही रहेगें

डा. अशोक महासेठ, काठमांडू, 22 मार्च 926। इस शीर्षक को देखकर पढने बाले को मन में भाव उठ सकता है कि कैसा बकवास शीर्षक रखा है । एैसा भी होता है क्या ? परन्तु थोडी धैर्य करके पढेगें तो इस लेख में बहुत सारी जीवन से जुडी हुई महत्वपूर्ण बाते समझ में आ सकती है ।

 जी हाँ हम एैसे है एैसे ही रहेगें । यह एक दिन एक महिने या एक बर्ष या एक जन्म की बात नहीं है । यह तो अनन्त काल से चलता आ रहा है ।

हम आत्मा है जो शाश्वत , सनातन, सत्य है । जिसका कभी न जन्म न मत्यु होता है । शरीर का जन्म और मृत्यु होती है । हिन्दु दर्शन ये कहता है कि आत्मा ८४ लाख प्रकार के शरीर मे भटकता रहता है । बडे भाग्य से मनुष्य शरीर मिलता है । श्री कृपालु जी महाराज कहते है यह वर्तमान सृष्टि हेै जो मैथुन के द्वारा विस्तार हुआ है । ब्रह्मा ने सृष्टि की जिसमे पहले सनकादीक महापुरुष हुए परन्तु वे लोग बाबाजी बन गए । सृष्टिका विस्तार इनसे नही हुआ । तब ब्रह्मा ने अपने दाँये अंगसे मनु तथा बाँये अंगसे सत्यरुपा को प्रगट किया इन दोनो के मैथुन से ही सृष्टिमे मनुष्य की संख्या बढने लगी । इसलिए इसे हम मैथुनका सृष्टि कहते है ।

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अब हम थाडी सी संख्या दर्शन की उल्लेख करें–२६ तत्वो से यह संसार बना है । वे है ः– जीव(आत्मा) ं परमात्मा–२, प्रकृति, महान, अहंकार–३, कर्मेद्रिय, ज्ञानेन्द्रिय और एक मन –११, पंचमहाभुत–५, पंचतन्नमात्र–५ कुल मिला के २६ । इसमे आत्मा और परमात्मा को चेतन कहा गया है । बाँकी २४ तत्व अर्थात प्रकृतीको जड कहा गया है । परन्तु भगवान की शक्ति पा कर जड तत्व भी कृयाशील है जिसे महसुस किया जाता और सत्य की तरह होती है और दिखाई देती है । जब कि यह नश्वर है और अनित्य है । प्रलय के वाद भगवान की इच्छा से पहले प्रकृति प्रकट हुई इसका प्रथम विकार महत्व है जिसे बुद्घि भी कहा जाता है । तब दुसरा विकार उत्पन्न हुआ अहंकार । यही अहंकार तत्व जो हमारे भीतर मौजुद है जिससे हमे मैं की भावना उत्पन्न की है अर्थात मैं हुँ । इसका अर्थ है मैं दुसरे से भिन्न हुँ खुदको खास दिखाने की कोशिश है । मैने ऐसा किया, मेरा विचार, मेरी मान्यताएं ये सब अहंकार का ही रुप है इसीका फैलाब है हम बस्तु से, विचारो से, अपनी पहचान जोड लेते है । मेरा अस्तित्व अलग है । यही तत्व है जो हमे दुसरे से मिलने नही देता है । अलग रखता है । जिससे हम अशान्त, अतृप्त बने रहते है । मिलने का अर्थ हुआ जैसे पानी मे चीनी घुल जाता है । चीनी की अस्तित्व नही रहता है । परन्तु पानी मे उसकी उपस्थिति रहती है जो हमे स्वाद से मालुम होता है । हमलोगोकी बीच कि भिन्नता एकदिन शुरु हुआ एैसा नही है यह अनादि काल से है । यानि जब से हम तब से भगवान और तब से प्रकृति । कोई एक दुसरे से क्भलष्यच नही है । अर्थात यह तीन तत्व सदा से है ।

