Sun. Jan 19th, 2020

सीके राउत को गिरफ्तार करके देश बचाने की वकालत की जा रही है : श्वेता दीप्ति

dhyan

जब भी देश किसी निर्णायक मोड़ पर होता है और जनता की आंखें किसी परिणाम की उम्मीद करती है, तो एक सोची समझी नीति के तहत सत्ता ऐसा कदम उठाती है कि, जनता का ध्यान कहीं और जाकर अटक जाता है ।

श्वेता दीप्ति, २२ फरवरी | मौसम का अंदाज बदल चुका है । फागुन की बयार माघ में ही अपना रंग दिखाने लगी है, इसके साथ ही राजनीति का खेल जारी है और जनता मूक तमाशबीन बनी हुई है । असमंजस और अविश्वास का माहौल और सत्ता का असफल छह महीने । फिलहाल देश की वर्तमान अवस्था यही है ।

सरकार समझ नहीं पा रही कि वो क्या करे, देश बचाए या कुर्सी बचाए । वैसे नैतिकता कहती है कि देश सर्वोपरि है किन्तु स्वार्थ की राजनीति सत्ता पर आकर सिमट जाती है । देश की तीन बड़ी पार्टियां फिलहाल कुर्सी गिराने, कुर्सी बचाने और कुर्सी पाने की ओर अपनी अर्जुन दृष्टि जमाए हुए है । ऐसे में एक मोहरा उनके हाथों में आ गया है, डॉ. सीके राउत का, जिसे गिरफ्तार कर देश बचाने की जोरदार वकालत की जा रही है । जबकि देश बचाने, बनाने और संवारने की पूरी बागडोर इनके ही हाथों में है । बहरहाल, जनता तमाशबीन है और वह कांधा भी, जिस पर राजनीतिज्ञ अपनी स्वार्थ की बन्दूक रख कर चलाते हैं । जिसमें प्रयोग भी जनता होती है, प्रयोगशाला भी जनता ही होती है और परिणाम भी उन्हें ही भुगतना पड़ता है । जब भी देश किसी निर्णायक मोड़ पर होता है और जनता की आंखें किसी परिणाम की उम्मीद करती है, तो एक सोची समझी नीति के तहत सत्ता ऐसा कदम उठाती है कि, जनता का ध्यान कहीं और जाकर अटक जाता है । फिलहाल यही हो रहा है । जब जनता संविधान संशोधन और निर्वाचन की प्रतीक्षा में थी, तो उनका ध्यान राउत प्रकरण की ओर मोड़ दिया गया है । इतना ही नहीं निर्वाचन कराने की सिर्फ बातें हो रही हैं, प्रयास नहीं । खैर, यही राजनीति है जहां सब जायज है । देश की हर नियुक्ति, हर निकाय विवादित है । न्यायाधीश नियुक्ति विवादित थी और अब आइजीपी नियुक्ति पर विवाद कायम है । विवादों के बाद, दो वर्ष पुराने सत्यनिरूपण आयोग को एक वर्ष की अवधि और दी गई है देखना है कि निरर्थक दो वर्ष गुजारने के बाद अब यह कौन सा सार्थक कार्य करती है ।
जहां तक संविधान संशोधन और निर्वाचन की बात है तो, वैसे भी कमोवेश जनता भांप चुकी है कि न तो संशोधन सम्भव है और न ही आगामी जेष्ठ में निर्वाचन सम्भव है । देश की राजनीति एक बार फिर जोड़–तोड़ का मन बना चुकी है या यूं कहें कि उल्टी गिनती शुरु हो चुकी है । बस शून्य के आने का इंतजार है ।
आइए, हम सब इंतजार करें,
एक मूक इंतजार,
बस इंतजार ।
शांति और धैर्य का संदेश
हमें विरासत में मिला है
क्योंकि यह बुद्ध और
सीता का देश है ।
आइए, हम इंतजार करें ।   (फरवरी अंक की सम्पादकीय -इंतजार सिर्फ इंतजार) से ..

 

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