Sun. Aug 16th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

पंचायत से लोकतंत्र तक का सफर कितना बदला नेपाल ? नवीन मिश्रा

 

संविधान तो बन गया है लेकिन अभी इसके सभी पक्षों का कार्यांवयन नहीं हो सका है । मधेशियों को राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक रूप में नेपाल की मूल धारा में नहीं लाना, उन पर अविश्वास करना, उनकी राष्ट्रीयता तथा समर्पण के प्रति शंका करना, जैसी बातें दीर्घकालीन चुनौती के रूप में उजागर हो सकती है । अतः जल्द से जल्द मधेशियों को समेट कर ले जाना राष्ट्रहित में है ।

m+g+p

नवीन मिश्रा
नेपाली राजनीतिक इतिहास में पुस १ गते २०१७ साल एक काला दिन था । इस दिन को बीते हुए लगभग पांच दशक हो गए हैं । हमने लगभग तीस वर्षों से प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया है । लेकिन क्या अभी भी हम अधिनायकवादी प्रवृत्ति से निजात पाने में सक्षम हुए हैं । प्रजातंत्र मात्र एक सिद्धांत नहीं, व्यवहार है । देश न जाने कितने संक्रमणकालीन अवस्था से गुजर चुका है और देश की राजनीति अभी तक स्थायित्व प्राप्त नहीं कर सकी है । बीच–बीच में लोकतंत्र के विरुद्ध अधिनायकवादी शक्तियां अपना सिर उठाने की जुगत में लगे रहते हैं । लेकिन उन्हें ऐसा करने का मौका नहीं मिलता है, क्योंकि राजा महेंद्र ने जिस समय शासन सत्ता अपने हाथ में लिया था, उस समय और आज की राजनीतिक परिस्थिति बिलकुल भिन्न है । आज का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिवेश लोकतंत्र के अनुकूल है ।
लोकतंत्र की परिभाषा, संरचना तथा स्वरूप के विषय में मतभिन्नता हो सकती है । कुछ लोग अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के पक्षधर हैं, तो कुछ संसदीय शासन प्रणाली के तो कुछ लोग प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रधानमंत्री की वकालत करते हैं । लेकिन यह सभी बातें लोकतंत्र के भीतर ही आती हैं । लोकतांत्रिक मूल्य और मान्ंयता के विषय में किसी भी प्रकार का द्वन्द्व नहीं है । सिर्फ संरचना के सम्बन्ध में ही विचारों में भिन्नता है । हमारे यहां क्षेत्रीय और जातीय विविधता है । इनको लोकतांत्रिक संरचना के अंतर्गत किस प्रकार समेटा जाए, यह महत्वपूर्ण विषय है । संविधान निर्माण प्रक्रिया से लेकर इसके कार्यान्वयन तक इसी विषय में द्वन्द्व है । संविधान निर्माण के बावजूद इसके कार्यान्नवयन में यही सबसे बड़ी बाधा है ।
संविधान अगर पूर्ण रूप से कार्यान्वयन हो जाता है तो राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया पूर्ण रूप से बदल जाएगी । संसद के दो सदन हो जाएंगे और निर्वाचन मण्डल के द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव होगा । प्रधानमंत्री संसद से ही निर्वाचित होंगे लेकिन मंित्रपरिषद् में २५ से अधिक मंत्री नहीं होंगे । अभी इसकी संख्या तय नहीं है । अविश्वास के प्रस्ताव के लिए भी सीमा तय की जाएगी, जो अभी नहीं है । २०६२÷०६३ का राजनीतिक परिवर्तन राष्ट्रीयता के प्रतिकूल था । २०१७ साल में राजा महेंद्र ने भारत विरोधी कार्ड का उपयोग किया । राजा के पास प्रधानमंत्री, मंत्री को नियुक्त करने या बर्खास्त करने का संवैधानिक अधिकार था । २००७ साल के परिवर्तन का एक मुख्य कारण भारत था । उस समय की भारतीय सत्ता तथा राजनीतिक संदर्भ नेपाली लोकतंत्र के अनुकूल था । नेपाली कांग्रेस का भारतीय समाजवादियों के साथ घनिष्ट सम्बंध था । भारत नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना के लिए कटिबद्ध था । राजा महेंद्र ने जब लोकतंत्र का गला घोंटा तो भारत विरोधी मनोविज्ञान से ग्रसित हो यह तर्क दिया कि देश में राष्ट्रीयता और सार्वभौमिकता कमजोर हो गई है । उसने यह भी कहा कि लोकतंत्र विदेश से आयातित कर लाया गया है और पंचायती व्यवस्था नेपाल के हवापानी और मिट्टी के अनुकूल है । राष्ट्रीयता की ही आड़ में महेंद्रकाल में नेपाली भाषा व्यापक रूप से प्रचलन में आयी । हिंदी भाषा के लिए २००७ साल में भी आंदोलन हुआ था लेकिन २०१७ साल के बाद हिंदी एक सम्पर्क भाषा के रूप में स्थापित हुई । मधेश क्षेत्र में भारतीय पाठ्यक्रम पढ़ाई हो रही थी तथा नेपाल में भारतीय रूपये का प्रचलन था । नेपाल एक भिन्न राष्ट्र है इसकी पहचान की बड़ी समस्या थी । इसी के बाद स्कूली शिक्षा का नेपालीकरण का काम शुरु हुआ । उस समय राष्ट्रीयता को इसी रूप में परिभाषित किया गया लेकिन आज की परिस्थिति भिन्न है । हमारे देश में भाषिक तथा जातीय विविधता है । २०४६ साल के परिवर्तन के पश्चात् नेपाल को सरकारी कामकाज की भाषा तथा अन्य को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया गया । अभी के संविधान में प्रदेश स्तर तक स्थानीय भाषा के प्रयोग की छूट दी गई है । क्या इससे हमारी राष्ट्रीयता कमजोर हुई है ? उस समय राजनीतिक दल प्रतिबंधित था तथा विविधता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी । अनेकता में एकता पर बल दिया गया था । लेकिन आज के दिन में ये बातें असांदर्भिक हैं ।
