क्या चाहता है वीरगंज ? कुमार सच्चिदानन्द

वीरगंज २ नंबर प्रदेश का एक मात्र महानगर है और नेपाल का प्रमुख प्रवेश द्वार भी । देश संघीयता में जा चुका है और इसके साथ ही लोगों की राजनैतिक महत्वाकांक्षाएँ भी बढ़ रही हैं । वर्तमान समय में राजनीति के प्रति लोगों की संवेदनशीलता बढ़ी है जिसका प्रमाण विगत में हुए स्थानीय चुनावों के साथ–साथ प्रतिनिधिसभा और प्रदेशसभा के चुनावों के नतीजे हैं । इसके माध्यम से सिर्फ वीरगंज नहीं बल्कि पूरे २ नंबर प्रदेश की जनता ने यह सिद्ध कर दिया है कि वे महज अन्धों और बहरों की भीड़ नहीं, बल्कि स्वतंत्रचेता जनता है जो अपने हक और हितों के प्रति अत्यधिक जागरूक है । इस शहर की जनता आज तक यह मानती रही है कि वीरगंज का सम्यक् विकास अब तक संभव नहीं हो पाया है । यद्यपि विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो क्रमशः होता है । लेकिन वीरगंज का विकास हुआ ही नहीं, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता है मगर इसकी जो गति और दिशा है, उससे सन्तुष्ट भी नहीं हुआ जा सकता है । अब सवाल यह उठता है कि आखिर वीरगंज चाहता क्या है ? इस विषय पर ‘हिमालिनी’ ने गंभीरता के साथ वीरगंज के विभिन्न क्षेत्र के लोगों को खंगालकर तथ्यों को सामने लाने की कोशिश की । विभिन्न बैठकों और विभिन्न स्तर पर लोगों से बातचीत में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य उभर कर सामने आए ।
यह बात प्रमुखता से उभर कर सामने आयी कि वीरगंज पर राज्य की वाम दृष्टि रही है । यह नेपाल का प्रमुख प्रवेश द्वार है और देश के ७० प्रतिशत सामानों का आयात और निर्यात इसी शहर के माध्यम से होता है । स्वाभाविक रूप में देश की राजस्व वसूली में वीरगंज का सर्वाधिक योगदान है । लेकिन उपमहानगर या महानगर के विकास के लिए जैसी योजना और राशि की अपेक्षा थी वह कभी भी राष्ट्रीय बजट में नहीं देखी गयी । आज स्थिति और अधिक बदल गई है । मधेश आन्दोलन का केन्द्र वीरगंज रहा है और नाकाबन्दी का समर्थन कर इसने देश को लगभग छः महीने तक ठप्प करने की जुर्रत की है । आज परिस्थितियाँ भी बदल चुकी हैं । सबकुछ सामान्य हो चुका है । लेकिन इसकी खुन्नस अभी भी शासक वर्ग में देखी जा रही है । अब तक जिस वीरगंज को यह अभिमान था कि वह देश का प्रमुख प्रवेश द्वार है, शासन और उसका संयन्त्र इस अभिमान को क्रमशः तोड़ने के लिए क्रियाशील है । यही कारण है कि भैरहवा और विराटनगर जैसे सहायक नाके का भौतिक पूर्वाधार काफी तेजी से विकसित किया गया है और आयातकों तथा निर्यातकों को इस मार्ग का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है और वीरगंज अपने हाल पर रो रहा है ।
आज वीरगंज की स्थिति यह है कि एक अदद चौड़ी सड़क के लिए यह तड़प रहा है । शहर के अन्दर की सड़कें अत्यन्त संकरी और धूल–धूसरित हैं । मुख्य बाईपास की स्थिति ऐसी है कि बरसात में कई–कई तालाब की अवधारणा सड़क पर ही साकार हो जाती है । २ नंबर बाईपास तो उच्च मानदण्डों के साथ बना है मगर यह सड़क उद्देश्यों की दृष्टि से जगह–जगह पर खण्डित है और इस सड़क की यात्रा किसी भी वाहन से पूरी नहीं की जा सकती । इस मुद्दे पर यहाँ के लोगों को यह सोचकर