Fri. May 24th, 2024

एमाले ने राष्ट्रवाद के नाम पर जो जख्म मधेश को दिया है वो मधेश भूला नहीं है



दो नम्बर प्रदेश यानि मधेश, फिलहाल चुनावी रंग से सराबोर है । मधेश का चुनाव चार धारों से होकर गुजर रहा है । पहला एमाले मुक्त मधेश, दूसरा चुनाव के पक्ष में, तीसरा बहिष्कारवादी और चौथा सीके राउत की धार । इस धार के भँवर में अगर किसी की कश्ती ज्यादा फँसी नजर आ रही है तो वह है एमाले की कश्ती । क्योंकि एमाले ने राष्ट्रवाद के नाम पर जो जख्म मधेश को दिया है वो मधेश भूला नहीं है । दो वर्ष पहले देश सुलग रहा था, जिसकी आग आज भी जिन्दा है, बस राख की परत जम गई है । गोलियाँ चल रही थीं और मधेश की निरीह जनता मौत को गले लगा रही थी । मौत भी ऐसी कि मानवता शर्मशार हो जाय पर वर्तमान सत्ता के न तो चेहरे पर शिकन थी और न ही संवेदना के दो बोल । इतना ही नहीं उन्हें इंसान मानने तक से इनकार कर रही थी ।

राजपा पर मधेश मुद्दों को छोड़ कर चुनाव में शामिल होने का आरोप है और एमाले पर संविधान संशोधन प्रस्ताव पारित न होने देने का आरोप, पर काँग्रेस इस बात की वाह वाही के साथ चुनाव प्रचार में लगी है कि उसने संविधान संशोधन की कोशिश की और चुनाव के बाद फिर उसे लेकर आगे बढेगी वहीं माओवादी अपने उस प्रयास का मुआवजा मधेश की जनता से माँग रही है जिसकी वजह से आंशिक तौर पर ही सही संघीयता का तोहफा मधेश को मिला है