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यही अहंकार हमें संगठित नही होने देता है । हमारी बीच मतभिन्नता होता है । हम विखर जाते है, कमजोर हो जाते है, अहंकार ही अज्ञान है और सृष्टि की विविधता का मूल कारण है । हम सभी बेचारा है । यह हम लोगो के बश की बात नहीं है । इसलिए लेखक कहता है कि हम एैसे है एैसे ही रहेगें । प्रकृति के तीन गुण सत्व, रज और तम । इन ही तीनो गुणी की सहायता से जगत की स्थिति, उत्पत्ति तथा संहार की अवस्थाए आती है ।

अब हम शारीरिक उपनिषदकी चर्चा करेगें इस शरीर में आत्मा निवास करती है । पंच महाभुतो से शरीरका निमार्ण हुआ है । वे है पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश । इन्ही पाँच महाभुतो के अलग–अलग अनुपात मे मिलने से यह जटिल मानव शरीर बनता है । इन्ही पाँच मौलिक शक्तियों का एक गतिशील मिश्रण है । आकाश तत्व से हमारी कुछ मुख्य भावनात्मक और मानसिक वृत्तियँ प्रगट होती है । जैसे काम यानि इच्छा, क्रोध, लोभ, मोह और भय । ये सभी हमारे भाव से जुडे है ।

प्रकृतिक तीन मौलिक गुण है सत्व, रजस और तमस । यह तीनो गुण प्रकृति के स्वभाव है । हर व्यक्ति मे हर चिज मे यह तीनो गुण अलग–अलग मात्रा मे मौजुद होते है । यही हमारे चरित्र, हमारे व्यवहार और भाग्यको तय करता है ।

अधिकाशं लोग गृहस्थ आश्रम मे अपना जीवन जी रहे है । इस जीवन में रजोगुण का प्रभाव अधिक पडता है । इस गुण के कारण ही हममे क्रियाशीलता, कामना, आसक्ति और बेचैनी होती है । इसमें मैं करने वाला हुँ, मैं भोगने वाला हुँ । इस तरह का अहंकार और अभिमान बहुत होता है । मैं मेरा वाला भाव, कर्म फल की इच्छा रखना, यश की कामना, लगातार कुछ न कुछ करते रहने की प्रवृति । यह सव राजसिक स्वभाव है । इसका फल है । पृथ्वी लोक मे बार–बार जन्म लेना है । अतः हमलोग प्रकृति के गुणो को गुलाम है और बेचारा बन गए है ।

अब हम न्याय दर्शन की कुछ चर्चा करे ।

हर सवाल को कोइ न कोई उत्तर है, उत्तर के पीछे कोई उत्तर है । हर उत्तर के पीछे छुपा है तर्क । हम सही को सही कैसे माने, गलतको गलत कैसे पहचाने और जब दो विचार टकराते है तो फैसला कौन करता है । सत्य किसके पास है । मन कैसे सोचता है, गलतियों कैसे करता है और उन गलतियो को दुर करने के लिए किन उपकरणो की आवश्यक्ता है । न्याय दर्शन हमें सोचने की कला सिखाता है । मनुष्य की सोचो को सही दिशा देने के लिए चार स्तंम्भ आवश्यक है वह है प्रमाण, प्रमाण्य, तर्क और खंडन । मनुष्य के मन मे अनेक प्रकार की गलतियँ होती है जिन्हे पहचानना और दुर करना आवश्यक है । इन गलतियो को भ्रम, विपर्याय, संदेह, और अव्यवस्था जैसे शब्दो सें परिभाषित किया गया है । यदि मनुष्य अपनी सोच की गलतियों को न पहचाने तो वह सत्य को कभी नहीं पहचान सकता है । यही व्यक्तिका व्यक्तिगत न्याय है । सोचो पर सही तरिका से सोचो, देखो पर सही तरह से देखो, जानो पर सही तरह से जानों । यही न्याय दर्शन है । पुरी दुनिया मे सिर्फ दो चिजोका खेल है एक देखने वाला एक दिखाने वाला । कार्य जो भााभअत है वो अपनी कारण यानि अबगकभ मे पहल से मौजुद होता है । वस उसमे छुपा होता है । कुछ भी नँया नही होता है । सिर्फ जो अव्यक्त है वह व्यक्त हो जाता है ।

