नेपाल के र्सार्वभौभ सत्ता में मधेश का योगदान और मधेशी राजनीति
बद्रिप्रसाद भुसाल
आजकल नेपाल दण्डहीनताजन्य अपसंस्कृति से आक्रान्त हो चुका है। देश में नियम, कानून, दण्डसजाय, सिद्धान्त प्रणाली की बात कहीं देखी नहीं जा रही है। ऐसे समय में शक्तिशाली व्यक्ति, पद औरु अधिकार प्राप्त व्यक्ति लोग राजकीय शक्ति साधन और स्रोत पर साँप की तरह चक्र मार कर कब्जा किए हुए हैं। अधिकार प्राप्त या शक्तिशाली व्यक्तियों के द्वारा किया गया अपराध भी क्षम्य है तो राजकीय स्रोत से अधिक परिमाण में धनसम्पत्ति पर कब्जा करने में सफल होते हैं। निर्बल, गरीब, अधिकारविहीन व्यक्तियों के ऊपर अधिकार प्राप्त व्यक्ति राज्य को आधार बनाकर शोषणा कर रहा है। संसार में ही नहीं होने वाली दण्डहीनता का चरमोत्कर्षअनेक नाटकी प्रसंग नेपाल में प्रदर्शित हो रहे है। ऐसे नाटकीय वैसे ही पर््रदर्शन नहीं हो रहे हैं। इसके पीछे लम्बा इतिहास है, और कुछ सीमित शक्ति तथा समुदाय का महत्वपर्ूण्ा योगदान है। यदि इस ओर ध्यान दिया जाय तो विषय-बस्तु दूसरी मोर ले सकती है। अतः इस के इतिहास को किसी दूसरे सर्न्दर्भ में ही उठाया जा सकता है।
इसी प्रकार की दण्डहीनता की पराकाष्ठा राज्य में कानून विहीनता की स्थिति में आती है। सम्पर्ूण्ा विश्व में विभिन्न समय में हर्ुइ क्रान्ति, व्रि्रोह तथा आन्दोलन के क्रम में होने वाला उथल-पुथल, विनाश और अन्य प्रकार की पीडÞा के सर्न्दर्भ में जो राष्ट्र पीडिÞत होकर सम्बोधन किया है, उसी राष्ट्र के अनुभूत जनता ने वास्तविक शान्ति और विकास कर दिखाई है। इस सर्न्दर्भ में देखा जाय तो अभी नेपाल के तर्राई/मधेश क्षेत्र भी इसी प्रकार की पीडÞाओं से आक्रान्त है। यहाँ की पीडÞाओं के सर्न्दर्भ में देखा जाय तो कोई भी नेतृत्व पंक्ति कभी भी तर्राई स्थित पीडÞाओं कोर् इच्छा शक्ति के द्वारा सम्बोधन करने की कोशिश नहीं किया है। खास करके तर्राई/ मधेश केन्द्रित पार्टियाँ भी स्थानीय अभाव या प्रभावी समस्याओं की ओर उचित ध्यान नहीं दिया है।
वैसे तो तर्राई आज भी व्यक्ति हत्या, अपहरण, लूटपाट जन्य अपराधों से आक्रान्त है। ऐस गतिविधियों को राज्य पक्षीय प्रशासन द्वारा भी नियन्त्रित करने की कोशिश नहीं की जा रही है। ऐसी संस्कृति को नियन्त्रण करने के लिए राज्य पक्ष के द्वारा विगत के कुछ ऐतिहासिक उपायो. को आधार बनाकर हो रहे अपराधों को कानूनी दायरे में लाकर आगामी दिनों में होने वाली अपराधिक गतिविधियों के ऊपर अंकुश लगाया जा सकता है, ऐसी सोच बनाना जरुरी है। अपराधिक घटनाओं को नियन्त्रण करने के लिए र्सवप्रथम राज्यद्वारा संचालित अपराधिक कार्य को रोकने का प्रयास होना चाहिए। आजतक राजकीय शक्ति का दुरुपयोग करने वाले एक भी व्यक्ति को दण्डित करने का उदाहरण नहीं मिलता है। इससे भी बढÞकर भयावह सिथति वहाँ पर है, जहाँ व्यक्तियों राज्इ द्वारा लापता किया गया है। इस सर्न्दर्भ में तो एक भी अपराध के बारे में अनुसन्धान किया गया है, ऐसा नहीं लगता है। लापता किये गये कार्य राज्य द्वारा २००७ साल में सम्पन्न किए गए दिल्ली सम्झौता के विरोध में काठमांडू में हुए कार्यक्रम के द्वारा रामप्रसाद र्राई को लापता कराने के बाद खोज तलास करने का इतिहास पाया जाता है। फिर भी आजतक उसकी अवस्था क्या है – पता नहीं चल पाई है। २०१३ साल में सप्तरी हनुमान नगरबासी शुकदेव सिंह को राज्य द्वारा लापता किया गया था, उसके बारे में भी आज तक पता नहीं चल पाया है। व्यक्ति के बारे में छानबीन होने का कार्य सम्भवतः तर्राई/मधेश से लापता किया गया पहला व्यक्ति हो सकता है। २०१७ साल से लेकर पंचायत शासन व्यवस्था द्वारा लापता किए जाने का क्रम अधिक मात्रा में बढÞा। २०४७ साल तक आते-आते पंचायती सरकार द्वारा कितने लोगों को लापता किया, उसका लेखा जोखा ही नहीं हैं। २०५२ साल फागनु १ गते से लेकर तत्कालीन नेकपा माओवादी द्वारा किया गया सशस्त्र द्वन्द्व के दौरान में भी हजारों व्यक्तियों को लापता किया गया है। २००७ साल तक नेपाल देश सबसे अधिक व्यक्तियों को लापता करने वाला देश के रुप में प्रसिद्ध हो चुका था। यह बात २००४ में नेपाल भ्रमण करने आए संयुक्त राष्ट्र संघीय कार्यदल द्वारा किए गए अध्ययन से सिद्ध होता है।
इस प्रकार लापता नागरिकों की संख्या पर विचार करते हुए विगत के इन्सेक प्रतिवेदन से पता चलता है कि २०५२ साल फागुन से लेकर २०६३ अग्रह ५ गते तक राज्यपक्ष और माओवादी द्वारा कुल ९३१ व्यक्तियों को लापता किया गया है। जिसमें से मधेश स्थिति जिलाओं से मात्र ५२४ व्यक्तियों को लापता किया गया है। झापा-१२, मोरंग-१३, सुनसरी-१५, सप्तरी-८, सिरहा-११, उदयपुर-३, व्यक्तियों को लापता किया गया है। इसी प्रकार धनुषा-१०, महोत्तरी-२, सिन्धुली-१४, रौतहट-५, बारा-१, चितवन-१५, नवलपरासी-१३, रुपन्देही-२। कपिलबस्तु-११, दाङ-६९, बाँके- ६१, बर्दिया-२१९, कैलाली-१२ और कञ्चनपुर- २६ है। इत तर्राई/मधेश के जिलाओं से लापता व्यक्तियों का ५६% से भी अधिक है। द्वन्द्व के कारण तर्राई में यह दुष्प्रभाव तो है ही और भी द्वन्द्व का अन्यान्य दुष्प्रभाव विद्यमान है। मृत्यु प्राप्त करने वाले, यातना पाने वाले, द्वन्द्व के कारण विस्थापित होनेवाले, धन सम्पत्ति अपहरित व्यक्तियों की पीडाएँ और भी दुःखी करने वाली हैं। उक्त वर्गों की पीडÞाओं को शान्ति प्रक्रिया द्वारा किसी भी प्रकार से कहीं किसी ओर से सम्बोधन नहीं किया गया है। इस प्रकार से तर्राई मधेश क्षेत्र द्वारा दी जाने वाली कर्ुवानी है। नेपाल के र्सार्वभौमसत्ता और अखण्डता के लिए लडने वाली लडर्Þाई है। अतः इस ओर सभी क्षेत्रों और अधिकार प्राप्त व्यक्तियों के द्वारा ध्यान देना जरुरी है।
