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कुछ आग नही लगती अब भी

 
डा.मुकेश झा
madhesh
कुछ आग नही लगती अब भी?
कुछ साज नही सजती अब भी?
क्रांति की डोली उठ गई है क्या बाँह नही फड़की अब भी ?
जरा याद करो उस वक्त की
तुम जब सर में गोली मारी थी
रोये थे हम सब चिल्लाकर
उन ने मारी किलकारी थी।
बच्चे बूढ़े नौजवां ही क्या
बहुएं बेटी कुर्बान हुई
उस दिन को कैसे भूलें हम
जिस दिन अस्मिता लिलाम हुई
संघर्ष हमारा जारी है
चाहे वह हम पर भारी हैं
लड़ेंगे अंतिम साँस तक हम
यह धर्म युद्ध तो न्यारी है।

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