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मधेश सिर्फ एक मृत भूखण्ड नहीं , देश की रीढ़ है

 
मधेश आन्दोलन को बार–बार भारत से जोड़कर, मधेशियों को बिहारी और भारतीय कह कर दुत्कारना यह तो एक परम्परा सी बन गई है ।

गुजरे कल पर एक नजर
डा. श्वेता दीप्ति :एक पूरा वर्ष गुजरा २०१५ और अब हमारी उम्मीदों का एक और वर्ष शुरु हो चुका है २०१६ । ये महीने या तारीखें सिर्फ एक पैमाना होता है, हमारे गुजरे हुए वक्त का और उनसे मिली उपलब्धियों को जानने या समझने का । इन बारह महीनों में अगर वक्त के पन्नों को पलटें तो, नेपाल के लिए यह पूरा समय सिर्फ और सिर्फ हादसों का रहा, आँसुओं का रहा और उम्मीदों के टूटने का रहा । अगर हम विश्लेषण करें कि, हमने क्या खोया और क्या पाया, तो हमारी खुली हथेलियों में शून्य के अलावा कुछ नहीं है । हाँ, एक वर्ग यह कह सकता है कि, हमने चिरप्रतीक्षित संविधान

कैलाली की घटना जो आज भी रहस्य बनी हुई है । कितनी लाशें बिछ गईं, जिनकी सही संख्या आज भी जनता के सामने नहीं आ पाई । कैलाली की घटना के बाद सेना के साए में जो खेल खेला गया, उस दर्द को वहाँ की जनता आज भी नहीं भूल पाई है । चुन–चुन कर समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया, वह भी प्रशासन और सेना की संरक्षता में और हमारी सरकार उस वक्त भी इस घटना का मूक गवाह बनी रही ।
को पाया । किन्तु यह कोई उपलब्धि नहीं मानी जा सकती क्योंकि, हम संविधानविहीन नहीं थे । संविधान के नाम पर हमारे पास एक अंतरिम संविधान था और उससे जुड़ी देश की उम्मीदें भी थीं । पर जनता के धन और समय की जो बरबादी हमारे नेताओं ने किया संविधान बनाने के नाम पर, वह भी भविष्य में एक अनोखा और मजाकिया इतिहास ही रचने वाला है । आने वाली पीढ़ी जब भी इन संविधान रचयिताओं के नाम लेगी तो, उसमें एक खीझ और चिढ़ जरुर होगी । नए संविधान के नाम पर नई बोतल में पुरानी शराब थी, जिसका नशा सिर्फ एक वर्ग विशेष के लिए था, जिसके तहत दीवाली मनाई गई । परन्तु एक दूसरे वर्ग के लिए यह सिर्फ और सिर्फ मौत का तांडव लेकर आई । संविधान, वह जीवित दस्तावेज जिसमें सम्पूर्ण देश अपनी उपस्थिति पाता है और उसपर गर्व करता है । किन्तु ऐसा हो नहीं पाया ।

सभामुख का मर्यादाविहीन कदम
असंतोष की ज्वाला उस समय भड़की जब २२ जनवरी २०१५ को एक नया इतिहास रचा हमारे सभामुख सने । जब उन्होंने सारी मर्यादाओं को ताक पर रखकर और नैतिकता के विपरीत जाकर सुरक्षाकर्मियों के बीच प्रक्रिया प्रस्ताव को पढ़ा और उसे पारित कराया । ये शुरुआत थी बहुमत के नशे की । वर्चस्व का मद सर चढ़कर बोल रहा था और इसी वर्चस्व की नीति ने असंतोष को जन्म दिया, जिसका खामियाजा आज सारा देश भुगत रहा है । सत्ता बनाने और बिगाड़ने के माहिर खिलाड़ी प्रचण्ड ने जनता को सम्मोहित करने का एक और पाशा फेका, जब उन्होंने २८ फरवरी को काठमान्डौ के खुलामंच में मोर्चा का शक्तिप्रदर्शन किया । जिसमें उन्होंने बड़े जोर शोर से यह ऐलान किया कि सत्तापक्ष अगर अपने मन की करेगा तो आगे की राह एकबार फिर से हिंसात्मक हो सकती है । ओली की बोली और गृहमंत्री के अडि़यल रुख में इस शक्तिप्रदर्शन ने एक असुरक्षा की भावना पैदा कर दी थी और यही प्रचण्ड चाहते थे । जिसमें वो कामयाब भी हुए और सत्तापक्ष के बीच में अपनी महत्ता जाहिर कर दी । जिसका भरपूर फायदा उन्होंने तब उठाया जब अचानक चार दलों के बीच १६ सूत्रीय समझदारी हुई । जिस समझदारी में प्रचण्ड अपने ही एलान को भूल गए । परन्तु बातों या वादों से मुँह फेरना राजनीति के लिए कोई बड़ी बात नहीं होती ।
