मधे शी दलों की अग्नि परीक्षा
मधे शी दलों की अग्नि परीक्षा
सत्ता से बाहर हो ने के बाद मधे शवादी दलो ं की अग्नि पर ीक्षा अगामी जे ठ १४ गते के बाद हो ने वाली है । उनका सत्ता मे ं बने र हना व वाहर आना दो नो ं ही मजबूरि याँ हो सकती है ं । ले किन मे धशी ने ताओ ं को अपने द्वार ा किए गए वादे को निभाकर मधे शी जनता का विश्वास जीतना हो गा ।
हमार े मधे शवादी दलो ं के ने ता चाहे लाख दलीले ं दे ं उन्हे ं सत्ता से अधिक मधे शी मुद्दे से प्यार है ले किन आज तक ऐ सा कोर् इ मौ का नहीं आया जब वो इस बात को साबित कर सके । लो गो ं को वो यही लगता है कि मधे शी ने ता बिना कर्ुर्सर्ीीे अधिक दिनो ं तक नहीं र ह सक ते है ं । ऐसे मे ं जे ठ १४ के बाद की जो परि स् िथति बनती है , उसमे ं मधे शी ने ता ओ ं का र ो ल क्या हो ता है , उससे हमार े ने ताओ ं का ही नहीं बल्कि मधे श का भी भाग्य निर्धार ण हो गा ।
संजीव मिश्रा
वीर गंज, पर्सर्ाामाओ वादी विवाद के लिए
प्रचण्ड ही जिम्मे दार
१० वषार्ंर्े तक महान जनयुद्ध कर ने तथा दे श मे ं र ाज नीतिक परिर् वर्तन लाने का दम्भ मार ने वाली माओ वादी पार्टर्ीीमे शा ही आन्तरि क विवादो ं के कार ण चर्चा मे ं र हती है । धीर े -धीर े आम माओ वादी कार्यकर्ताओ ं को भी लग गया है कि पार्टर्ीीे भीर त उपजे विवाद के लिए अध्यक्ष प्रचण्ड ही जिम्मे दार है । पार्टर्ीीे ं अपना दबदबा बनाने के लिए प्रचण्ड शर्ीष्ा ने ता ओ ं के बीच ही मतभे द पै दाकर अपना वर्चस् व कायम कर ना चाहते है । मौ का पर स् ती बार -बार र ंग बदलने के लिए मशहुर प्रचण्ड कभी मो हन वै द्य को पकडÞकर बाबूर ाम भट्टरर् ाई के खिलाफ बयानबाजी कर ते है तो कभी भट्टरर् ाई के साथ मिलकर वै द्य को किनार ा लगाने की को शिश कर ते है ं । प्रचण्ड के आचर ण से ही पार्टर्ीीमे शा ही आन्तरि क विवाद मे ं घिर ा हो ता है । संविधान सभा के सबसे बडÞे दल के रुप मे ं र हे माओ वादी अध्यक्ष के ऊपर सबसे अधिक जिम्मे वार ी है । औ र उन्हे ं इसका ज्ञान भी हो ना चाहिए । इसलिए सिर्फउनके आचार , विचार , व्यवहार सो च बदल जाने से दे श की र ाज नीति मे ं उसका व्यापक प्रभाव पडÞने की संभावना रहती है ।
अस् ितत्व शर्मा
भै र हवा
बुरे फंसे प्रधानमन्त्री
राजनीति के चक्रव्यूह में प्रधानमंत्री बुरी तरह से फँस गए है । प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद से ही झलनाथ खनाल की जो स्थिति है, वह अब तक शायद किसी प्रधानमंत्री की नहीं हर्ुइ । उन्हें ना तो पार्टर्ीीा सहयोग मिल रहा है और ना ही बाहर वालों का । एसे में उनके सामने ढेरों चुनौतियाँ हैं । शांति प्रक्रिया व संविधान सभा की चुनौतियाँ अलग से हैं । ऐसे में देश व संविधान के भविष्य के साथ खनाल के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह उठ गया है । ना जाने कब तक नेपाल की सत्ता उनका बोझ उठा पाएगी ।
सौरभ चौधरी
बरगाछी, विराटनगर
एक अच्छी शुरुआत
हिमालिनी में पिछले कुछ अंको से हमारी पुरानी परम्परा के बारे में प्रकाशित किया जा रहा है, जो एक सराहनीय काम है । हमारी पुरानी परम्परा को दकियानुसी विचार और ढोंग कहने वालों के लिए यह जबाब है कि हमारे पर्ूवजों के द्वारा स् थापित परम्परा का वैज्ञानिक आधार था, जो हमारी जीवन को सही दिशा एवं मार्गदर्शन करती है । इस स्तम्भ को निरन्तरता मिले यही पर््रार्थना है ताकि हम जैसे युवा पीढÞी को भी अपनी परम्पर ा व संस्कृति तथा सभ्यता का सही ज्ञान हो ।
चा“दनी अग्रवाल
रमना चौक, मुजफ्फरपुर, बिहार


