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कांग्रेस,एमाले और माओवादी को स्पष्ट हो कि उनकी नीयत क्या है ? लिलानाथ गौतम

 

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लिलानाथ गौतम, काठमांडू,३ जनवरी | कहने के लिए तो सभी राजनीतिक दल कह रहे हैं– संशोधन के लिए हमारी पार्टी तैयार है । कैसे संशोधन कर सकते हैं, इसमें कोई भी स्पष्ट नहीं है । जब संशोधन के लिए क्या करना है, इसमें खुद विश्वस्त नहीं हो सकते हैं तो पड़ोसी देशों को आरोप लगाया जाता है कि संविधान संशोधन में विदेशी शक्ति राष्ट्र का दबाव है । इस तरह आरोप लगाने वालों के लिए दूसरा बहाना भी सामने ही आ रहा है । वह है– पूर्वराजा ज्ञानेन्द्र शाह का विदेश भ्रमण । संविधान संशोधन सम्बन्धी विषयों को लेकर यहाँ गर्मागर्मी हो रही है, ऐसी ही अवस्था में पूर्वराजा शाह सिंगापुर भ्रमण में निकल चुके हैं । बताया जाता है कि वह सिंगापुर हो कर भारत भी जानेवाले है । और वहाँ अनौपचारिक रुप में उच्च राजनीतिक बातचीत भी होने जा रही है । अनावश्यक बहस करने के लिए यह भी बहाना हो सकता है । उसका संकेत भी आ चुका है । राजावादी पार्टी के रुप में परिचित राप्रपा नेपाल के नेता कहने लगे हैं– अगर संविधान, संशोधन करना है तो नेपाल को पुनः हिन्दू राज्य घोषणा करना पड़ेगा । उनकी चेतावनी है कि नहीं तो फिर संविधान अस्वीकार्य होगा । इस तरह मांग रखने वालों की संख्या बहुत है । आश्चर्य की बात तो यह है कि जो इस तरह की मांग रखते हैं, वह भी वहीं है, जहाँ से यह मांग सम्बोधन हो सकता है । अर्थात् मांग रखनेवाले हरेक पार्टी तथा राजनीतिक दल संसद् में प्रतिनिधित्व करते हंै । और वही संसद, ऐसी मांग को सम्बोधन कर सकता है । संसद् में अपनी मजबूती दिखाने के बदले हर राजनीतिक दल सड़कों में आकर तमाशा दिखाते हैं और जनता को परेशान करते हैं । खैर ! मांग रखना जितना सहज होता है, उसको पूरा करना उतना असहज । अभी हाल राजनीति में जो परिदृश्य सामने आया है, उसके पीछे यह भी एक कारण है ।

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शुरु में ‘एक मधेश प्रदेश’ के नारे को आगे लाकर राजनीति में स्थापित होनेवाल मधेशवादी शक्ति अभी दो प्रदेश के लिए तैयार है । शुरु में नेपाल को १६ प्रदेश में बँटवारा करने के लिए मरमिटने वाले माओवादी अभी ७ प्रदेश को स्वीकार कर रहा है । इसी तरह शुरु में कांग्रेस–एमाले कहते थे– ‘नेपाल में संघीय राज्य आवश्यकता ही नहीं है, अगर बनाना ही है तो ३ अथवा ५ प्रदेश तक बना सकते हैं ।’ वही कांग्रेस–एमाले अभी ७ प्रदेश स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं । इसीलिए यहाँ न किसी की मांग शतप्रतिशत सम्बोधन हुई है और ना ही होगी । अब होने वाला संविधान–संशोधन में भी यही होगा, जहाँ किसी की भी शतप्रतिशत मांग सम्बोधन होने वाली नहीं है ।

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मधेशवादी दल भी यह सत्य जानते हैं कि तराई में सिर्फ दो प्रदेश सम्भव नहीं है । इसलिए सभी को लचीला होना ही है । अनौपचारिक रुप में सार्वजनिक समाचार के अनुसार मधेशवादी शक्ति सुनसरी और कैलाली जिला में रहे मधेशी तथा थारु बाहुल क्षेत्र को क्रमशः २ नम्बर और ६ नम्बर प्रदेश में रख कर सहमति करने के लिए तैयार हैं । यह बात औपचारिक रुपमें बाहर तो नहीं आया है लेकिन इस सूचना में थोड़ासा भी सत्यता है तो इस को सकारात्मक रुप में लेना पड़ेगा, यह उनकी लचकता हो सकती है । लेकिन संविधान संशोधन के लिए अपने को राजी कहने वाले दूसरे पक्ष, कांग्रेस–एमाले और माओवादी किस हद तक लचीला हो सकते हंै, यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है । ये तीन दल के नेता बाहर मीडिया में कहते हैं– संशोधन के लिए हमारी पार्टी तैयार है । लेकिन भीतर अपने कार्यकर्ता को कहते हैं– १ नम्बर और ५ नम्बर प्रदेश को बिगाड़ना नहीं है, उसके लिए तैयार रहना । ऐसी ही राजनीति करते हैं तो बात साफ है– सीमांकन पुनरावलोकन नहीं हो सकता । अगर सीमांकन पुनरावलोकन नहीं हो पाएगा तो संविधान का संशोधन भी सम्भव नहीं है ।
इसीलिए विशेषतः कांग्रेस–एमाले और माओवादी को स्पष्ट होना चाहिए कि उनकी नीयत क्या है ? अगर सीमांकन में कोई अदला–बदली नहीं किया जा सकता तो आन्दोलनरत पक्ष को इसका जानकारी देना चाहिए और अपनी ओर से नये निर्वाचन की तैयारी करनी चाहिए । कांग्रेस–एमाले और माओवादी एकजुट हो जाते हैं तो स्पष्ट बहुमत भी हो सकता है । दो तिहाई बहुमत वाले राजनीतिक शक्ति के द्वारा चुनाव किया जाता है तो दुनियाँ में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं हो सकती कि उस चुनाव को अवैध घोषणा करे । नहीं असन्तुष्ट पक्ष को समेटना है, मांग सम्बोधन करना है और उसके लिए सीमांकन पुनरावलोकन के लिए राजी हैं तो कैसे कर सकते हैं, उसमें स्पष्टता होनी जरूरी है । अगर दोनों ही नहीं करते हैं तो ऐसे दलों की नीयत क्या है ? यह जानने के लिए जनता को सड़क में आना ही होगा ।

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