२४ अप्रील का कहर
यह वह समय था जब नेपाल २४ अप्रील की पीड़ा को झेल रहा था । प्रकृति की गर्भ में हलचल मची और नेपाल की रफ्तार बदल गई । बैसाख १२ गते(अप्रील२४) वह काला दिन साबित हुआ जिसने नेपाल को कई वर्षों पीछे धकेल दिया । एक ओर जिन्दगी कराह रही थी, दूसरी ओर प्रकृति ने जो कहर ढाया था उस पीड़ा से परे हमारे नेता इस दर्द से फायदा लेने की नीति तय कर रहे थे और अचानक इसी नीति के तहत फास्टट्रैक से संविधान जारी करने की जदेजहद शुरु हो गई । पिछले आठ वर्षों से जो नहीं हो पाया था वो अचानक तय हो गया । अकस्मात् सभी विरोधी एक मंच के नीचे आ गए । १६सूत्रीय समझौते किए गए, जिसपर सर्वोच्च अदालत ने परमादेश जारी कर के उसके कार्यान्वयन पर रोक लगाने का निर्णय किया । किन्तु विश्व में सम्भवतः नेपाल एक अनोखा देश होगा, जिसके सत्ताधारी नेताओं ने ही सर्वोच्च के फैसले को मानने से इनकार कर दिया । जहाँ न्यायालय और जज पर सवाल उठाए गए और समुदाय विशेष का दोष लगाया गया । मधेशियों की राष्ट्रीयता पर ही सवालिया निशान लगा दिया गया । खैर, चार दलों द्वारा की गई ये एकता एक मिसाल बन सकती थी, अगर इसमें सम्पूर्ण देश की उम्मीदों को पूरा करने की भावना होती । किन्तु ऐसा था नहीं, इनकी नजरें क्षतविक्षत नेपाल से भरपूर फायदा उठाने की थी ।
मसौदा और मधेश
फास्टट्रैक के तहत आननफानन में जनता के बीच नवनिर्मित संविधान का मसौदा पेश किया गया । यह वह मसौदा था, जिसने तकरीबन यह साबित किया कि मधेश का अस्तित्व नेपाल में एक उपनिवेश से अधिक नहीं है । २०७० के चुनाव में मधेश की जनता ने मधेशी नेताओं को नकार कर अपना विश्वास नेपाली काँग्रेस और नेकपा एमाले पर दिखाया था और दो तिहाई बहुमत के साथ इन्हें सत्ता की गलियारों तक पहुँचाया था । किन्तु इन्हीं पार्टियों द्वारा तैयार किया गया मसौदा जब सामने आया तो मधेश की जनता को पूरी तरह हाशिए पर ला खड़ा कर दिया गया था । ठगा हुआ मधेश स्तम्भित था । मधेश का आक्रोश सड़क पर दिखा । विरोध हुआ और सरकारी दमन भी । नियमों का उल्लंघन और न्यायालय की अवमानना के साथ पेश किए गए मसौदे को मधेश ने पूरी तरह नकार दिया था, क्योंकि उनके समक्ष जो मसौदा था उसमें नया कुछ नहीं था और जो नया अन्तरिम संविधान में जोड़ा गया था उसे हटाकर, एक दूसरा नया जामा पहना कर जनता के सामने लाया गया था । मधेशी, आदिवासी, जनजाति, दलित, मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग और महिला इन सबने देश में शोषण और विभेद की जिस पीड़ा को झेला था, उस उत्पीड़न और विभेद से मुक्त होने की जो उम्मीद नवनिर्मित संविधान से की थी, वो उसमें कहीं नहीं था ।
सुझाव संकलन का तमाशा
