गच्छदार की नई रणनीति, फिर से तीन बड़े पार्टी के कित्ते मे जाने को बाध्य : कुमार अमरेन्द्र

काठमांडू,२४,अगस्त ,२०१५ |मधेशी मोर्चा के नेताओं के बीच अपनी दाल गलती असम्भव देखकर मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिक के अध्यक्ष विजयकुमार गच्छदार फिर से तीन बड़े पार्टी के कित्ते मे जाने को बाध्य हो गए हैं ।
पहले ६ और फिर ७ प्रदेश के संघीय प्रारुप मे तीखी असहमति दर्ज करने के बाद अध्यक्ष गच्छदार ने गत शुक्रवार को कांग्रेस, एमाले और एमाओवादी का साथ छोड़ते हुए आन्दोलन मे जाने की घोषणा की थी ।
उन के अपने स्वार्थ अनुरूप पूर्वी मधेश में झापा से सिरहा तक एक अलग प्रदेश बनाने का उनका प्रस्ताव तीन बड़े दल के नेताओं द्वारा अस्वीकार कर देने के बाद चार दलीय गठजोड़ से वो अलग ही नही हुए थे, बल्कि मधेशी मोर्चा और थारु राजनीतिक शक्तिद्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन में शामिल होने की चेतावनी भी दी थी ।
मगर मधेशी नेताओं तथा पश्चिम के थारु राजनीतिक शक्ति द्वारा कोई भाव नहीं दिए जाने के बाद गच्छदार फिर से बड़े तीन दल के बैठक में शामिल होने को बाध्य हो गए हैं ।
संविधान निर्माण के नाम से बनायी गयी बड़ी चार पार्टी के शासकीय गठबन्धन त्यागने के दो दिन के ही बाद रविवार की सुबह वो प्रधानमन्त्री निवास बालुवाटार में सुशील कोइराला, केपी शर्मा ओली और पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड के साथ बैठक मे दिख गए थे ।
रविवार के ही शाम को बुलाए गए शीर्ष नेताओं कीे बैठक में गच्छदार जानबूझकर अनुपस्थित हो गए । फोरम लोकतान्त्रिक के उच्च स्रोत के अनुसार बड़े तीन दल के पाले में लौटने के बाद गच्छदार अब एक नई रणनीति अख्तियार कर रहे हैं ।
आन्दोलनरत मधेशी मोर्चा के नेताओं को वार्ता मे बुलाए जाने के बाद अपनी नयी रणनीति के तहत गच्छदार बड़े तीन पार्टी के नेता से धमकी और बार्गेनिङ की भाषा बोलने लगे हैं ।
मधेशी मोर्चा के नेता बडेÞ तीन दल के साथ वार्ता मे आ जाए उससे पहले ही गच्छदार संघीयता के मसले को अपने अनुकूल सुलझाना चाहते हैं । जिस से उनके अपने स्वार्थ के अनुरूप मधेश मे संघीयता का विभाजन भी हो जाए और मधेशी मोर्चा से वार्ता करने के लिए शीर्ष नेताओं के पास कोई मुद्दा बाकी भी न रहे ।
अपने इसी रणनीति के तहत गच्छदार ने मधेश में तीन प्रदेश की अपनी पुरानी अडान को छोड़ते हुए अब मधेश मे दो प्रदेश बनाने का प्रस्ताव सोमवार को सुबह बुलाए गए चार दलीय बैठक मे रखा है ।
मधेश÷थरुहट में चल रहे आन्दोलन में अपनी कोई जगह नहीं देखने के बाद आन्दोलनकारी मधेशी और थारु शक्ति से ज्यादा क्रान्तिकारी दिखने के लिए भी गच्छदार द्वारा मधेश में दो प्रदेश बनाए जाने के प्रस्ताव किए जाने की बात बताई जा रही है ।
इतना ही नही, शीर्ष नेताओं की सोमबार के बैठक में उन्होंने धमकी दे डाली की अगर झापा से पर्सा तक एक और नवलपसारी से कंचनपुर तक दूसरा प्रदेश का प्रस्ताव नही माना गया तो समग्र मधेश एक प्रदेश वाली मांग को फिर से उठाने के लिए वो पहल करेंगे ।
गौलतलब है कि नया संविधान में मधेशी और थारु के अधिकार स्थापित करने को नहीं, बल्कि झापा से सिरहा÷उदयपुर तक अपने अनुकूल एक अलग प्रदेश बनवाने और संविधान घोषणा के बाद बननेबाली नयी सरकार में अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए गच्छदार कांग्रेस, एमाले और एमाओवादी के साथ १६ सुत्रीय समझौता में हस्ताक्षर किए थे ।
उस के बाद जब बड़े तीन दल ने ६ प्रदेश के खाका में सहमति करते हुए गच्छदार को अंगूठा दिखाया तो भी उन के सभी नेता÷कार्यकर्ता आन्दोलन में चले गए । मगर वो कोइराला, ओली और प्रचण्ड का साथ नही छोड़े । मगर जब ७ प्रदेश के नया सहमति में भी गच्छदार के मुताबिक झापा से सिरहा तक का अलग प्रदेश नही बनाया गया तो वो आन्दोलन में जाने की धमकी दे डाले । मधेशी तो दूर की बात हुई, पश्चिम तराई के आन्दोलन के मोर्चा में डट रहे थारु राजनीतिक और सामाजिक नेताओं ने भी जब गच्छदार को स्वीकार करने से इन्कार किया तो उन्होंने बडेÞ तीन दल के नेता के साथ रहने मे ही अपनी भलाई समझा । मौकापरस्ती का यह एक और अच्छा उदाहरण माना जा सकता है मधेशी नेताओं की ओर से । मधेश और संघीयता की राजनीति नाम पर सब अपनी अपनी रोटी सेक रहे हैं ये और बात है कि इनके द्वारा पकाई गई रोटी का भी बन्दर बाँट ही होना है जहाँ इनके हाथ खाली ही रहने वाले हैं और फायदा किसी तीसरे को ही मिलने वाला है । ।


