ओली की नादानी : गंगेश कुमार मिश्र
गंगेश कुमार मिश्र, कपिलबस्तु, ४, नवम्बर |
ओली की नादानी ..
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पूर्ववत् !
चर्चा में चहुँओर,
ओली की नादानी है।
दम्भ भरे कुटिल से,
उम्मीद करना ही,
बेईमानी है।
ये एक कुनबे के सरदार हैं,
और मानसिक बीमार हैं,
तब भी,
जब पद पर थे।
अब भी,
जब पद पर नहीं।
हममें भी तो,
चेत नहीं,
कहाँ से जीतते हैं, ओली भैया ?
जो नाच दिखाते ताताथैया।
इनका सामाजिक,
बहिष्कार करो,
मत इनको स्वीकार करो।
परन्तु होता नहीं ऐसा;
जो शहीद हुए,
वो कौन थे ?
हममें से थे।
उनमें से कोई नहीं था,
जो गाहे-बगाहे,
लालबत्ती के लिए,
अपनी अस्मिता की,
बोली लगाने से नहीं चूकते।
ओली जी वज़ूद,
ओले से अधिक नहीं,
जो चोट पहुँचा कर,
ख़ुद भी नष्ट हो जाते हैं।
और हम,
इन्हें बे-वज़ह,
मशहूर कर जाते हैं।