आश्चर्य होता है देश के अन्यान्य नगरों और महानगरों की सड़कें तो चौड़ी और व्यवीथत हो चुकीं और यहाँ तक कि काठमाण्डू में भी इस योजना पर काम हो रहा है लेकिन वीरगंज की सड़कें अभिशप्त क्यों हैं ? यह राजनैतिक सौतेलापन की निशानी नहीं तो और क्या है ? एक दूसरा पक्ष यह भी है कि वीरगंज की गलियाँ भी अत्यन्त सँकरी है और किसी भी गली में एक चारपहिया वाहन अगर घुस जाता है तो वहाँ पैदल चलना भी लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है । निश्चित ही समय के साथ–साथ शहर की आबादी बढ़ रही है । लोगों की समृद्धि का स्तर बढ़ने के साथ–साथ वाहनों की संख्या भी निरन्तर बढ़ रही है । इसके अनुपात में यहाँ की गलियों को अत्यन्त संकीर्ण माना ही जा सकता है । इसलिए मुख्य सड़कों के साथ–साथ इन गलियों का चौड़ाइकरण भी उतना ही आवश्यक है । साथ ही यह भी आवश्यक है कि वीरगंज बाईपास या रेलवे की सड़क से वीरगंज की मुख्य सड़क दो–चार स्थानों पर कम से कम चौड़ी गलियों द्वारा जुड़ी हो जिससे कोई एक मार्ग अवरुद्ध होने पर दूसरे का उपयोग वैकल्पिक मार्ग के रूप में किया जा सके । इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि सब्जी मण्डी से होकर ई–रिक्सा को मार्ग दिया गया है ।
वीरगंज की आज सबसे बड़ी समस्या है रक्सौल से वीरगंज का सड़क मार्ग और इस पर लगातार भयानक सड़क जाम । जाम के कारण इस सड़क की अवस्था ऐसी होती है कि पैदल चलना भी मुश्किल होता है । गौरतलब है कि रक्सौल स्टेशन से भारत के विभिन्न महानगरों और नगरों की सीधी रेलसेवा है जिसे पकड़ने के लिए महज ६–७ किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए लोग अपने समय से दो घंटे पूर्व प्रस्थान करते हैं, इसके बावजूद यह आशंका बनी रहती है कि वे अपने वाहन से समय पर पहुँच पाएँगे या नहीं ! इसके समाधान के रूप में आइसीपी (इण्टीग्रेटेड चेक पोस्ट) का त्वरित संचालन माना जा रहा है जिससे मुख्य सड़क पर वाहनों का दबाब कम होने की संभावना है । कारण चाहे जो भी हो मगर आईसीपी के संचालन में अनापेक्षित देर हो रही है । इसके परिणामस्वरूप रक्सौल वीरगंज का जाम मानवीय समस्या का रूप धारण कर चुकी है । इससे वीरगंज का व्यापार भी किसी न किसी रूप में प्रभावित होता है । विलम्ब आदि शुल्कों के नाम पर करोड़ों रुपए जुर्माने के रूप में यह वर्ग भुगतान करता है । भारत की सीमा से जुड़े होने के कारण यहाँ सीमा व्यापार की संभावना अधिक है लेकिन अतिशय जाम के कारण वीरगंज का यह व्यापार बुरी तरह प्रभावित दिखलाई देता है ।
वीरगंज देश का एक औद्योगिक नगरी भी है और इस दृष्टि से इसके विकास की अपार संभावनाएँ हैं । इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उद्योगों के विकास के लिए इसे आदर्श माना जा सकता है । एक ओर तो यह भारतीय समुद्र तट और बन्दरगाह से सबसे कम दूरी पर स्थित शहर है, फिर सड़क और रेलमार्ग से भी यह जुड़ा है और यहाँ दूर–दूर तक समतल मैदान है । दूसरी ओर यहाँ से नेपाल की राजधानी भी यहाँ के अन्य बड़े शहरों की तुलना में नजदीक है । यहाँ का वातावरण भी समशीतोष्ण है । यही कारण है कि वीरगंज औद्योगिक नगर के रूप में विकसित हुआ और इस क्षेत्र में अपार