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नीले आकाश में….. : डॉ. सन्दर्भ गिरी

नीले आकाश में

मेरे गिटार का तार
टूटा हुआ है
मेरे कैनवास अभी मूक हैं
अक्षर घुटन से तैर रहा है
एक निश्चित ज़मीन की खोज में
भीतर अलग जहां है… सुनसान
सब ताल्लुक़ तोड़े हुए
लेखा थम कर…
एक सोच में डूबा है –
विस्तृत!

जीवन की पोशाक
भ्रामक मृगतृष्णा की बंद मुठ्ठियों में
अंधकार से भरपूर साम्राज्य में
रोशनी तलाश कर रही है
सर्द हिमालय की गोद में
नंगी जल रही आग
अपनी आक्रामकता को लेकर
उसी पर रखे पांव देख रहा हूँ।

नीले आकाश में
तुम्हारी मनमोहक छवि
लिखता हूँ रात की उदासी में
एककृत छुपे हुए चमकते
सितारे से संवाद करते हुए
मेरे जमे हुए आँसू से
मुझे आती है याद तुम्हारी
जीवन की एकाकीपन में
सूर्योदय की अपेक्षा लिए
भोर होने तक

तुम्हारे इंतज़ार में!

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