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मधेश हमारी माँ है, माँ पर आक्रमण हो तो हम चुप नहीं रह सकते : मुरलीमनोहर तिवारी

 

मुरलीमनोहर तिवारी ( सिपु ), बीरगंज , ६ सेप्टेम्बर |

sipu-1मधेश आन्दोलन ३ जारी है। संविधान मे अपने हक अधिकार के लिए किया गया,आन्दोलन में गोली चलाना, और जनता के कण्ठ दबा के बना हुआ संविधान कितना टीकेगा। संविधान मे देश के सभी जनता का आस्था रहनी चाहिए। जो संविधान बनने से पहले ही अपना नहीँ लग रहा, वो बनने के बाद अपना लगेगा ? जो बनने से पहले ही इतना खुनी हो गया वो संविधान बनने का बाद कितना खून-खराबा करेगा ? ये कर्मकांडी संविधान नहीं चाहिए। बिरगंज में शहीदों के अंतिम बिदाई में मानव सागर उमड़ पड़ा। लोगो को देखकर शहीद परिवार को कुछ तसल्ली हुईं। लेकिन नेता बिकते रहेंगे, इस्तीफा देंगे नहीं, एक होकर लड़ेंगे नहीं, और शहीद बढ़ते जाएंगे। इस चक्र को तोड़ेंगे कैसे ? एक बार पीछे मुड़कर देखिए और सोचिए मधेश आंदोलन के कमजोर कड़ी कौन है ?

आन्दोलन हो रहा है। मधेश में तीन-तीन मोर्चा आन्दोलन करने का दाबी कर रहा है। ये सवाल  उठता है की आन्दोलन के मांग क्या है ? नारा मे तो एक मधेश सुनाई देता है पर यही नेता दो प्रदेश पर पहले ही सहमती कर चुके है। तब आन्दोलन क़ी जरूरत क्या है ? संविधान बनाने की जगह है संबिधान सभा, वहा तो नेता लोग कुछ बोल नहीं पाएं। कारण की इनकी संख्या कम है। संसद मे मधेशी नेता कुछ ठीक हालात में थे, तो पहाड़ी दल का दो तिहाई नहीं पहुचता था । सब किसी को मालूम था, कि पहडिया पार्टी मधेश के साथ बेइमानी करेगा, तब भी मधेशी दल अपने-अपने अहंकार और लोभ के कारण मिलकर चुनाव नहीं लड़े जिसका फायदा पहाड़ी पार्टी को मिला। मधेशी नेता अपने पत्नी, प्रेमिका, समधिन को सभासद बनाते रहे। पैसा लेकर समानुपातिक बेचते रहे । संसद में किसी भी प्रस्ताव मे सही करने कूद- कूद कर जाते थे। भाषा के अधिकार, जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व सब गवा दिए। संसद शुरू होने के बाद से अभी तक इनसे काठमांडू का मोह छूट ही नहीं रहा था। कभी मधेश को जगाना, संगठित करना और अपना भूल सुधार का काम किया ही नहीं।

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 sipu-2जनता मधेशी नेता से निराश होकर, नागरिकता के नया नियम के खिलाफ खुद ही विरोध में प्रतिकार करने लगी, तब आनन फानन में बिना किसी तयारी, आन्दोलन का घोषणा किया गया। ऐसा लगा की आंदोलन कहने की होड़ लगी है। शरुु के कुछ दिन आंदोलन, मोर्चा के शामियाना तक ही दीखता था। जब प्रशासन जबरदस्ती बंद तोड़ने की कोशिश करने लगा तब मधेशी जनता सड़क पर उतरी। मधेशी के प्रतिकार में उतरने के बाद, दम और उफान आया। ऐसा लगा मधेशी नेता पहले जो भी गलती किए सब माफ़ हो गया। अब आन्दोलन निष्कर्ष पर पहुचेगा। इसी बिच बिरगंज में प्रहरी ने अत्याचार का नंगा नाच करके, पाच मधेशी विर को शहीद कर दिया। साथ ही सेना परिचालन किया। उस समय मोर्चा के नेता बिरगंज में रहते हुए भी शहीद और घायल को देखने नहीं गए। इसके उलटा उसी हत्यारा पुलिस से कर्फ्यू पास लेकर मधेश का मोल-भाव करने काठमान्डौ चले गए। इन्हें झटका तब लगा जब पहाड़ी नेताओ ने ही इन्हें भाव नहीं दिया।