आज वही मधेशी हैं वही मधेश है । सब कुछ वही है सिर्फ तारीखें और साल बदले हैं पर दिलचस्प यह है कि आज नजारा बदला हुआ है । आज भी वही काले और तथाकथित आयातीत मधेशी हैं पर आदेश देने वाली जुबान और हाथ फिलहाल गुहार कर रहे हैं । आज एमाले अध्यक्ष को बार बार यह स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है कि एमाले या वो स्वयं मधेश विरोधी नहीं है । परन्तु इसके बावजूद खुद को राष्ट्रहित के सबसे बड़े शुभचिन्तक रूप में स्थापित करने से पीछे नहीं हट रहे हैं । अपनी सोच को आज भी सही बताते हुए यही जाहिर कर रहे हैं कि उन्होंने जो कहा या किया, वो राष्ट्रहित के लिए किया । हालाँकि एमाले के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि उनकी पार्टी पूर्व परिणामों की ही तरह दो नम्बर प्रदेश में भी नम्बर एक रहेगी । साम, दाम, दण्ड, भेद इन सभी हथियारों का प्रयोग फिलहाल जोर शोर से शुरु है । देखना ये है कि मधेश किसका मोल चुकाता है । जिसने मधेश के लिए जान दी उसका, या वो सभी जो इस खेल को अंजाम दे रहे थे उनका । फिलहाल सभी यह दावा कर रहे हैं कि वो मधेश में नम्बर वन बन कर निकलेंगे । परन्तु चुनाव का परिणाम क्या होगा यह तो आनेवाला कल बताएगा क्योंकि जीत और हार के कई आधार होते हैं । वोट बिकते भी हैं, ठगे भी जाते हैं और छीने भी जाते हैं । पर मजे की बात तो यह है कि आज जो चेहरे पर शिकन दिख रही है आखिर उसकी वजह क्या है ? शब्दों और विभेद के तीर तो निकल चुके हैं, घाव दिख नहीं रहा पर जिन्दा तो है और यही कारण है कि आपको बार बार यह कहना पड़ रहा है कि आप मधेश विरोधी नहीं हैं और आप ही मधेश के मसीहा बन सकते हैं । संविधान संशोधन प्रस्ताव को असफल करने पर जिस चेहरे पर मुस्कुराहट थी, कमोवेश आज उनकी पेशानी पर एक शिकन तो है जो स्पष्टीकरण के लिए विवश कर रहा है ।
मधेशवादी दलों के विखण्डन का खामियाजा मधेशी दलों को भुगतना पड़ेगा और इसका फायदा काँग्रेस और माओवादी को मिलेगा । मधेशी पार्टियों को चुनाव से दूर रखा गया एक सोची समझी नीति के तहत और यही वजह थी कि उनके वोट बैंक सुरक्षित हो गए । दो नम्बर के लिए भी यही मंसूबे थे पर ऐसा हो नहीं पाया । कारण चाहे आन्तरिक दवाब रहा हो या बाह्य, मधेशी दल खास कर राजपा नेपाल ने चुनाव में जाने का निर्णय किया । राजपा पर मधेश मुद्दों को छोड़ कर चुनाव में शामिल होने का आरोप है और एमाले पर संविधान संशोधन प्रस्ताव पारित न होने देने का आरोप, पर काँग्रेस इस बात की वाह वाही के साथ चुनाव प्रचार में लगी है कि उसने संविधान संशोधन की कोशिश की और चुनाव के बाद फिर उसे लेकर आगे बढेगी वहीं माओवादी अपने उस प्रयास का मुआवजा मधेश की जनता से माँग रही है जिसकी वजह से आंशिक तौर पर ही सही संघीयता का तोहफा मधेश को मिला है । जाहिर सी बात है कि हवा किसी एक के पक्ष में बहती नहीं दिख रही । खैर ये जनता है जो सब जानती है, इसलिए इनका मत बहुमूल्य है और इसका खयाल इन्हें रखना चाहिए ।
मधेश की जनता का राजपा नेपाल से नाराजगी सही है, पर यह हकीकत भी मधेश की जनता को समझनी होगी कि अगर इस बार भी राजपा चुनाव में शामिल नहीं होती तो इन तीन बड़े दलों के मनसूबे ही कामयाब होते क्योंकि चुनाव तो होता है मतदान का प्रतिशत चाहे जो भी होता पर परिणाम को मानने की बाध्यता तो होती ही है । फिर क्यों ना मधेशी दलों का साथ देकर स्थानीय तह से ही अपनी पकड़ मजबूत बनानी चाहिए । उपर की ओर जाने वाली सीढि़यों में पहले पायदान का उतना ही महत्व होता है जितना लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अंतिम पायदान का इसलिए भी आवश्यक था कि अपने क्षेत्र को अपने ही हाथों में लिया जाय ताकि आगे के पायदान पर चढने में आसानी हो सके । इस सच को मधेश की जनता को भी समझना होगा और फिर इतिहास में आपने आज तक जिसे अवसर दिया उनसे आप अच्छी तरह वाकिफ हैं तो उससे ही हमें सीख भी लेनी चाहिए नहीं तो वक्त गुजरने के बाद, “का बरसा जब कृषि सुखानी”।
राजतंत्र की विदाई और लोकतंत्र के जन्म से लेकर आज तक यही कहा जाता रहा है कि देश संक्रमण काल से गुजर रहा है । बात सही थी, यह संक्रमण काल पूरे देश के लिए था जिसमें हर क्षेत्र की समस्या समाहित थी । सभी चाहते थे कि उनकी समस्याओं को राज्य की ओर से सम्बोधित किया जाय क्योंकि यही वक्त होता है अपनी बातों को राज्य के सामने लाने का और संविधान जैसे दस्तावेज में शामिल करवाने का । किन्तु इसी वक्त आकर देश ने अपने ही एक महत्तवपूर्ण हिस्से को कटघरे में ला खड़ा किया, कभी उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाकर तो कभी भाषा, तो कभी उनकी राष्ट्रीयता पर सवाल खड़ा कर । हर बड़ी पार्टी ने अपने अपने तरीके से इस विषय को प्रमुखता दी और इसका पोषण किया, किसी ने खुलकर तो किसी ने उनका साथ देकर । अपने ही देश में मधेशी जनता परायेपन का अनुभव करती रही है जिसकी पुष्टि नवनिर्मित संविधान ने भी कर दी । सत्तालोलुप मानसिकता ने हर बार समझौते किए चाहे वो सत्ता टिकाने के लिए हो या आंदोलन दबाने के लिए हो परन्तु इनका कार्यान्वयन कभी नहीं हुआ । ०६२÷०६३ के आन्दोलन के क्रम में हुए २२ सुत्रीय और ८ सुत्रीय समझौते भी सिर्फ कागज में ही सिमट कर रह गए । और आज वह औचित्यहीन साबित हो गया है । वर्तमान में भी सत्तापरिवर्तन के लिए मधेशी दलों से समझौते हुए जिसका निष्कर्षहीन परिणम हम सबके सामने है ।
हमेशा से मधेशी जनता सिर्फ एक वोट बैंक बन कर रह गई है, जिसे आज भी हर लुभावने वायदे के साथ भँजाया जा रहा है । पर सवाल यह उठता है कि कब तक ? क्या यह आज के परिवेश में सम्भव है कि अपने ही देश के एक हिस्से को उपनिवेश की तरह राज्य संचालित करे ? एक राष्ट्र अपने क्षेत्र में बसने वाले लोगों की एक संगठित शक्ति का रूप है । किन्तु नेपाल के शासक वर्गों ने तराई क्षेत्र को सिर्फ आमदनी का हिस्सा माना और उसके विकास को दरकिनार करते रहे । तराई को हमेशा अद्र्धसैनिकों को नियुक्त कर छावनी में परिवर्तित कर के रखा । यह तो आज भी चुनाव क्षेत्रों में देखा जा सकता है कि जितने मतदाता नहीं हैं उनसे अधिक सैनिकबल परिचालित हैं । आखिर यह मानसिकता कब तक किसी क्षेत्र को जोड़े रख सकती है ? आज नहीं तो कल यह असंतोष विस्फोट का रूप ले सकती है । इसलिए शासक वर्ग को अपनी सोच और नीति में आमूल चूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है । विश्व इतिहास से सीख लेने की आवश्यकता है जहाँ असंतोष की आग ने ही विखण्डन की आग को सुलगा दिया । शोषण, दमन, विभेद इनकी उम्र तत्काल लम्बी दिख सकती है पर यह चिरस्थाई कभी नहीं होता ।
इसलिए हम अपने देश को संक्रमण काल से नहीं नवजागरणकाल से जोड़ें जहाँ सभ्यताओं में टकराहट नहीं होती बल्कि सभी समग्र के विकास के तानेबाने बुने जाते हैं । नवजागरण की सामान्य धुरी बुद्धिवाद होती है, तानाशाही नहीं । इसलिए इसके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं । इसलिए एक नए नेपाल की परिकल्पना की आवश्यकता है और इसकी पहल राज्य सत्ता को करनी होगी तभी एक समृद्ध और खुशहाल नेपाल का निर्माण सम्भव है ।



About Author

यह भी पढें   सिरोहिया को ३ दिन हिरासत में रखने की अनुमति
आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: