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मधेश की मिट्टी खून से सींचित है, आंदोलन मरा नहीं जीवित है : श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति,काठमांडू,17 फरवरी ।

ग्रीक की मिथकीय कथाओं में एक पक्षी की चर्चा होती है फिनिक्स की, जो अमरता का प्रतीक है, जो दीर्घायू होता है और जिसमें मृत्यु के पश्चात् अपनी ही राख से पुनः जीवित होने की क्षमता होती है

 received_791701994290064आज देश में मधेश आन्दोलन को लेकर जो चर्चा–परिचर्चा हो रही है, उसके सन्दर्भ में इस पक्षी की याद आ गई । जो यह सोचते हैं कि मधेश थक गया, या मधेश आन्दोलन शिथिल हो गया, उन्हें यह सोचना होगा कि मधेश आन्दोलन उसी फिनिक्स की तरह है, जो एक बार नहीं बार–बार जन्म लेगा और तब तक लेगा जब तक मधेशी मिट्टी उर्वरा है । सच तो यह है कि रेगिस्तान को भी अगर ईमानदारी और लगन से सींचा जाय तो हरियाली वहाँ भी आती है । मधेश की मिट्टी तो खून से सींचित है, वो भला बाँझ कैसे हो सकती ? यह अलग बात है कि बादल के एक टुकडेÞ ने सूर्य को ढंका हुआ है पर यह भी सर्वविदित है कि यह अस्थाई होता है क्योंकि, सूर्य की प्रखरता को कोई रोक नहीं सकता और न ही खत्म कर सकता है । 

आज जो दिख रहा है वो यह कि, सत्ता के दूतों और दलालों का खेल जारी है । पूरी की पूरी भ्रष्ट और सत्तालोलुप व्यवस्था बदलाव के विरुद्ध है और यथास्थिति को बनाए रखने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद के साथ तैयार है । जब–जब उनके निहित स्वार्थों पर खतरा मँडराता है तब–तब वो अपनी स्वार्थसिद्धि को पूरा करने में लग जाते हैं और जनता की भावनाओं के साथ खेलते हैं । जनता कुछ क्षण के लिए तमाशबीन बन जाती है, क्योंकि हम सब करिश्मों के प्यासे हैं, हमें यह लगता है कि कोई ना कोई करिश्मा होगा । परन्तु यह भी एक सच है कि, यह मोहबंध बहुत जल्द खुलता है और जनता यथास्थिति से परिचित भी होती है । मधेश ने जो सदियों से भोगा है और पिछले सात महीनों में जो सत्ता और नेता ने मधेश की जनता के साथ किया है, उस दर्द को वहाँ की जनता कभी भूल ही नहीं सकती । इसलिए आन्दोलन मरा नहीं है, वह वहाँ के जन–जन में जीवित है और एक बार फिर अपनी शक्ति सींचित कर पुनः उठेगा फिनिक्स की तरह और लड़ेगा अपनी पहचान और अधिकार के लिए । हाँ जनता हतोत्साहित अवश्य है, पर निराश नहीं और यह हतोत्साहन भी उन्हें अपने प्रतिनिधियों से ही मिला है । अगर मधेशी प्रतिनिधि ईमानदार हो जायँ और एक हो जायँ तो आज भी मधेश उनके साथ है ।

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received_10206963112009303आज अगर राजेन्द्र महतो, उपेन्द्र यादव, महन्थ ठाकुर अपने वर्चस्व वाली मनःस्थिति का त्याग करें और मधेश की हर छोटी बड़ी पार्टी को साथ लेकर चलें तो आज भी बाजी उनके हाथ में है । किन्तु उनकी विभाजकता ही सफलता में सबसे बड़ी बाधक सिद्ध हो रही है । जब आन्दोलन चरम सीमा पर था तब महन्थ जी और उपेन्द्र यादव में वो तत्परता नहीं दिख रही थी जो दिखनी चाहिए थी, वो सिर्फ बयान दे रहे थे और राजेन्द्र महतो के बढ़ते कद को लेकर चिंतित थे । आज वो जिस तरह मधेश की जनता के पास जा रहे हैं या आन्दोलन को लेकर बयान दे रहे हैं, यह उस समय शांत थे जब इसकी सबसे अधिक जरुरत थी । आज भी कुछ बिगड़ा नहीं है । अभी भी मधेशी मोर्चा को उन सबको साथ लेकर चलना चाहिए जो किसी ना किसी रूप में मधेश मुद्दा को लेकर आगे बढ़ रहा है । आवश्यकता जुड़ने की है टूटने की नहीं । आज कुछ ऐसे हैं जो भारत पर यह आरोप लगा रहे हैं कि भारत ने बेइमानी की या साथ नहीं दिया । पर वो ये क्यों नहीं सोचते कि अगर भारत ने अप्रत्यक्ष साथ नहीं दिया होता तो आज लाशों की संख्या इतनी होती कि गिनती मुश्किल होती । भारत ने हमेशा मधेशी नेताओं को कहा है कि आप एक हों किन्तु मधेशी नेता यही नहीं कर पाए । अब भारत नेपाल में भारतीय सेना परिचालन कर नेपाल की अक्षुण्ण्ता और अस्मिता के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर सकता ? इसलिए कमी अपने में तलाशने की जरुरत है ताकि नीति में बदलाव कर पाएँ और मधेश के हक में एक साथ जुट पाएँ । सत्ता आज भी मधेश के प्रति ईमानदार नहीं है । आन्दोलन समाप्त होने के बाद भी महोत्तरी, धनुषा, बारा पर्सा में आन्दोलनकारियों को धर–पकड़ करने का काम कर रही है । अगर सत्ता की नीयत साफ होती तो, यह उन प्रहरियों के खिलाफ कदम उठाती जिसने नृशंस होकर मधेशियों की हत्या की किन्तु वहाँ गृहमंत्रालय मौन है । इन सभी हालातों से निपटने के लिए और अपनी आवाज मजबूत करने के लिए एक होना ही सबसे बड़ी आवश्यकता है ।

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