Sat. Mar 7th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

मेहंदी साहब को गाने के लिए एक तबला और हारमोनियम ही काफी थे!

मेहदी हसन साहब ऐसे फनकार थे जो मुकम्मल थे, उन्हें गाने के लिए कभी बहुत साजों की जरूरत नहीं पड़ी। वो केवल एक हारमोनियम और तबले पर गाते थे। किसी भी महफिल में उन्होंने गाया तो केवल इन्हीं दो साजों के साथ। अच्छे फनकार की यही खासियत होती है कि उसे बहुत सपोर्ट की जरूरत नहीं होती, उसकी आवाज ही काफी होती है।

1978 में हम लोगों की पहली मुलाकात मेहदी साहब से हुई। वे काफी समय बाद हिन्दुस्तान आए थे, इस दौरान वे जयपुर भी आए। यहां पर मशहूर कथक नृत्यांगना सितारा देवी ने उनसे मिलवाया। मुंबई में सितारा देवी के घर पर महफिल सजी थी। कई बड़े फनकार जमा थे। मेहदी हसन, हृदय नाथ मंगेशकर, सुल्तान खान, उस्ताद अल्लारखा खां..और भी कई फनकार थे। तहजीब के मुताबिक पहले छोटे गाते हैं और फिर बड़े। हम दोनों भाइयों ने गजल पेश की।

यह भी पढें   राष्ट्रपति पौडेल और प्रधानमंत्री कार्की बीच मुलाकात

सितारा देवी ने मेहदी साहब से पूछा कि कैसा गाते हैं ये दोनों। वो हंसते हुए बोले, राजस्थान की तो माटी ही सुरीली है और उस पर से इनका तो खानदान संगीत और गजलों से जुड़ा है। इनकी बारे में तो क्या कहूं। और इनकी एक और खासियत है कि ये अपने ही तरीके से गजल गाते हैं।

ठुमरी में करते थे गजल का विस्तार

मेहदी साहब की एक और खासियत थी कि वे गजल का विस्तार (बढ़त) ठुमरी में करते थे। ठुमरी पर आधारित गाने वाले काफी बढ़त ले सकते हैं और इस वजह से वे काफी पसंद किए जाते हैं। उन्होंने अपनी गजलें भी अलग अलग रागों में गाई हैं, इसी वजह से उनकी गजलों में एकरूपता नहीं है।

यह भी पढें   दोलखा में बुथ प्रतिनिधियों को लिया गया नियंत्रण में

रंजिशें ही सही……राग यमन

शोला सा बुझा हूं…राग किड़वानी

जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं….राम भीमपलासी

गजल गायिकी की दुनिया में अंधेरा

गजल की दुनिया अभी जगजीत भाई के जाने के गम से उबर भी नहीं पाई थी कि मेहदी साहब का जाना जैसे गजल की दुनिया में अंधेरा कर गया। ऐसे मुकम्मिल फनकार धरती पर कभी कभी पैदा होते हैं बल्कि अल्लाह उन्हें बना कर भेजता है। मेहदी हसन साहब ऐसे फनकार थे जिन्होंने अपनी गजल से दुनिया में ऐसी खुशबू बिखेरी है जो कभी कम नहीं पड़ सकती। उनके लिए तो बस यही कह सकते हैं ….

यह भी पढें   सत्ता, प्रभाव और रहस्यों का जाल : श्वेता दीप्ति

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा

Source: Bhaskar News   |

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *