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मधेस की कुछ ऐतिहासिक बातें, थारु किसान कमैया कमलरी कैसे बने ? महेन्द्र प्रसाद थारु

Mahendra Tharu
 

महेन्द्र प्रसाद थारु
१६ वी शताब्दी की शुरुआत में मुगल साम्राज्य के अवध राज्य के प्रसिद्ध किसान कवि ‘घाघ’ की एक लोकप्रिय कबिता,
दश हर राव आठ हर राना, चार हरों का बड़ा किसाना ।
दो हर खेती एक हर बारी, एक बैल से भली कुदारी ।
यह कविता थारु जाति की खेती किसानी और सम्पन्नता का वर्णन करती है । थारु जाति के ‘राव’ अर्थात रावत १० हलके (तब १ हलह५.५० बिगहा) जोतार और ८ हल जोतने वाले राना थारु वे सब गाँव के जमीन्दार होते थे । ४ हल जोतने वाले थारुओ को बड़ा किसान माना जाता था । २ हल जोतने वालो को खेतिहर(छोटा किसान) कहा जाता और १ हल बारी(ब्याड) मे काम आता था । एक बैल से खेती नही की जा सकती थी इसलिए उससे बढिया तो कोदारी (कुदाल) था ।

Mahendra Tharu
महेन्द्र प्रसाद थारु

थारु एक कृषिजीवी, स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और सम्पन्न जाति रही है जो विश्व में दुर्लभ पायी जाती है । थारु लोग तराई मधेस में हजाराें बर्ष से रह रहे हंै और यहा‘ के भूमिपुत्र हैं । यह जाति पहले सामुहिक(सगोल)में अक्सर रहती थी और कहीं कहीं तो ५०० जवान का एक ही परिवार भी पाया गया है ।
सदियो से थारुओं का प्रमुख पेशा खेती किसानी रहा है और अपना सब काम (खेतीपाती, घर बनाना, कपड़े बुनना, कालीगढी, प्रशासनिक काम आदि) खुद करते थे । उसका अपना धर्म, भाषा, पोशाक, रीतिरिवाज, संस्कार जैसे अनेक बिशेषता और पहचान थे । प्राचीन काल में थारु बहुल वा शासित कठार (खिरी जिला), दांड, कोसल(श्राबस्ती), कपिलवस्तु, कोलिय आदि थारुओ का राज्य था । सम्राट अशोक के समय पूरे मधेश पर उनका शासन था । उस समय की ब्यवस्था के अनुसार हर गाँव मौजा से कर उठाया जाता था और जमीन्दार होते थे । थारु लोग भी उन्ही के शासन अन्तर्गत थे । मुगल शासक लोग ११. वी शताब्दी के मघ्य की और भारत मे आक्रमण किया और बहुत राजाओ को हराकर शासन करने लगे । मुगलो ने तराई मधेस के राजाओ को भी जीतकर अप्रत्यक्ष शासन करने लगे । मुगल लोग कर प्रणाली प्रशासन को सहज बनाने के लिए कई गाँव मिलाकर तप्पार परगना बनाया और कई तप्पारपरगना मिलाकर तहसिल ब्यवस्था किया ।
मुगल शासनकाल में थारु बहुल क्षेत्र में गाँव का जमीन्दार वा मुखिया थारु लोग ही होते थे और तप्पारपरगना वा तहसील के मालिक पुराने राजा लोगों को ही बनाया जाता था । इस तरह तराई मधेस के राजा लोग मुगलो को कर(मालवाजवी) देकर राज्य कर रहे थे ।
मुगल शासन पतन के बाद अंग्रेज लोग भारत मे शासन करने लगे और तराई मधेस पर भी स्वभाविक रूप से अंग्रेजो का आधिपत्य कायम हुआ । अंगरेज लोगों ने भी मुगलों का फार्मुला अपनाया अर्थात वे सब भी तराई मधेस के राजाओ से बार्षिक कर वसूलकर अप्रत्यक्ष शासन करने लगे । लेकिन अंग्रेज मुगलो से ज्यादा कर लेने लगे थे ।
अंग्रेजो द्वारा सन् १९०३ मे लिखी गई पुस्तक ‘त्जभ न्बननबतभभच या ब्गमज में सन् १८७० का समाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक आदि अनेक बिषय वस्तु पर सविस्तार वर्णन किया गया है । उस समय कंचनपुर एक परगना था जो खैरिगढ(हाल खेरी जिला) तहसिल मे पड़ता था । चुंकि यह क्षेत्र बाँके, बर्दिया, कैलाली, कन्चनपुर सन् १८६० मे अंग्रेजो द्वारा नेपाल को सौप दिया गया था लेकिन सीमांकन सन् १८९० मे हुआ । कन्चनपुर परगना से उस समय रु.२५००० हजार कर अंग्रेज को देना पड़ता था । उस समय की व्यवस्था के अनुसार गाँव की सारी जमीन का मालिक जमीन्दार रहता था और किसान लोग जमीन बार्षिक भाड़ा में लेकर खेतीपाती करते थे । यहाँ के सारे जमीन्दार राजा थारु लोग ही थे । यहाँ पर अंँगरेजो का प्रत्यक्ष शासन नही था इसलिए प्रशासनिक काम में अंग्रेजों का कोई दमन, भेदभाव, अत्याचार वा दखलंदाजी नही था । केवल कर देना और खेतीपाती करना और सुकून से खुशहाल जीवन बिताना था ।