नेपाली कांग्रेस के द्वारा २००४ साल में किया गया सशस्त्र क्रान्त्रि का आधार भी तर्राई/मधेश की भूमि ही रही है। २००४ साल के बाद यह क्षेत्र जिस प्रकार राष्ट्र के लिए जान न्यौछावर किया, उसके हिसाब से भी तर्राई/मधेश क्षेत्र द्वारा अपना अधिकार खोजना न्यायोचित है। क्योंकि इस क्षेत्र में स्थिति गरीब किसान, मजदूर जनता ने बलिदान दिया था। उस समय में लडÞी जाने वाली लर्डाई र्सार्वभौमसता की और राष्ट्रीय अखण्डता की लर्डाई थी। वैसे ही २०३६ साल में तत्कालीन नेपाल कम्यनुनिष्ट पार्टर्ीीे जो झापा व्रि्रोह किया था, वह व्रि्रोह भी तर्राई मधेश आधारित था। मधेश स्थित व्रि्रोह भी कम्युनिष्ट पार्टर्ीीो उर्जा ही प्रदान किया। सैद्धान्तिक हिसाब-किताब से देखा जया तो झापा व्रि्रोह भी नेपाली जनता के र्सार्वभौम सत्ता और राष्ट्रीय अखण्डता के लिए किया गया था । यह बात सूक्ष्म रुप से तर्राई मधेश एवं इस्सके अतिरिक्त दलों को भी समझना चाहिए। ऐसे पृष्ठभूमि से प्रेरित अपने राष्ट्रप्रेम, नेपाली जनता के र्सार्वभौमि सत्ता के लिए मेधशी जनता अपने आप को बलिदान दिया है। ०६२/०६३ साल के जनआन्दोलन और इसके बाद हुए मधेश आन्दोलन ने तर्राई मधेश को एक सशक्त शक्ति के रुप में स्थापित किया है। इसी आधार पर संविधानसभा के चुनाव में तर्राई/ मधेश केन्द्रित पार्टियाँ सन्तोषजनक और सम्मानजनक जनमत पाने में सफल हर्ुइ। और संवैधानिक संसद में संख्यात्मक एवं बहुमतीय दृष्टि से महत्वपर्ूण्ा शक्ति के रुप में स्थापित हर्ुइ है। तदुरान्त तर्राई मधेश केन्द्रित दलों के ऊपर देशी-विदेशी शक्तियों के द्वारा कुटनैतिक खेल शुरु हुआ। कतिपय तर्राई मधेश केद्रिन्त दलों के नेता के भीतर की कमजोरी भी है। जिसके कारण टूट-फूट भीतर घात, खरीद फरोक्त में नेता गण लिप्त दिखाई देते है। जिसके कारण पुनः तर्राई मधेश की जनता निराश और हतास हर्ुइ है। वैसे तो आज भी तर्राई मधेश केन्द्रित दल के कुछ नेता लोग सम्पर्ूण्ा राष्ट्र के प्रतिनिधित्व करने लायक और सम्पर्ूण्ा नेपाली के आस्था के रुप में भी देखे जाते हैं। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में ऐतिहासिक सन्दभों को हिसाब-किताब करते हुए मधेश स्थित गरीब किसान, मजदुर, आदिवासी, जनजाति, महिला, मुसलमान, पिछडेÞ वर्ग सभी को राजकीय भागीदारी में समानुपातिक रुप में जनता को स्थापित करना मधेश केन्द्रित दलों का न्यूनतम दायित्व होना चाहिए। तर्राई क्षेत्र और समग्र मधेशी जनता द्वारा दिए गए सम्पर्ूण्ा योगदान का यदि उचित मूल्यांकन नहीं होता है तो भविष्य में राज्य को निश्चय ही नई चुनौतियों का सामना करना होगा।
अनुः रमेश झा
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