Wed. Jan 29th, 2020

मधेशियों के आंदोलन में बलि का बकरा भारत

सुजित कुमार झा:नेपाल में नया संविधान जारी होते ही नरेंद्र मोदी का विरोध और तेज होता जा रहा है । स्रिुथति इतनी खररुाब होरु गई हैरु कि अब मोरुदी की संघ केरु प्रभाव वाली हिन्दुत्व ररुाजनीति सेरु भडथति इतनी खराब हो गई है कि अब मोदी की संघ के प्रभाव वाली हिन्दुत्व राजनीति से भड़के नेपाली विभिन्न शहरों में मोदी के तो पुतले जला ही रहे हैं अब उन्होंने विरोध में भारत का झण्डा भी जलाया है । उनका कहना है कि भारत और नरेन्द्र मोदी उनके आतंरिक मामलो में दखल अन्दाजी कर रहे हैं । हालाँकि भारत के झंडे का नेपाल में अपमान होना कोई पहली मर्तबा नहीं है जब कभी भी नेपाल भारत कोई खेल खेला जाता है तो चाहे जीत किसी की हो भारतीय झंडा को ही अपमानित होना पड़ता है।
संविधान के समर्थकों ने भारतीय मीडिया को नेपाल में आने से रोक दिया है । नेपाल में इन दिनों सोशल मीडिया, वेबसाइट और काफी संख्या में ब्ला‘ग मापÞर्mत इन मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक तरपÞmा बनाने की जोर चली है । भारतीय फिल्म और टीवी चैनलों पर भी रोक लगी किन्तु उसके अगले दिन ही मधेश में ही नेपाली भाषाओ पर रोक लगा दी गयी । अपने ही देश में अपने ही राष्ट्रभाषा पर अनुबंध की घटना अपने आप में शर्मसार करती है , इसके अगले दिन फिर नेपाल सरकार ने सारे केबल नेटवर्क वालों से इसको स्पस्टीकरण के साथ हटाने के मांग की, फिलहाल हिन्दी फिल्म और टी बी चैनलों पर कोई पाबन्दी नहीं है । भाषा किसी देश की नहीं होती श्री लंका में भी भारत की भाषा तमिल बोली जाती है, भारत के भी विभिन्न स्थानो पर नेपाली बोली जाती है जैसे पश्चिम बंगाल, असम और नेपाल में भी लोग हिंदी बोलते हैं । अगर इंग्लैंड से किसी देश को कुछ हो जाये तो वे इंग्लिश छोड़कर कहाँ जायेंगे ?
“तुम्हें जिंदगी के उजाले मुबारक, अँधेरे हमें रास आ गए हैं । तुम्हें पाके हम खुद से दूर हो गए थे तुम्हें छोड़ कर अपने पास आ गए हैं “ सन १९६५ में बनी हिन्दी फिल्म पूर्णिमा के ये गीत मानों नेपाल के मधेसियो के लिए ही बना हो । २० सितम्बर को नेपाल में नया संबिधान ये कहते हुये जारी किया गया कि मधेशियों की छोटी मोटी मांग को संशोधन किया जायेगा किन्तु संविधान के स्वागत में कहीं दिवाली मनाया जा रहा था तो कहीं खून की होली का मातम । नेपाल सरकार ने संविधान जारी होने से पहले ही मधेश के कई जिल्लो में कर्फ्यू लगाया और आंदोलनकारियों को सर और छातियों को निशाना बनाया सिर्फ इसलिए की वो लोग बंद की मांग कर रहे थे, उनका कहना था कि अगर राजधानी में पेट्रोलियम ईंधन की अभाव हुई तो सरकार पर आंदोलन का दबाब बनेगा और हमारे उचित मांगो को सम्बोधन किया जायेगा । पर मधेशियों का आंदोलन तब सफल होते हुए दिखा जब लोग बा‘र्डर पर ही धरना दे बैठे ।
हालाँकि इसे नेपाल के पहाड़ी नेता, बिश्लेषकों, और मीडिया भारत की अघोसित नाकाबंदी की संज्ञा दे रही है लेकिन मीडिया में ये भी खबर आती रही है कि किसी किसी नाका से सामान नेपाल आ रहा है और नेपाल के संचार मंत्री और भारत के लिए नेपाली राजदूत का भी कहना यही है की भारत सरकार की ओर से कोई नाकाबंदी नहीं की गयी है ।
