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टोपीवाद : बिम्मी शर्मा

 

बिम्मी शर्मा, वीरगंज । ( व्यंग्य )इस देश में राष्ट्रवाद और देश प्रेम का पयार्यवाची है टोपीवाद । आप अगर नेपाली टोपी या ढाका टोपी पहनते है तो आप सच में देशप्रेमी है । अगर नहीं पहनते हैं तो इस का मतलब आप राष्ट्रघाती है । जैसे समाजवाद, साम्यवाद और माओवाद है उसी तरह इस देश में टोपीवाद भी है । देश प्रेम का जज्बा दिल में होना चाहिए पर हमारे देश में यह जज्बा दिल से उतर कर सिर में पहुंच गया है और देशभक्ति का भोंडा प्रदर्शन कर रहा है । लगता है नागरिकता की तरह टोपी भी नेपाली होने का लाईसेंस है । भले ही कितने ही गलत काम कर लें पर देश–प्रेम का दिखावा जरुर करते हैं । यह देश टिका ही दिखावे में हैं । अक्ल न लगा कर सिर्फ नकल कर के दिखावा करने में नेपालियों का दुनिया में किसी से कहीं भी मुकाबला नहीं हो सकता । इस मामले में बेजोड़ हैं ।

टोपी पहनेंगे नेपाली वह भी देशवासी, पर इसको नाम दिया गया है अन्तराष्ट्रीय टोपी दिवस । एक जनवरी पूरे विश्व में मनाया जाने वाला नया वर्ष का पर्व है । नए साल की शुभकामना देने या मनाने में मुँह बिचकाते हैं । इतना ही टोपी से प्रेम है तो बैशाख १ गते जो नेपाल का नया वर्ष है और जिस दिन बिक्रम संवत शुरु होता है उसी दिन क्यों नहीं मनाते टोपी दिवस ? पर नहीं इन्हें तो नया–नया हथकंडा अपना कर लोगों को भरमाने में मजा आता है । धोती का कोई मोल नहीं उसे हिकारत से देखते हैं, पर पूरे शरीर को नगां कर के सिर्फ सर को टोपी से ढकने में इन्हें गर्व महसूस होता है । टोपी को यह नेपाली होने का प्रमाणपत्र मानते है । भले ही कितना ही भ्रष्टाचार और अनैतिक काम कर लें पर टोपी लगाएं जरुर । टोपी आप के सारे पापों को ढक जो देता है ।

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जो सरकारी कर्मचारी जितना ज्यादा भ्रष्टाचार करता है, काम विशेष से सरकारी कार्यालय में आए हुए देश के नागरिकों से अनाप–शनाप पैसे ऐंठता हो पर टोपी लगाते ही बस देश का योग्य राष्ट्र सेवक बन जाता है । चश्मा आँख की खराबी को दूर करता है पर टोपी मन की दुर्भावना और व्यवहार के कपटपन को छूपा कर निक्खर सफेदपोश बना देता है । सरकार के पाले हुए सफेद हाथी जैसे सार्वजनिक संस्थान और उस में काम करने वाले सफेदपोश कर्मचारी अपने सारे काले कारनामों को छुपा कर सफेद कर देते हंै सिर्फ टोपी पहन कर । यह टोपी है या कोई जादू की छड़ी ? जिसे पहन कर बुरा से बुरा इंसान भी भलादमी होनें का दंभ भरने लगता है ।

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मधेश की धोती फटेहाल है । उड़ कर कभी कभार दशगजा पहुंच जाती है । पर सरकार या इस देश के वुद्धिजीवियों को इस का गम नहीं है । वह सिर्फ अपनी टोपी पर हाथ घुमाते रहते हैं । यह टोपी नाम का बंदा है न सर पर हाजिर फिर किस बात की फिक्र ? फिर मधेश की धोती फटे या गमछा इन्हें क्या मतलब । इन्हें तो बस समय पर राष्ट्रवाद का दर्शन बघारना है और जहां से पैसा मिले उसी दिशा में घड़ी की सूई की तरह बस टोपी को घुमाते रहना है । मधेश के अन्न से पेट भर कर डकार जरुर मारेंगे पर मधेश के बारे में नहीं सोचेंगे । मधेश के गमछे से पसीना और नाक भी पोछ लेंगे पर मधेशियों को देख कर चिढ़ेगें या खीसें निपोरेंगे । मधेश के आम को चूस कर खाना इन्हें बहुत पसंद है पर आम मधेशी को उनका हक देनें के समय में बगले झांकने लगेंगे । क्योंकि इन्हें अपनी टोपी प्यारी है और इसी टोपीवाद के बदौलत बरसने वाला पैसा प्यारा है । जो पैसा टोपी में नहीं समा पाता है । इसीलिए तो यह टोपी–टोपी करते रहते हैं । कोई इन्हें इस का उल्टा कर के दो–चार दनक दे कर पीटेगा तब मजा आएगा । जय हो टोपीवाद की ।

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