संभावनाएँ भी अभी हैं । अपने इस रूप में वीरगंज बिहार की राजधानी पटना और नेपाल की राजधानी काठमाण्डू से अपना तेज जुड़ाव चाहता है । अगर भारत की ओर देखें तो बिहार की सुगौली से रक्सौल की सड़क की अवस्था वर्तमान समय में अत्यन्त दयनीय है लेकिन निकट भविष्य में इसकी हालत सुधरने की संभावना भी है । लेकिन वीरगंज की सबसे अधिक अपेक्षा निजगढ़–काठमाण्डू फास्ट ट्रैक से है । वीरगंज सड़क की ऐसी सुविधा चाहता है कि महज तीन से चार घण्टे में वह दो राजधानियों तक पहुँच सके ।
किसी भी शहर के विकास के लिए यह आवश्यक है कि वह वह शिक्षा और चिकित्सा के केन्द्र के रूप में भी विकसित हो । इस दृष्टि से देखा जाए तो वीरगंज को पिछड़ा हुआ शहर ही माना जा सकता है । ऐसा नहीं है कि यहाँ स्कूल–कॉलेज और अस्पताल नहीं है । लेकिन यहाँ के स्कूल–कॉलेज की सीमाएँ प्रायः पारम्परिक शिक्षा तक फैली हैं । इसके बावजूद इतना तो स्वीकार किया ही जा सकता है कि २ नंबर प्रदेश के ही छात्रों का पहला गन्तव्य यह नहीं बन पाया और पारम्परिक शिक्षा के लिए भी यहाँ के छात्रों का केन्द्र की ओर पलायन जारी है । दूसरी ओर यहाँ चिकित्सा महाविद्यालय भी है और उपक्षेत्रीय अस्पताल भी । फिर अनेक चिकित्सकों के निजी क्लिनिक भी फल–फूल रहे हैं । लेकिन गंभीर रोगों के इलाज के लिए सक्षम लोग यहाँ से काठमाण्डू और पटना तथा दिल्ली के साथ–साथ भारत के अन्य नगरों का रूख करते हैं । क्योंकि सेवा का यह क्षेत्रं लोगों की विश्वसनीयता नहीं अर्जित कर सका है । उन्हें यह चिन्ता रहती है कि न जाने कब और किन परिस्थितियों में यहाँ से अन्य शहरों की ओर मरीज को ले जाने की सलाह दे दी जाएगी । इसलिए लोग पहले ही इसे सलाम कर लेते हैं ।
विकास की दृष्टि से देखा जाए तो वीरगंज एक अदद विश्वविद्यालय चाहता हे जिसकी चर्चा दशकों से है । लेकिन यह साकार रूप नहीं ले सका है । यह शहर एक ऐसे विश्वविद्यालय की परिकल्पना साकार करना चाहता है जो यहाँ की आवश्यकताओं के अनुरूप ऐसा पाठ्यक्रम का संचालन करे जिससे उत्पादित जनशक्ति का प्रयोग यह क्षेत्र कर सके । इस शहर के आम व्यवसायियों की यह शिकायत रही है कि उसे प्रशिक्षित जनशक्ति का अभाव झेलना पड़ता है । इसलिए पॉलिटेकनिक जैसे संस्थानों की स्थापना इस शहर में होनी चाहिए । दूसरी ओर चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में तो देश में अनेक महाविद्यालय
खुल चुके हैं लेकिन एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के इंन्जीनियरिंग कॉलेज की आवश्यकता देश को है और इसके लिए वीरगंज एक अच्छा विकल्प हो सकता है । इसके साथ ही यहाँ पारम्परिक शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही शिक्षण संस्थाओं के सामने भी यह चुनौती है कि वह शिक्षा का वह मानदण्ड स्थापित करे कि वीरगंज चाहे पूरे नेपाल के छात्रों की प्राथमिकता नहीं बने लेकिन दो नंबर प्रदेश के छात्रों का पलायन यह रोक सके ।
वीरगंज के विकास के सन्दर्भ में एक बात और तीव्रता से उठी कि दो नंबर प्रदेश की राजधानी वीरगंज बने । मधेश आन्दोलन में जिस तरह का इसका योगदान रहा और यहाँ के लोगों ने अपनी शहादत दी तथा यहाँ के उद्योगी–व्यवसायियों ने अपने आर्थिक और व्यावसायिक हितों की कुर्बानी दी उसे देखते हुए इसका दावा गलत नहीं दिखलाई देता । वीरगंज के आम लोगों के मन में तो यह बात है ही लेकिन इस सन्दर्भ में एक व्यवसायी ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर वीरगंज राजधानी नहीं होती और हमें इस प्रदेश के दूसरे शहरों से नियंत्रित किया जाता है तो इससे अच्छा है कि हमें तीन नंबर प्रदेश में ही मिला दिया जाए । एक पक्ष और है कि जो राजनैतिक दल पिछले चुनाव में बेतरह पराजित हुए हैं, वे भी इस संवेदना की आड़ में राजनीति करने के लिए मैदान में उतर पड़े हैं । लेकिन यहाँ से चुनाव जीते हुए जनप्रतिनिधि इस माँग की सीमाओं से अवगत हैं और वे बीच का मार्ग निकालने के लिए प्रायः आश्वस्त हैं । एक और तर्क आ रहा है कि अगर इस प्रदेश की राजधानी अन्यत्र कहीं बनती है तो शासन का कोई एक अंग का संचालन वीरगंज से भी होना चाहिए और कम से कम उद्योग मंत्रालय की स्थापना यहीं होनी चाहिए । इस क्षेत्र में यहाँ की जनभावना स्पष्ट है कि इस प्रदेश का नाम किसी क्षेत्र या भाषा विशेष के आधार पर नहीं होना चाहिए ।
वीरगंज के समग्र विकास के लिए यह भी आवश्यक माना गया कि सिर्फ शहर के विकास से ही इसका विकास नहीं होगा । जब आस–पास और यहाँ तक कि पूरे प्रदेश में समृद्धि आएगी तो इस शहर का भी विकास तीव्र गति से होगा । हमारी अर्थव्यवस्था और विशेषतः २ नंबर प्रदेश की अर्थ व्यवस्था कृषि आधारित है और इसकी उपेक्षा कर हम किसी मुकाम पर नहीं पहुँच सकते । कृषि की दृष्टि से हम निर्वाहमुखी अर्थतन्त्र से गुजर रहे हैं । जमीन का द्वैध स्वामित्व ने उत्पादन को प्रभावित किया है । यही कारण है कि कभी हम धान का निर्यातक हुआ करते थे और आज आयात करना हमारी मजबूरी बन गई है । तराई में अधिक जमीन का स्वामी शासन की वामदृष्टि का शिकार है और आशंकित भी । ठीक इसके विपरीत शहर में अकूत संपत्ति अर्जित करने वालों के सन्दर्भ में सरकार खामोश है । कृषकों को उर्वरक सही रूप में नहीं मिलता और लाभमुखी कृषि का समुचित ज्ञान भी कृषकों को नहीं होता । इसलिए हमें अगर उन्नति करनी है तो कृषि को प्राथमिकता में रखनी ही होगी ।
किसी एक बिन्दु का सामना कर हम विकास के सरपट मार्ग पर नहीं दौड़ सकते हैैं । पर्सा जिला की स्थिति यह है कि एक वीरगंज की चकाचौंध में पूरे जिला का अँधेरा छुप जाता है । स्थिति यह है कि वीरगंज के सिवा पूरे जिला में कहीं भी पक्की सड़क नहीं है । इसके लिए विभिन्न कोनों और दिशाओं से हमें आगे बढ़ना होगा । यह देखा जा चुका है कि पूरब–पश्चिम राजमार्ग के विकास से इसके आस–पास तेजी से विकास हुआ और यह प्रक्रिया आज भी तीव्रता से जारी है । इसलिए तराई के स्वप्न का रूप ले चुका हुलाकी राजमार्ग पर सारी राजनीति बन्द होनी चाहिए और इसका शीघ्र निर्माण होना चाहिए । इससे इस सड़क का विकास तो होगा ही इसके आस–पास औद्योगिक विकास की तीव्र संभावना प्रकट होगी । इसके साथ ही अगर इस प्रदेश की राजधानी जनकपुर बनती है तो उसकी दूरी भी लगभग ५० किलोमीटर कम हो जाएगी । इसके साथ ही औद्योगिभक विकास के लिए यह भी आवश्यक है कि सरकार की नीतियाँ उद्योग–व्यवसाय–फैंडली हो । नेपाल के औद्योगिक वातावरण को यहाँ का मजदूर कानून ने भी प्रभावित किया है । इसलिए इस कानून का संशोधन होना चाहिए जिसमें राजनैतिक लाभ की अपेक्षा उद्योगों की आवश्यकता को ध्यान में रखा जाना चाहिए ।