हिन्दू राज्य की मांग कर रहे लोगो ने आलोचना भी की “विश्व के एक मात्र हिन्दू राष्ट्र का बिल्ला हटाकर हिन्दू का ही त्यौहार दिवाली मना रहा है” । संबिधान तो जारी हो गया लेकिन उसके बाद नेपालियों के लिए पीड़ादाई समय की शुरुआत भी । कुछ दिनों पहले नेपाल के प्रमुख नेताओ में से एक के पी शर्मा ओली ने बी बी सी हिंदी को दिए एक इंटरव्यू में ये कहा की “संविधान अधिकार ले कर आती है, चावल का बोरा या गैस सिलिंडर नहीं” तो कहने का मतलब लोग अब अधिकार को ही अनाज मान कर खाएंगे और उसी को पेट्रोल की जगह गाड़ी में डाल कर चलाएंगे । माओवादी सुप्रीमो प्रचण्ड का कहना था अब हम साईकल चलाएंगे ।
हमारे यहाँ एक कहावत है की कोई काम शुरु करें तो “तेल” शब्द का नाम तक न लें, और कहीं जा रहे हो तो बिल्कुल नहीं, लेकिन फिर बिना तेल लगाए आप सुन्दर नहीं दिखेंगे भले बिना नाम लिए आप को एक बार देखना होगा । जब पहली बार भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी नेपाल आए थे तो शायद उन्होंने “तेल” का नाम लेकर यात्रा शुरू नहीं किया होंगा लेकिन नेपाल सरकार की वार्ता की शुरुआत हुई तो “तेल” से जिसका असर संविधान जारी होने के बाद दिखना शुरु हो गया । दरअसल दूसरी संविधान में नेपाल के बड़े दलों ने मधेश मुद्दा और मांग पूरा करने के बजाय आंदोलन को कैसे दबाया जायेगा इस बिषय में सोचना था । और नाकाबंदी नेपाल सरकार को पहले से ही आशंका थी इसीलिए मोदी के समक्ष बार बार रक्सौल अमलेसगंज करीब ४१ किमी वाली पाइपलाइन के समझौता पर नेपाल सरकार की नजÞर थी और जब दूसरी बार सार्क सम्मलेन में मोदी नेपाल आये तो फिर से उनको यही याद दिलाया गया और वो इस बात का जिक्र करते हुए वे नेता से आँख से सम्पर्क भी किये थे ।
पिछले २५ सालों में नेपाल में ये चौथा संविधान है। संविधान न होने की वजह से संविधान नहीं बनाया गया है, बल्कि जनता को मान्य न हुआ इसलिए संबिधान बनाना पड़ा । इस परिस्थिति में सरकार को चाहिए था कि अबकी मर्तबा ऐसा संविधान हो जिसमे जनता की अधिक से अधिक मांग पूरी हो । हालाँकि दो शीर्ष दलों के मिलने पर दो तिहाई बनती है किन्तु जिस मुद्दो को लेकर बड़ी पार्टियां चुनाव लड़े थे , जिन जिन एजेंडा को रख कर वोट लिए वे पूरा करते हुए नजÞर नहीं आये । कमल थापा ने एक ही बात को रखा कि वे हिन्दू राज्य चाहते हैं किन्तु उनकी भी यु टर्न हुई और संबिधान को समर्थन कर बैठे । तो ऐसे में कैसे मान लें की ये संविधान जनता की मांगो को पूरा करती है, ये तो सिर्फ नेताओं के बहुमत के बल को दिखाता हुआ संविधान लगता हैं । किसी भी देश का संविधान ५०५ लोगों के बहुमत और देश की आधी आबादी के विरोध में सफल नहीं सो सकता । इसका जीता जागता प्रमाण विकिपीडिया (जततउकस्ररभल.m.धष्पष्उभमष्ब.यचनरधष्पष्रज्गmबल)अजबष्ल) पर उपलब्ध करीब ५२ लाख का ११५५ किमी का ये बिश्व रिकॉर्ड मानब घेरा है।

Loading...

 
आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: