यथार्थपरक विचारों का सम्प्रेषण ही हमारा, परम कर्तव्य होना चाहिए: गंगेश मिश्र
गंगेश मिश्र , कपिलबस्तु , २९ अगस्त |
” शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले;
वतन पर मरने वालों का, यही बाकी निशाँ होगा।”
” मधेश आन्दोलन के दौरान दिवंगत हुए, वीर सपूतों को हार्दिक श्रद्धान्जली अर्पित करता हूँ। जिन्हें कभी भूलाया नहीं जा सकता, जिनकी क़ुर्बानी की वीर गाथा, मधेश की फ़िज़ाओं गूँजती रहेगी।” 
वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबको है, जिसका प्रयोग हर कोई कर सकता है बशर्ते यथार्थपरक विचारों का सम्प्रेषण ही हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए।
” मधेश आन्दोलन को जैसी उँचाई मिलनी चाहिए थी, नहीं मिल पाई; आख़िर क्यों ?”
सिर्फ़ हवा-हवाई की बातें न करें, तो स्पष्ट है; मधेश आन्दोलन एक अक्षम नेतृत्व के हवाले रहा जो ख़ुद दिग्भ्रमित थे।ऐसे लोगों से अधिक उम्मीद भी नहीं थी, हाँ मधेशी जनमानस अपने अधिकारों के प्रति जागरूक अवश्य हुआ; इसीको इस आन्दोलन की उपलब्धि कहकर अपनी पीठ थपथपाई जा सकती है। राजनैतिक आचरण के बिना, संगठनात्मक रूप से कोई भी राजनीतिक दल सबल नहीं रह सकता; मधेशी दलों का सबसे दुर्बल पक्ष यही है।सांगठनिक रूप से मधेश का कोई भी दल, अन्य पहाड़ीवादी दल को मधेश में ही चुनौती नहीं दे सकता।
” हम थे जिनके सहारे, वो हुए न हमारे;
डूबी जब दिल की नैया, सामने थे किनारे।”
ये कहना गलत नहीं होगा कि मधेश ने लगड़े घोडों पर दाँव लगाया; जो जीतने से रहे।सोते-जागते कुर्सी का ध्यान लगाए, मधेश-मधेशी चिल्लाने वालों ने ही मधेश आन्दोलन को उद्देश्यहीन बना डाला।जहाँ पार्टी की पहचान जाति बन जाय, जहाँ कोई किसीको नेता मानने को ही तैयार न हो, तो हो चुका कल्याण उस वर्ग का । अब मधेश को नेताओं की नहीं, युवा जनशक्ति की आवश्यकता है; जो अपने अधिकारों के लिए, मधेश के सम्मान के लिए लड़े, कुर्सी के लिए नहीं।