वीरगंज का यथार्थ है कि यह देश का सबसे बड़ा ट्रांजिटप्वाइंट है । इसलिए इस शहर की यह महत्वाकांक्षा है कि इसकी यह स्थिति बरकरार रहे । लोग इस बात से आशंकित हैं कि सरकारी नीतियाँ अप्रत्यक्ष रूप से इसकी इस स्थिति को हतोत्साहित करना चाहती है । लेकिन इस क्षेत्र के उद्योगी–व्यवसायी के साथ–साथ यहाँ के राजनीतिकर्मियों को भी इस दिशा में सावधान रहना होगा और राजनैतिक–कूटनैतिक अवरोधों को दूर करने के लिए निरन्तर क्रियाशील रहना होगा । किसी भी औद्योगिक क्षेत्र का माहौल बेहतर रखने के लिए भी यह आवश्यक है कि वहाँ शिक्षा का समुचित व्यवस्था तथा गरीबी का उन्मूलन हो । इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह होता है कि उद्योग–व्यवसाय के क्षेत्र को तो एक ओर प्रशिक्षित जनशक्ति मिलती है दूसरी ओर उन्हें असामाजिक तत्वों के आतंक का सामना कम या नहीं करना पड़ता है और ऐसे माहौल में विकास का पौधा लहलहाता है ।
यह भी महत्वपूर्ण है कि आइसीपी लगभग बनकर तैयार है और निकट भविष्य में शीघ्र इसका संचालन होगा । इसमें कोई संदेह नहीं कि यह पूरी तरह आधुनिक और सुविधा सम्पन्न है लेकिन प्रारम्भिक तौर पर दो समस्याएँ यहाँ दिखलाई दे रही हैं । प्रथम तो नेपाल की ओर आईसीपी को मुख्य फोरलेन सड़क से जोड़ने वाली सड़क अत्यन्त संकीर्ण है जो निश्चित ही वाहनों के दबाब को झेलने की अवस्था में नहीं है । दूसरा, भारत की ओर रक्सौल में ही दो–दो रेलवे क्रॉसिंग हैं जिन पर ओवरब्रिज बनाने के लिए स्तम्भ तो बनकर तैयार हैं लेकिन आगे का काम रूका हुआ है । ये दोनों ही समस्याएँ सम्मलित रूप से वाहनों के अवाध आवागमन में अवरोध उत्पन्न करेंगी । इसलिए सम्बद्ध पक्षों का ध्यानाकर्षण तो होना ही चाहिए । इसके साथ ही बाहर से आए भारी वाहनों के विश्राम–स्थल के लिए नेपाल की ओर ट्रांसपोर्ट सीटी की अवधारणा सरकार द्वारा सामने लायी जानी चाहिए जिसमें वाहनों को सुरक्षित रखने और उसके चालक आदि के विश्राम की बेहतर व्यवस्था हो । अगर सरकार यह अवधारणा सामने लाती है तो इसमें पूँजी निवेश करने के लिए स्थानीय लोग ही तैयार हो जाएँगे । लेकिन जरूरत है एक अवधारणा की ।
जनप्रतिनिधियों से संवाद में यह बात भी मुख्य रूप से उभर कर सामने आयी कि वीरगंज का विकास मोटे तौर पर २ नंबर प्रदेश के विकास से जुड़ा है । इस प्रदेश में सबसे ज्यादा जनसंख्या घनत्व है और अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है । इसलिए आवश्यक है कि सीमा क्षेत्र में बड़ी नदियों पर जलाशय बने । इस योजना के प्रति भारत का भी आकर्षण है । अगर ऐसा संभव हो पाता है तो चूरे के समानान्तर नहर खींच कर इस क्षेत्र में सिंचाई की बेहतर व्यवस्था की जा सकती है । प्रदेश की जो अवस्था है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इसे विकास के लिए संसाधनों की व्यवस्था स्वयं करनी होगी । पर्यटन की संभावनाओं की भी तलाश करनी होगी । पर्सा जिला में ही पारसनाथ का भव्य मंदिर है जिसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना होगा । हमारे लिए यह एक बड़ा अवसर है क्योंकि भारत हमारा पड़ोसी देश है और वहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू धर्मावलंबी हैं । पर्यटन की दृष्टि से इसे बड़ा बाजार के रूप में देखा जा सकता है ।