यह भी तर्क दिया जाता है कि पंचायत काल में देश का विकास हुआ, जैसे कि पूरब–पश्चिम राजमार्ग का निर्माण । लेकिन इस राजमार्ग को २०४६ साल तक भी पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकी । जिस राजमार्ग को तीस वर्षों में भी पूरा नहीं किया जा सका, उसे हम कैसे विकास मान सकते हैं ? जबकि उस समय देश की आबादी कम थी और विकास करने की पर्याप्त संभावनाए थीं । विकास निर्माण की चुनौती कम थी । उस समय अगर विकास हुआ होता तो आज देश की स्थिति भिन्न होती । आज राज्य के पास पर्याप्त विकास करने के लिए जमीन सुलभ नहीं है । कुछ छोटे–मोटे जलविद्युत परियोजनाओं के अतिरिक्त कोई उल्लेखनीय काम नहीं हुआ । पंजायत काल में भी कोसी और गण्डक बेचने का आरोप लगा । गोरखापत्र को भी कागज बाहर से ही निर्यात करना पड़ता था । उस समय साझा अवधारणा के तहत साझा यातायात, साझा स्वास्थ्य तथा साझा प्रकाशन की शुरुआत की गई, लेकिन यह विफल हो गया । आज सहकारिता की भावना देश में सफल हो रही है ।
महेंद्र ने जिस समय सत्ता अपने हाथ में लिया, उस समय विश्व में प्रजातंत्र विरोधी माहौल था । उदाहरण के लिए सन् १९६२ में सेना ने बर्मा का शासन अपने हाथ में ले लिया । पाकिस्तान में इससे पहले ही अयुब खां ने सत्ता अपने हाथ में ले लिया था । इंडोनेशिया में भी प्रजातंत्र विरोधी लहर व्याप्त थी । इस प्रकार की अधिनायकवादी प्रवृत्ति से महेंद्र का मनोबल बढ़ा । दूसरे १९६२ में भारत–चीन युद्ध के कारण दोनों देशों के सम्बंध बिगड़ गए थे । ऐसी पारिस्थिति में भारत के विरोध में चीन नेपाल का परोक्ष समर्थन बन गया था । प्रजातंत्र में विचारों की विविधता होती है । दलों का भी अलग–अलग दृष्टिकोण होता है । लेकिन इसे हम अस्थिरता और विभाजन का कारक मान लोकतंत्र विरुद्ध इसकी व्याख्या नहीं कर सकते हैं । लेकिन राजा महेंद्र ने इन बातों का अपने पक्ष में व्यापक प्रचार–प्रसार कर बहुदलीय प्रजातंत्र को नेपाल के लिए अनुपयुक्त करार दिया ।
अभी देश में गणतंत्र है, अधिनायकवाद का खतरा बिलकुल ही नहीं है क्योंकि राजा अब सेना का प्रयोग कर सत्ता हथिया नहीं सकता है । अभी की अवस्था में नेपाल की भू–राजनीति तथा आंतरिक अवस्था के कारण सेना का स्वतंत्र प्रयोग सम्भव नहीं है । देश में दक्षिणपंथी अतिवाद की सम्भावना जरुर है । लोकतंत्र के नाम में निरंकुशता स्थापना की भी संभावना दिखती है । लेकिन संघीयता के कारण देश के विखंडन की बात बेईमानी है । राजनीतिक दलों और नेताओं की हठधर्मिता के कारण निरंकुशता उपज सकती है । ऐसे में देश में अव्यवस्था बढ़ सकती है ।
देश में परिवर्तन के कारण गणतंत्र, संघीयता तथा धर्मनिरपेक्षता की व्यवस्था कानून सम्मत है । धर्मनिरपेक्षता के अंर्तगत किसी भी धर्म के विरुद्ध कोई भी व्यक्ति अनास्था नहीं फैला सकता है । इसी प्रकार संघीयता का अर्थ देश विखंडन नहीं है । अभी इन चीजों को लागू करने के समक्ष कुछ चुनौतियां जरूर है । इस संदर्भ में कानून विहीनता बढ़ने की संभावना व्यापक है । हम अब संवैधानिक प्रणाली के अंतर्गत प्रवेश कर चुके हैं । संविधान तो बन गया है लेकिन अभी इसके सभी पक्षों का कार्यांवयन नहीं हो सका है । मधेशियों को राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक रूप में नेपाल की मूल धारा में नहीं लाना, उन पर अविश्वास करना, उनकी राष्ट्रीयता तथा समर्पण के प्रति शंका करना, जैसी बातें दीर्घकालीन चुनौती के रूप में उजागर हो सकती है । अतः जल्द से जल्द मधेशियों को समेट कर ले जाना राष्ट्रहित में है । उनकी भाषा, संस्कृति तथा जीवनशैली की रक्षा करते हुए उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक अवलम्बन तथा सम्मानपूर्वक जीवनयापन करने का अवसर प्रदान करना होगा । सच्चे अर्थों में नेपाल को चार जात छत्तीस वर्ण की फुलबारी बनाना आवश्यक है । विविधता को स्वीकार तथा सम्मान करने से नेपाली राष्ट्रीयता कमजोर नहीं बल्कि और भी मजबूत होगी ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com