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अस्थिर देश में स्थिरता की नाकाम तलाश : श्वेता दीप्ति

 

काठमांडू | राजनीतिक अस्थिरता के बीच ही हमने २०१८ का सफर शुरु कर दिया है । देश के लिए यह नया वर्ष हो ना हो, पर विश्व के साथ चलने के क्रम में इसकी महत्ता तो है ही । वैसे नया कुछ नहीं है, देश स्थिरता की चाह लिए, अस्थिरता के बीच, स्थिर गति से रेंग रहा है । सरकार गठन की प्रक्रिया अब भी मझधार में है, वैसे देर से ही सही, देश को नए प्रधानमंत्री के रूप में पुराना चेहरा जल्द ही हासिल हो जाएगा । अभी शायद शुभ मुहुर्त नहीं आया है । इंतजार का फल मीठा होता है और इस फल की प्र्राप्ति के लिए सभी बेकरार हैं । नेता और जनता दोनों ही अपने–अपने स्तर पर इंतजार ही कर रहे हैं । प्रत्यक्ष का परिणाम सामने है, पर समानुपाती के नाम पर जो परिवारवाद, शुभेच्छुवाद देश की राजनीति पर हावी है वह निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है । इस प्रणाली के औचित्य पर पुनरावलोकन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जा रही है । पर जनता खामोशी के साथ इसे स्वीकार करती जा रही है । कहीं कोई विरोध नहीं, कहीं कोई बैचेनी नहीं ।
हिन्दी की सरसता और इसकी महत्ता दोनों ही किसी परिचय की मुहताज नहीं है । हर वर्ष १० जनवरी विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर हिमालिनी अपनी यात्रा की ओर एक और नया कदम बढाती है । हिमालिनी अपने सफल बीस वर्ष के सफर को तय कर चुकी है । आगे भी यह अपने इसी तेवर, या यूँ कहें कि और भी बेहतरी के साथ आपके समक्ष आती रहेगी । इसी अवसर पर हिमालिनी ने देश के दो नम्बर प्रदेश के सबसे महत्तवपूर्ण औद्योगिक शहर बीरगंज की यात्रा की, उसकी दशा और दिशा को खंगालने की कोशिश की और उन समस्याओं से अवगत हुई जिस पर सम्बन्धित निकाय या सरकार की आज तक अनदेखी होती रही है । हिमालिनी की कोशिश है कि वो अपने इस सर्वेक्षण के द्वारा सरकार का ध्यानाकर्षण बीरगंज की ओर करा सके, ताकि देश का एक महत्तवपूर्ण शहर अपनी बदहाली से उबर सके । मधेश देश की रीढ़ है तो बीरगंज उस रीढ़ की ताकत जिसे मजबूती प्रदान करना समग्र देश के हित में होगा । यों तो समग्र देश विकास की राह देख रहा है । हर ओर एक अव्यवस्था सी है जिसकी सुधार की अपेक्षा देश का हर नागरिक कर रहा है । विश्व हिन्दी दिवस की शुभकामना के साथ—
सहजता और सरलता के लिए,
हिन्दी तू विश्व में जानी जाती है ।
आँचल तेरा बहुत बड़ा है,
सारी भाषाएँ इसमें समाती हैं ।
न जाने कितनी भाषाओं को,
तू विश्व में पहचान दिलाती है ।
शब्दों का अकूत भण्डार है तेरा
कोमल भावनाएँ तुम में समाती है ।
बैर नहीं किसी भाषा से तुम्हें बस,
प्रगति पथ पर आगे बढती जाती है ।

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सम्पादकीय- ( हिमालिनी जनवरी २०१८ )

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