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बेशुमार शवों की अग्निदाह से दीपावली मनाने की तैयारी बेशरमी से हो रही है : श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति , काठमांडू, १६ , सेप्टेम्बर |

madhesh bachchaअन्ततोगत्वा सत्ता ने बता ही दिया कि मधेश और मधेश की जनता अपने ही देश में अस्तित्वविहीन हैं । मधेश के दर्द से इनका वास्ता नहीं । ये तो पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र से भी अधिक असंवेदनशील निकले । पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र की अन्तरआत्मा १९ लोगों की मौत के बाद जाग गई थी । किन्तु ३० से भी अधिक मौत के बाद भी ये मौत ओली महोदय की निगाह में दो चार सूखे पत्ते के झड़ने की तरह है जिनका कोई महत्व नहीं होता । इतने असंवेदनशील व्यक्ति के हाथों में सत्ता सौंपने की तैयारी जोर शोर से हो रही है । तीनदलों की अन्तरआत्मा मृतप्राय हो चुकी है क्योंकि अगर उसमें चेतना होती तो निःसन्देह सुगबुगाहट होती देश के लाचार प्रधानमंत्री ने नेपाल के इतिहास में वो काला पन्ना दर्ज करवा दिया है जिसके लिए उन्हें मधेश की जनता कभी माफ नहीं करेगी । उनकी तोतली जुबान से भी मधेश के लिए सहानुभूति के शब्द नहीं निकल रहे हैं । बेशुमार शवों की अग्निदाह से दीपावली मनाने की तैयारी बेशरमी के साथ हो रही है । अगर नेपाल की जनता में थोड़ी भी मानवता या नैतिकता होगी तो वो उस दिन उन घरों को याद अवश्य करेंगे जिनके घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ गए हैं । परन्तु इसमें सन्देह है, क्योंकि सामाजिक संजाल में इन शहीदों के लिए पहाड़ी वर्ग से जो विद्रूप अभिव्यक्तियाँ पढ़ने को मिलती हैं, उससे अपनी ही आत्मा शर्मसार होती है । उन्हें लगता है कि पचास लाख के लिए मधेशी जनता अपनी जान दाँव पर लगा रही है । उन्हें यह नहीं लग रहा कि यह जज्बा है अपने अधिकार को पाने की जिसे वर्षों के शोषण ने जन्म दिया है । मधेश की धरती बहुत उर्वरा है वो चाहे तो पचास लाख नहीं करोड़ों की हैसियत बना सकती है किन्तु उसे कभी विकसित होने नहीं दिया गया है । हमेशा विकास से उसे पीछे रखा गया ताकि खस शासक अपनी हैसियत ऊँची बनाए रखे । ऐसे विद्रूप अभिव्यक्ति देनेवाले शायद आत्मसम्मान और स्वाभिमान से स्वयं अपरिचित हैं इसलिए उनसे यह उम्मीद भी बेकार है । आखिर मधेशी इनके लिए भी तो दोयम दर्जा प्राप्त अवांछित नागरिक ही हैं भला इनसे कैसी हमदर्दी ? ऐसे में कुछ एक बुद्धिजीवी ही हैं जो मान रहे हैं कि मधेश के साथ गलत हो रहा है ।

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तीनदलों ने मधेश की जनता के दिलों में जो विद्वेश की जड़ डाली है, उससे आने वाले कल में किसी शांति और सद्भाव के फल लगने की उम्मीद नहीं की जा सकती, इसमें अगर कुछ फलेगा तो सिर्फ नफरत, आक्रोश और विखण्डन का फल । आज भी रुपन्देही में चार लोगों की मौत प्रहरी की गोली से हुई है जिसमें चार वर्ष का बालक और १४ वर्षीया बालिका भी शामिल है । क्या ये आतंकवादी थे ? इस दरिंदगी के लिए कौन जिम्मेदार है ? अफसोस ∕ अन्तरराष्ट्रीय जगत भी खामोशी के साथ मौत के तांडव को देख रहा है और अपनी शुभकामना सम्प्रेषित कर रहा है । समाचार पत्र उनकी संविधान निर्माण की सफलता की शुभकामनाओं से भरा हुआ है । जिन्दगी का कोई महत्व नहीं रह गया है । घरों में घुसकर प्रहरी का दमन चालु है । एक सोची समझी साजिश के तहत गोली चलाई जा रही है और फिर दंगाग्रस्त क्षेत्र लागुकर कर्फ्यू लगाकर राजधानी में सामान आपूर्ति की जा रही है । सरेआम जारी इस मौत के खेल को पूरा राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय जगत देख रहा है और नेपाल के तीन दलों की नीति की सराहना कर रहा है, शांति और विकास की अभिलाषा व्यक्त कर रहा है । पड़ोसी देश भारत ने हमेशा नेपाल के सुख और दुख में साथ दिया है किन्तु आज वह भी मौत के तांडव का मूक दर्शक बना हुआ है । इतिहास गवाह है कि नेपाल की राजनीति में आज तक जितने भी आन्दोलन हुए हैं, उसमें भारत की अहम भूमिका रही है और आन्दोलन सफल होता रहा है । किन्तु आज मधेश और मधेशी जनता अपने आन्दोलन में अकेली है और शायद इसलिए मौत का खेल अपनी चरम सीमा पर है । मधेशी नेता सहयोग की अपेक्षा उनसे कर रहे हैं, जिसका मजाक नेपाली मीडिया बना रहे हैं, उनकी निगाह में यह आन्तरिक मामला है इसलिए मधेशी नेताओं को अपनी स्वाभिमान की रक्षा करनी चाहिए और भारत के समक्ष अपनी समस्या नहीं रखनी चाहिए । बात बिल्कुल सही है किन्तु ये शायद नेपाल के इतिहास को विस्मृत कर रहे हैं । अगर इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो शायद उन्हें समझ में आ जाएगा कि भारत की चाहे अनचाहे क्या भूमिका रही है नेपाल के राजनीतिक पटल पर और वो कम से कम मजाक तो नहीं उड़ाएँगे । आज ओली के संदेशवाहक बन कर ज्ञवाली भारत की यात्रा में हैं, आखिर क्यों ? शायद इसकी भी आवश्यकता नहीं है, किन्तु यह कटु सत्य है कि ऐसी यात्राएँ होती रही हैं और होती रहेंगी तो फिर मधेश और मधेशी नेताओं के लिए कटाक्ष क्यों ? खैर देश दीपावली की तैयारी में व्यस्त है और ओली आनेवाले दिनों के सुनहरे सपने देख रहे हैं किन्तु यह सत्ता काँटो की वो सेज बनने वाली है जहाँ उनकी आयु और भी क्षीण होने की अवस्था में होगी क्योंकि लाशों और उनके परिजनों की चीत्कार उन्हें चैन से सत्ता का सुख नहीं लेने देगी यह तो तय है ।2

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