छोटी बेटी
लघुकथा
यों तो वह घर की छोटी बेटी थी। उम्र अभी केबल १२ वर्षकी ही थी। परन्तु बड समझदार हो गई थी और घर का पूरा ध्यान रखती थी। कभी-कभी तो माँ बडेÞ दुलार से कह भी देती- ‘तँू बिटियाँ नहीं होनहार बेटा है मेरा। खूब मन लगाकर कर पढÞनार्।र् इश्वर ने चाहा तो तू तो जानती है भाई की एक किडनी खराब हो चुकी है। और दूसरी कमजोर है। बस …. आज तो दबाइयों के सहारे ही चल रहा है। पता नहीं ….. कब तक चल पायेगा।’ बेटा ! तू तो अभी बहुत छोटी है। बडÞी हो जायेगी तो अपने ससुराल चली जायेगी। शादी में भी तो आजकल बहुत पैसा लगता है। नहीं …. नहीं …. माँ ! तुम लोगों को छोडÞÞ कर मैं कही नहीं जाउFmगी। किस पर भरोसा करुँ बेटी ! बापू का हाल तो तुससे छिपा नहीं है। आँखों से दिखता नहीं है। रास्ते में टकराकर, ठोकर खाकर कई बार गिर चुके हैं। हार कर कुछ जरुरी सामान, बिस्कुट, टाँफी आदि की छोटी सी दुकान घर पर ही लगानी पडÞी है। इस में भी कभी कोई ग्राहक चुपचाप सामान उठाकर ले जाता है तो कभी कोई कम पैसे देकर ही चला जाता है। मुझे तो घर के अन्दर भी उनकी रखवाली करनी पडÞती है। हर समय डर लगा रहता है कि पता नहीं कब किस से टकरा कर चोट लग जाय। तुम दुःखी मत हो माँ ! मैं … जरा बडÞी हो जाऊँ … सब सम्भाल लूँगी।
आज स्कूल में सामान्य विज्ञान की पुस्तक में उसने पढÞा कि किडनी का प्रत्यारोपण किया जा सकता है। तभी से वह कुछ सोचने लगी। जब घर आई तो माँ राशन लेने गई हर्ुइ थी। भाई किसी काम से बाहर था और बापू दुकान पर बैठे थे। पता नहीं, क्या सोचकर उस ने रसोई घर में रखा चूहे मारने का विषय खा लिया। माँ ने आकर देखा तो वह बेहोश पडÞी थी और उसके मुँह से झाग निकल रहा था। एक पडोसन की सहायता से माँ उसे तुरन्त अस्पताल ले गई परन्तु डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। उसके दाहिने हाथ की मुठ्ठी में छोटा सा एक कागज का टुकडÞा था। जिस में लिखा था- माँ ! मेरी दोनों किडनियाँ भैया के शरीर में प्रत्यारोपण करवा देना और दोनों आँखे पिताजी को लगादेना !