वेद कहता है कि मनुष्य ५ चिज चाहता है वह है जीवन चाहता है अर्थात कभी मृत्यु नही चाहता है, स्वतन्त्रता चाहता है ऐसा कि कोई भी मुझे रोके तथा टोके नहीं । जाने अंजाने मे कुछ न कुछ सीखता रहता हे जैसे अभी आप इस लेखको पढेगें तो अवश्य ही कुछ सीखेगें । वह हमेसा आनन्द चाहता है ऐसा कि जो कभी घटे नहीं । अर्थात सदा के लिए आनन्द चाहता है और अंत मे वह चाहता है कि मेरी बाते हर कोई माने अर्थात सब पर शासन करना चाहता है । यह संसारकी युद्घ का मूल कारण है । व्यक्ति–व्यक्ति के बीच के असमझदारीका मुल कारण है । यही से सब गडबडियँ पैदा होती है । दुसरी गडबडी है हम मानते नही है । यह एक विमारी है जबतक हम मानेगें नही तो जानेगें कैसे ? जब जानेगें नही तो पाएगें क्या ? हम भगवान के नित्य दास है जो सदासे दास है वो इस संसार मे आकर अपने को मालिक बन बैठता है । जैसे देशकी सेवा कि लिए प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति बनता है तो अपने मे सेवा भाव नही रखकर शासक बन जाता । मालिक समझने लग जाता । वैसे ही किसी संघ संस्था का अध्यक्ष भी अपने को सेवक नही मानकर हम बडे है कि भाव वनालेता है और उन्हे एचयतयअब िकी विमारी लग जाती है । संघ संस्था समाजकी सेवा के लिए बनाई गई । सेवा करने बाले को सेवक कहा जाता है न कि समाज का मालिक या ठेकेदार । सहकार्य बराबरी मे होती है । जब कि यथार्थ यह है कि मेरा शरीर भी मेरा नही है । यह भी नश्वर है एक दिन राख बन जाता है । शरीर को मै की भाव बना रखा गया है । पहचान के कपडे पहन रखे है, विचारो के कपडे, भावनाओ के कपडे पहन रखे है । यही सब तो अहंकार का प्रदर्शन है ।

लेखक भागवत महापुराण की कुछ उल्लेख करना चाहता है । भागवत के एकादश स्कन्ध मे है जो पुरुष दुसरे के स्वभाव और उनके कर्मो की प्रशंसा अथवा निन्दा करते है के शीघ्र ही अपने यथार्थ परमार्थ साधन से च्युत हो जाते है । दुसरे शब्दो मे कही राग हो या द्वेष हो यह दोनो ही धोखा है । लेखक मात्र कुछ वास्तिविकता को सरलीकरण करने का प्रयास किया है जो हमारे जीवन मे घटती रहती है । इसलिए लेखक ने इस लेखका शीर्षक रखा है हम एैसे है एैसे ही रहेगें । लेखक किसीको दोषी नही समझता है ।

अतः अंतमे लेखक का कहना है कि जीवन को और उचाई पर ले जाने के लिए सत्यसंग, ध्यान और तप तथा किसी सदगुरु के बताए हुए साधना करे । मनुष्यका जीवन बहुत ही सुदंर है । इसका प्रमुख उदेश्य है भगवत साक्षातकार करना । हम इस संसार मे किसी की सेवा करले यह भी इस जीवन की उपलब्धि है । धन्यवाद ।

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डा. अशोक माहासेठ, काठमांडू

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