बनता वही कबीर
-डॉ. अरुण
जिसने झेले दुःख जीवन में,
जिसने सह ली पीर !
वही बनी है मीरा जग में,
बनता वही कबीर !!
दुःख अपना लेता है जिसको,
कालजयी वह बन जाता है !
अंधियारों से जो भी जूझा,
नया सबेरा वो लाता है !!
कर्म–मन्त्र से खींची जाती,
जग में नई लकीर !
वही बनी है मीरा जग में,
बनता वही कबीर !!
सेवा–अमृत जो चख लेता,
ईश्वर को पा लेता है !
सारे जग की पीड़ा लेकर,
सब को खुशियां देता है !!
धनवानों से ऊँचा होता,
बिरला कोई पÞmकÞीर !
वही बनी है मीरा जग में,
बनता वही कबीर !!
देह–देह से भिन्न भले हो,
आत्मरूप तो सब होते हैं !
जिनकी पीड़ा हर लेते हम,
वही चैन से सोते हैं !!
मानव(जन्म अगर पाया है,
छोडो एक नजÞीर !
वही बनी है मीरा जग में,
बनता वही कबीर !!