इस बीच पर्सा जिला की ठोरी को ३ नंबर प्रदेश में मिलाने की बात राजनैतिक हलकों में चर्चा में आई । इस बात के प्रति यहाँ के आम लोगों के साथ–साथ जनप्रतिनिधियों ने तीव्र प्रतिक्रिया जाहिर की और स्पष्ट रूप से कहा कि ‘यह किसी भी कीमत पर संभव नहीं । ठोरी हमारी है और हमारी ही रहेगी ।’ इस बात की आवश्यकता भी जतलायी गई कि वीरगंज और समग्र रूप से २ नंबर प्रदेश के विकास के लिए आवश्यक है कि राजनैतिक रूप से बिहार से भी इसका समन्वय हो । यह बात भी सामने आयी कि वीरगंज का विकास सिर्फ वीरगंज से जुड़ा नहीं है । इसके लिए बारा जिला के जनप्रतिनिधियों के साथ एकीकृत नीति बनाना जरूरी है । यह हमारी त्रासदी रही है कि हमने अपने पूर्ववर्ती जनप्रतिनिधियों से आज तक नहीं पूछा कि हमारा विकास क्यों नहीं हुआ ? अगर स्थिति को गम्भीरता से देखें तो कहा जा सकता है कि यहाँ कुछ अच्छा नहीं है । महानगरपालिका की स्थिति भीतर से जर्जर है और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी अलग शीर्षक के बजट का प्रयोग करना होता है । यह सच है कि वीरगंज नेपाल का प्रमुख ट्रांजिट प्वाइंट है और इसके कारण यहाँ की बदहाल सड़कें, प्रदूषित वातावरण और धूल–धक्कड़ का त्रास यहाँ की जनता को झेलना पड़ता है लेकिन इस तथ्य को सम्बन्धित निकाय नहीं समझता ।
एक बात तो निश्चित है कि राजनैतिक इच्छाशक्ति और संघर्ष के बिना हम किसी मुकाम को सहजता से नहीं प्राप्त कर सकते । जहाँ शासन का सौतेला व्यवहार हो वहाँ इसकी भूमिका और अधिक बढ़ जाती है । ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि एक पार्लियामेण्ट्री फोर्स का निर्माण है जिसका कॉमन मिनिमम एजेण्डा हो—‘सिर्फ और सिर्फ विकास ।’ इसको लक्ष्य कर यह फोर्स हर विधेयक पर नजर रखे और इसके पटल पर आने से दो महीने पूर्व से ही सरकार पर दबाब डाले और उसमें अपने हितों को सुरक्षित करने–कराने की पहल करे । इसके साथ ही योजना आयोग के अध्यक्ष को पर्सा जिला का भ्रमण कराया जाना चाहिए और यहाँ के यथार्थ से उन्हें अवगत कराना चाहिए । सम्बद्ध निकायों तक स्थिति की सही तस्वीर पहुँचना भी विकास की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण है ।
इस तरह विकास वीरगंज का सपना है । यह २ नंबर प्रदेश का एक मात्र महानगर ही नहीं बल्कि सबसे व्यवस्थित शहर पहले से भी रहा है और इस रूप में यह अपनी पहचान को कायम रखना चाहता है । इसके लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ–साथ चहुँमुखी विकास की आवश्यकता है । सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और चिकित्सा के सम्यक् विकास के द्वारा हम बेहतर नागरिक सुविधा और आकर्षण पैदा कर सकते हैं । आद्योगिक विकास और स्वस्थ वातावरण के द्वारा शहर को समृद्ध और रोजगार के केन्द्र के रूप में विकसित किया जा सकता है । लेकिन इस सपने को साकार करने के लिए हर वर्ग को संवेदनशील और क्रियाशील बनना होगा ।