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उस समय (सन् १८७०)जमीन का भाड़ा प्रति बर्ष रु.८(प्रति बिगहा था ।
उस समय धान उत्पादन सरदर ८०० किलो प्रति बिगहा था क्योंकि धान की केवल बोआरी बोई जाती थी । उस समय का अन्न का बजार भाव, १ रुपया में, चावल . १२ किलो, धान. २० किलो, गेहुं . २४ किलो, चना . २४ किलो, बाजरा . २६ किलो, आदि ।
अब आप ही हिसाब लगाए कि,
१ बिगहा मे उत्पादन .८०० किलो धान,
१ बिगाहा के जमीन भाडा रु.८ . १६० किलो धान, बचत धान . ६४० किलो,
थारु किसानों को इसी बचे हुई अन्न से बर्ष भर का राशन, कपडा, दवा दारु, पर्ब त्यौहार, शादी, भोज भतेर सबकुछ करना था । लेकिन फिर भी सबकुछ ठीकठाक चल ही रहा था । कर तो हर समय मे लिया गया है । सम्राट अशोक के समय में कर अन्न उत्पादन का ७ भाग का १ भाग, मुगलकाल मे ६ भाग का १ भाग और अंग्रेज काल मे ४ भाग का १ भाग ही दिया गया । लेकिन जब यह भूमि नेपालियों के शासन अन्तर्गत आया तब वे लोग सबसे पहले यहाँ के जमीन्दारो से जमीन्दारी छीन लिया और पहाडी नेपाली लोग यहाँ के नया जमीन्दार बने । काठमान्डो के शासको ने जागीर, बिर्ता, मरकट बिर्ता, खानगी आदि विभिन्न नाम पर मधेस की भूमि पर कब्जा कर लिया । यही से पहाडी लोगों का जमीन्दार के रूप में मधेस में अप्रवासन का क्रम शुरु हुआ । जब जमीन्दार बदला तो जमीन का बार्षिक भाड़ा भी बढ़ गया और मधेस मे मनमानी कर वसुलने लगे । लेकिन पश्चिमी मधेस से बहुत ज्यादा अन्याय और अत्याचार किया गया पश्चिमी मधेस में । यहाँ के जमीन्दारो ने किसानो से ‘चौकुर’ यानी पुरे धान उत्पादन का ३ भाग जमीन्दार लेने लगे और केवल १ भाग ही किसान को मिलने लगा । इस नयी व्यवस्था से थारुओं में हाहाकार मच गया ।

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अब आप ही हिसाब करे,
१ बिगाहा में कुल धान उत्पादन . ८०० किलो, कर के रूप में जमीन्दार का भाग . ६०० किलो, किसान के भाग मे . २०० किलो,
उपर से खेतीपाती करने के लिए बैल और पुंजी की आवश्यकता होती और खेती करना रिस्क भी उठाना था क्योंकि कभी सुखा पड़ता है तो कभी बाढ का प्रकोप । अब आप ही अनुमान लगाये कि इस नये ब्यवस्था ने थारु किसानो को किस हाल मे पहुंचा दिया था ?
अब थारु किसान को बर्ष भर के लिए राशन की कमी होने लगी तो कपड़ा, दवा, शादी, पर्ब त्यौहार का खर्चा कहाँ से आता ? अब करने के लिए बाँकी क्या बचा था ? ऐसी हालत में बहुत से किसान खेती करना छोड़कर सपरिवार जमीन्दार के यहाँ मजदूरी करने लगे । जमीन्दार की मजदूरी केवल २ रुपया प्रति महीना यानी ४० किलो धान हुआ करता था और इसके एवज में जिन्दगी भर की गुलामी ।

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