सुनसरी हिंसा के बाद मधेश में तनाव बरकरार, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की निष्क्रियता पर उठे सवाल
काठमांडू।
सुनसरी के कप्तानगंज में 10 साउन को हुई हिंसक घटना के बाद देश के कई हिस्सों, विशेषकर मधेश क्षेत्र में, तनाव का माहौल बना हुआ है।
घटना के बाद सरकार ने जांच समिति का गठन किया और प्रभावित क्षेत्रों में कर्फ्यू भी लगाया, लेकिन सुनसरी सहित मधेश के अन्य जिलों में विरोध-प्रदर्शन अब भी जारी हैं। सुनसरी की घटना का असर आसपास के जिलों में भी देखने को मिल रहा है। हालांकि सरकार ने गृह मंत्रालय के एक सहसचिव के नेतृत्व में जांच समिति बनाई है, लेकिन स्थानीय लोग इस समिति से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि इससे स्थिति सामान्य होने के बजाय और अधिक तनावपूर्ण होती जा रही है।
देवानगंज और कप्तानगंज के स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन) या गृहमंत्री सुधन गुरुङ स्वयं घटनास्थल पर आकर उनकी बातें सुनें और सुरक्षा का भरोसा दें, तो लोगों का विश्वास बहाल हो सकता है। विभिन्न राजनीतिक दल शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि सरकार के शीर्ष नेतृत्व की प्रत्यक्ष मौजूदगी अधिक प्रभावी होती।
घटना को पाँच दिन बीत जाने के बावजूद न तो प्रधानमंत्री और न ही गृहमंत्री घटनास्थल पर पहुँचे हैं। स्थानीय लोगों का हाल जानने, स्थिति का जायजा लेने या जनता को आश्वस्त करने के साथ-साथ उन्होंने समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक दलों से संवाद या कोई सार्वजनिक वीडियो संदेश भी जारी नहीं किया है। इसे लेकर उनकी कार्यशैली की व्यापक आलोचना हो रही है।
इसी मुद्दे पर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) के संयोजक और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ ने भी सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा,
“मैं विशेष रूप से प्रधानमंत्री बालेन शाह से कहना चाहता हूँ कि नेपाल में ऐसे अनेक अनुभवी नेता, बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने अतीत में कई कठिन परिस्थितियों का समाधान निकाला है। आखिर प्रधानमंत्री को उनसे संवाद और सहयोग करने से क्या रोक रहा है? यह मुझे आश्चर्यजनक लगता है।”
प्रचण्ड ने आरोप लगाया कि देश के संकटपूर्ण समय में सरकार जनता से दूर दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि संवाद और सहयोग से दूरी बनाकर देश की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या प्रधानमंत्री अपने अहंकार के कारण संवाद से बच रहे हैं और क्या उन्हें लगता है कि “मैं अकेला ही पर्याप्त हूँ, किसी और की जरूरत नहीं है?” यदि ऐसा है तो यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी।
सुनसरी के कप्तानगंज हिंसा मामले को लेकर नेपाल की प्रतिनिधि सभा (संसद) में सरकार को विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। विभिन्न दलों के सांसदों ने देश में बढ़ती हिंसा और तनाव के बीच प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन) तथा गृहमंत्री सुधन गुरुङ की अनुपस्थिति और चुप्पी पर गंभीर सवाल उठाए।
करीब दो सप्ताह के स्थगन के बाद हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक में यह उम्मीद की जा रही थी कि प्रधानमंत्री या गृहमंत्री सदन में उपस्थित होकर हालात पर जानकारी देंगे और जनता को आश्वस्त करेंगे। लेकिन दोनों में से कोई भी संसद नहीं पहुँचा। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद की बैठक शुरू होने के समय ही राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक बुला ली।
सांसदों ने उठाए तीखे सवाल
नेपाली कांग्रेस की सांसद वासना थापा ने एक नेपाली युवक की मौत पर सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्न उठाते हुए कहा,
“क्या आपने जो काला चश्मा पहन रखा है, उससे मौत और पीड़ा के रंग भी अलग-अलग दिखाई देते हैं?”
उन्होंने कहा कि नेतृत्व केवल प्रशासन चलाने का नाम नहीं है, बल्कि संकट के समय पूरे राष्ट्र का मनोबल बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। उनके अनुसार, जब समाज भय, तनाव और अविश्वास के दौर से गुजर रहा हो, तब प्रधानमंत्री की चुप्पी अपने आप में गलत संदेश देती है। उन्होंने प्रधानमंत्री से मौन तोड़ने और गृहमंत्री से हालात के प्रति संवेदनशील होने की अपील की।
नेकपा (एमाले) की उपनेता पद्मा अर्याल ने देवानगंज गोलीकांड और उसके बाद पैदा हुए तनाव में सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बजाय भय का वातावरण पैदा कर रही है। साथ ही उन्होंने सभी पक्षों, धार्मिक नेताओं और आम नागरिकों से संयम बरतने, उकसावे और प्रतिशोध से बचने तथा शांति बनाए रखने की अपील की।
अर्याल ने कहा कि जब जनता संकट में हो, तब नेतृत्व को सामने आना चाहिए।
“प्रधानमंत्री का पद केवल सिंहदरबार की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं है। जनता संकट में हो तो नेतृत्व दिखाई भी देना चाहिए और उसकी आवाज भी सुनाई देनी चाहिए।”
सरकार पर ‘अभिभावक की भूमिका’ निभाने में विफल रहने का आरोप
श्रम संस्कृति पार्टी के सांसद आरेन राई ने कहा कि संकट के समय सरकार को जनता के बीच जाकर जानकारी जुटानी चाहिए, संवाद करना चाहिए और शांति-व्यवस्था कायम रखने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
उन्होंने कहा,
“देश और जनता को इस तरह अनाथ नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार या तो आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभाए, या फिर स्वीकार करे कि वह यह जिम्मेदारी निभाने में सक्षम नहीं है।”
राप्रपा ने उठाए गोलीकांड पर सवाल
राप्रपा की मुख्य सचेतक खुस्बु ओली ने कहा कि सांसदों और आम नागरिकों को सुनसरी घटना की पूरी सच्चाई जानने का अधिकार है।
उन्होंने पूछा,
“प्रधानमंत्री ने अपने फेसबुक के माध्यम से स्वीकार किया है कि पुलिस ने गोली चलाई। यदि गोली पुलिस ने चलाई, तो आदेश किसने दिया? और यदि सरकारी हथियार से गोली चली, तो घायल केवल हिंदू धर्मावलंबी ही क्यों हुए? आखिर गोली किसने चलाई?”
सर्वदलीय बैठक में भी सरकार की आलोचना
प्रतिनिधि सभा से एक दिन पहले रास्वपा के सभापति रवि लामिछाने द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की कार्यशैली की आलोचना हुई। विभिन्न दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि घटना के कई दिन बाद भी सरकार वास्तविक जानकारी सार्वजनिक करने में विफल रही और सुरक्षा बलों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग से स्थिति और बिगड़ गई।
नेपाली कांग्रेस के नेता गगन थापा, नेकपा के संयोजक पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’, नेकपा (एमाले) के महासचिव शंकर पोखरेल तथा राप्रपा के अध्यक्ष राजेन्द्र लिङ्देन ने भी प्रधानमंत्री से सभी दलों के साथ मिलकर संवाद शुरू करने और राजनीतिक पहल के माध्यम से समस्या का समाधान निकालने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि केवल दमनात्मक कदमों से स्थिति सामान्य नहीं होगी।
कप्तानगंज घटना के बाद प्रमुख घटनाक्रम
14 साउन
- सिंहदरबार में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक आयोजित हुई।
- राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल और प्रतिनिधि सभा के सभामुख डोलप्रसाद (डीपी) अर्याल के बीच मुलाकात हुई।
13 साउन
- रवि लामिछाने ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर सभी पक्षों से शांति और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की अपील की।
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