सिर्फ राजेन्द्र महतो धायल, और शहीद से भेटने के बिडा उठाया। पुरे आन्दोलन में संसद से राजिनामा देके, धायल और शहीद के दुख-दर्द मे सहभागी होके, अनशनकारी से भेट कर, खुद ही मोर्चा के बाकी नेता के कमी-कमजोरी उजागर करके मधेश के भावना समझने में सदभावना सबसे आगे है।

sipu-3 sipu-4पहाड़ी पार्टी में रहने वाले मधेशी, मधेश विद्रोह में या तो छुपते रहे, चाहे दिखावे के लिए मधेश के हित में बोलते रहे। अब के आन्दोलन में गद्दार मधेशी को भी मिमियाते देखा गया। दुर्भाग्य भी है की इस धरा  की अपने भुमि को  गुलाम कराने मे आक्रांता के साथ आपने भाइ-बंधु दे रहे है। अपने बंधू के रक्त बहा रहे है। अपने बाण से अपने भाइ का सिना छलनी कर रहे हैे। अपने हाथ से अपनों के घर में आग लगा के विजय के रक्त चन्दन शोषक के मस्तक पर लगा रहे है। धिक्कार है धिक्कार।

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अलग देश का मांग करने वाले संगठन के क्रियाकलाप ना के बराबर रहा। इस आन्दोलन मे एक तरफ जहा सिर्फ फोटो खिचवाने वाले आन्दोलनकारी दिखे, उसी जगह तराइ-मधेश राष्ट्रीय अभियान बिना शोर-शराबे, प्रचार, बिना किसी मंच पर गए, मधेश खातिर संघर्ष करते रहा। मधेशी पार्टी के संसद से राजिनामा देने के लिए बिना किसी प्रतिष्ठा के प्रश्न बनाए, सब मधेशी पार्टी के दरवाजे पर ज्ञापन पत्र दिया। पुरा आन्दोलन में जनता के साथ आनदोलन में तमरा अभियान दिखा। इसका कारण ये रहा की अभियान के गठन में आन्दोलनकारी को ही रखा और प्रशिक्षण दिया गया, जो इस आन्दोलन में कमाल कर रहा है।

लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण आंदोलन को दमन के परिभाषा में नहीं रखा जा सकता। यदि अधिकार ना हो, तब तो लोकतंत्र जिस दल या जिस विचार के द्वारा चलता हो, उसे कैसे हटाया जायेगा। गड़बड़ी के आशंका से विद्रोह को दोषी नही ठहराया जा सकता है। एसे भी संविधान निर्माण के क्रम मे अराजकतावाद कह कर सरकार मधेश के अधिकार पर प्रतिबंध लगाना चाहती है। अब ये निरंकुश हो गया है। सभी संहारक अस्त्र सरकार के हाथ में है। जब संविधान बन रहा है, तो असंतोष भी होगा और विभिन्न स्वरूप ग्रहण करेगा। तब आंदोलन भी होगा, लेकिन उसे कुचलने के लिए राज्य जो कदम उठाया उससे हिंसा प्रोत्साहित हुई।

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मधेश में स्थायी सत्ता ने दमन किया है। ये धरती हमारी है। दासता से मुक्ति के मार्ग संविधान में बराबरी के अधिकार से ही मिल सकता है। अधिकार के मांग को सरकार विद्रोह के संज्ञा दे के गुमराह करके, आजीवन गुलाम करने के साजिश में है। मधेश विरो के भूमी में निर्दोष के सर से लाल हो रही है। यहाँ कोइ नहीं है, सच में कोई नहीं है जो जुल्म का रास्ता रोक सके।  धन्य है मधेश के भुमी जहा कतिपय युवा इसका विरोध करके हसते-हसते मृत्यु के वरन किए। मधेश की भुमी शव से पट रही है। स्त्री और अबोध शिशु तक को नहीं बक्सा गया। इनकी रक्षा के लिए कोइ नहीं है।

यहाँ निहत्था निर्दोष के अन्तरनाद किसी को नहीं सुनाता। मधेश हमारी माँ है। हमारी माँ पर आक्रमण हो तो हम चुप नहीं रह सकते। अगर हमारी माँ ने हमारा पालन दूध से किया है, तो मधेश माँ ने मिटटी से हमारा पालन किया है। शहीद होकर हमें इसी मिटटी में मिलना है। समझ आ रहा है की मधेश के कमजोर कड़ी गद्दार मधेशी और छुद्र स्वार्थ में बटे मधेशी नेता ही है। लेकिन इन कमजोर कड़ी के कारण मधेश माँ को छोड़ नहीं सकते। हमें लड़ना ही होगा मगर ये ख्याल रहे, ये लड़ाई ऐसी ना हो की “कमजोर कड़ी” के कहने से शुरू और खत्म हो। सही में ये लड़ाई अधिकार मिलने तक लड़ी जाए। तब शहीदों को सही श्रद्धाजलि मिलेगी।

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