देश के एक हिस्से ने जिस तरह से मसौदे को पूरी तरह नकारा था, वो काफी था सत्तापक्ष को यह समझने के लिए कि इसे अगर जारी किया गया तो देश पूरी तरह से सुलग उठेगा । मधेश सिर्फ एक मृत भूखण्ड नहीं है, जिसे पूरी तरह नकार कर सत्तापक्ष शासन कर सकता है । मधेश इस देश की रीढ़ है, जिसके बगैर देश लाचार हो सकता है, इस गम्भीरता को हमारे शासक वर्ग ने नहीं समझा । अपनी जिद को कार्यान्वयन करने के लिए एक और तमाशा किया गया, वह था सुझाव संकलन का तमाशा । जिसके अभिनेता भी वही थे और दर्शक भी । एक पूरे वर्ग की उपेक्षा का असर सुझाव संकलन के समय स्पष्ट दिखा । मधेश की जनता स्वतःस्फूर्त रूप में सड़क पर थी । मधेश को छावनी में तब्दील कर दिया गया था और सुझाव संकलन केन्द्र पर जनता से अधिक प्रहरियों की संख्या थी । सुझाव संकलन के नाम पर महिलाओं से बदसलूकी, लाठीचार्ज, अश्रुगैस और अमानवीयता की हद तो यहाँ तक दिखी कि बच्चे भी प्रशासन के कहर से बच नहीं पाए । यहाँ भी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री तमाशबीन बने रहे । देश जलता रहा और सत्ता खामोश रही । कैलाली की घटना जो आज भी रहस्य बनी हुई है । कितनी लाशें बिछ गईं, जिनकी सही संख्या आज भी जनता के सामने नहीं आ पाई । कैलाली की घटना के बाद सेना के साए में जो खेल खेला गया, उस दर्द को वहाँ की जनता आज भी नहीं भूल पाई है । चुन–चुन कर समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया, वह भी प्रशासन और सेना की संरक्षता में और हमारी सरकार उस वक्त भी इस घटना का मूक गवाह बनी रही ।
विश्व का उत्कृष्ट संविधान देने का दावा
२० सितम्बर को देश ने नए संविधान को हासिल किया, जो अपनी ही जनता के रक्त से सराबोर था । ४० से अधिक मधेशी अपनी जान की आहूति दे चुके थे । मानव अधिकार का खुलेआम हनन हो रहा था । निरीह जनता को पेशेवर अपराधियों की तरह भुना जा रहा था । ऐसी मौत उन्हें दी जा रही थी जिसे देखकर रुह काँप जाय, पर नहीं काँपी तो हमारी सरकार की आत्मा । जिन्होंने मौत को मजाक की तरह देखा और मधेश में जल रही असंतोष की आग को अपनी बोलियों और उपेक्षाओं से और भी हवा दी । एक ओर मातम था, तो दूसरी ओर दीवाली मनाई गई । महीनों से आन्दोलित मधेश की जनता ने फिर भी अपने संयम का परिचय दिया । अपने ही अधिकार का हनन होते उन्होंने देखा । संविधान में ऐसा कुछ नहीं था जिसकी खुशियाँ मनाई जा सके । काठमांडू की सड़कों पर दीवाली मनाई जा रही थी और मधेश के घरों में लाशें रखी हुई थीं । सरकार से कफर््यू हटाने की गुहार लगाई जा रही थी, ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जा सके ।
सरकार दावा करती रही कि, उसने विश्व का उत्कृष्ट संविधान नेपाल की जनता को दिया है । किन्तु इसकी उत्कृष्टता पर भी सवाल खड़े हो गए, जब पड़ोसी राष्ट्र भारत और अमेरिका आदि कई देशों ने जारी संविधान का स्वागत नहीं किया । मधेश मरता क्या न करता वाली स्थिति से गुजर रहा था क्योंकि राज्य की नजर उस तक पहुँच ही नहीं रही थी । काठमान्डौ अपनी गति से चल रहा था और तभी मधेश ने निर्णय लिया कि नाका अवरुद्ध किया जाय । मधेश के इस निर्णय ने एक समुदाय विशेष में तो तहलका ही मचा दिया । सरकार अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालने के लिए जनता के मन में राष्ट्रवाद का बीज बोने में सफल रही और देश स्पष्ट रूप से दो धार में बँट गया । खुलकर सामाजिक संजाल में मधेश और भारत के विरुद्ध गालियों का दौर शुरु हुआ जो आज तक कायम है । नाकाबन्दी की आड़ में और सरकार की संरक्षण में कालाबाजारी चरम सीमा पर है, जिसपर कोई नकेल सत्ता की ओर से नहीं कसी जा रही है । इतना ही नहीं विश्व के सर्वोत्कृष्ट संविधान को जारी करने वाले फिलहाल संविधान के सौ दिन पूरे होते न होते स्वयं संशोधन की माँग कर रहे हैं, इससे बड़ी पहचान क्या हो सकती है संविधान की उत्कृष्टता की ?
नेपाल का नया नेतृत्व
कुर्सी की दौड़ में सबसे आगे चल रहे खड्गप्रसाद ओली को नेपाल का नेतृत्व सौंपा गया । उम्मीद थी कि अपनी बेतुके बोलियों के तीर चलाने वाले ओली देश की सत्ता सम्भालने के बाद सम्भवतः गम्भीर हो जायेंगे, किन्तु ऐसा नहीं हुआ । आन्दोलित मधेश के लिए उनका रवैया पूर्ववत है । पड़ोस को दिखाने के लिए वार्ता के ढोंग भी जारी रहे और दमन भी । जब–जब लगा कि कुछ सकारात्मक होने वाला है, तब–तब सत्ता ने ऐसा कुछ किया कि मधेश अशांत होता गया । चार महीनों से अनवरत रूप से जारी आन्दोलन ने अब तक अपने संयम को नहीं खोया है । सत्ता ने हर सम्भव कोशिश की कि शांतिपूर्ण आन्दोलन को कमजोर किया जाय, मधेशियों को उकसाया जाय, ताकि विश्व राजनीति में मधेश आन्दोलन एक हिंसक आन्दोलन के रूप में जाना जाय । इसकी ही एक कड़ी थी विवाह पंचमी में देश के राष्ट्रपति का जनकपुर भ्रमण । उनकी सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए यह आगाह किया गया कि, उनका जनकपुर जाना सही नहीं है । किन्तु एक सोची समझी नीति के तहत उन्हें वहाँ भेजा गया । सरकार जानती थी कि आन्दोलित जनता विरोध अवश्य करेगी क्योंकि, राष्ट्रपति के जनकपुर आगमन से पूर्व उनका पुतला दहन किया जा चुका था । शाक्ति प्रदर्शन के साथ राष्ट्रपति का जनकपुर भ्रमण सम्पन्न हुआ और परिणाम यह हुआ कि मंदिर परिसर रणभूमि में परिणत हो गया और सदियों से चली आ रही परम्परा भी बाधित हुई । इस घटना को महिला अपमान के प्रकरण से जोड़कर एक बार फिर समुदाय विशेष को उकसाने की कोशिश की गई । अभी यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि मधेश मोर्चा के नेता और सद्भावना के अध्यक्ष राजेन्द्र महतो के ऊपर लाठी चार्ज करा कर सरकार वार्ता के रास्ते को तत्काल बन्द कर चुकी है । जनता एक बार फिर लाखों की संख्या में रोज सड़कों पर उतर रही है और अपने आक्रोश को प्रकट कर रही है । आन्दोलन की नई नीति तय की जा रही है ।
अब आगे क्या ?
मधेश आन्दोलन को बार–बार भारत से जोड़कर, मधेशियों को बिहारी और भारतीय कह कर दुत्कारना यह तो एक परम्परा सी बन गई है । मधेश की राष्ट्रीयता, वहाँ के लोगों की नागरिकता इन सब पर सन्देह और ्राज्य की ओर से वर्षों से दी जा रही विभेद की पीड़ा ने, मधेश की जनता को उस मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है, जहाँ से वो पीछे नहीं हट सकती । युवावर्ग किसी भी हाल में अपने अधिकार को पाने के लिए डटी हुई है । सरकार सम्बोधन में जितनी देर कर रही है, उतना ही युवाओं का मन राज्य के इस व्यवहार से उद्वेलित हो रहा है । अधिकार की माँग, कहीं ना कहीं स्वतंत्रता की माँग बनती जा रही है । इतिहास के पन्नों को उलटा जा रहा है । कल तक जो अपने इतिहास से अपरिचित थे, आज वो भी जानना चाह रहे हैं और यह कहने लगे हैं कि उपहार में दिया गया मधेश अब स्वतंत्र होना चाहिए क्योंकि, सरकार को मधेश चाहिए मधेशी जनता नहीं । अगर सरकार की यही नीति रही तो आज जो भावना कुछ दिलों में है, वह सम्पूर्ण मधेश की भावना बन जाएगी । सरकार को यह समझना होगा कि मधेश पूर्वाधार विहीन नहीं है । उसके पास विश्व राजनीति में स्वतंत्रता के कई उदाहरण भी हैं और अपना आधार भी । कल तक जिस मधेश के नाम से विश्व अपरिचित था आज मधेश की उपस्थिति वहाँ दर्ज हो चुकी है । वक्त अब भी है सचेत होने की और देश को विखण्डन से बचाने की । अगर सरकार यह सोचती है कि मधेश आन्दोलन दम तोड़ देगा, तो वह उनकी सबसे बड़ी भूल साबित होगी क्योंकि, अधिकार पाने की ललक और स्वतंत्र होने की चाहत, अगर दिलों में बैठ जाय तो वह इतनी बलशाली होती है कि, उसे कोई नीति, कोई दमन या कोई चाल दिलों से निकाल नहीं सकती । समय लग सकता है किन्तु यह कटु सत्य है कि जीत सत्ता की नहीं जनता की होती आई है । निरंकुशता भी अपना सर झुकाती है, जब जनता खुद पर आ जाती है ।

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