यात्रा भक्तपुर की

किसी शायर ने सही में कहा है–जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो–शाम पर्यटन की मेरी अभिलाषा भी शायद इन शायर के इन्हीं शब्दों को चरितार्थ करते हुए मुझे भ्रमणशील बनाती रहती है । ज्येष्ठ नागरिक के वर्ग में नाम दर्ज होने के बावजूद मैं प्रायः पर्यटकीय महत्व के दर्शनीय स्थलों की यात्रा में निकलता हूँ और उन क्षेत्रों को प्राथमिकता देता हूँ, जहाँ यातायात की सुविधा हो, जहाँ से राजधानी लौटने में अधिक समय न लगे, मौसम भी मैत्रीपूर्ण रहे और आवश्यकता पड़ने पर औषधोपचार की भी समुचित व्यवस्था हो ।
प्रकृति ने जहाँ नेपाल को हर दृष्टि से सुंदरतम देशों में से एक बनाया है, वहीं यहाँ की वास्तुशिल्प, काष्ठशिल्प और प्रस्तर कलाओं ने इसे सजाने और सँवारने में कोई कमी नही छोड़ी है । धार्मिक तीज–त्योहार और इन अवसरों पर निकलने वाली झाँकियाँ, नृत्य और जात्राओं ने इन त्योहारों को रंगारंग करने में कोई कसर नही छोड़ी है । अतः कभी–कभी इन नजारों का आनंद उठाने के लिए भी उन स्थलों पर पहुँचता हूँ जहाँ इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन हुआ करता है । काठमांडू के अलावा ललितपुर और भक्तपुर ऐसे जिले हैं जहाँ नेवा संप्रदाय के लोगों की अधिकता है और जहाँ कभी मल्ल राजाओं का शासन हुआ करता था । अधिकतर मल्ल शासक साहित्य और कला के मर्मज्ञ और धार्मिक प्रवृत्ति के थे । अतः उनके शासन काल में एक ओर साहित्य और कला को फलने–पूmलने का भरपूर अवसर मिला तो दूसरी ओर ऐसे कई कार्य हुए जो आज राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐतिहासिक, पुरातात्विक और धार्मिक आस्था के महत्वपूर्ण स्थल बने और बने पर्यटकीय दृष्टि से आकर्षण के प्रमुख केंद्र । भक्तपुर इसी कारण से एक बार मेरी यात्रा का लक्ष्यविंदु रहा ।
भक्तपुर का वास्तुकला और ललितकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है और इतिहासकार इसका श्रेय राजा जितामित्र मल्ल को देते है । वे कला मर्मज्ञ होने के अलावा साहित्यप्रेमी, नाटककार और कुशल तथा दूरदर्शी शासक भी थे । अपने पिता से शासन प्राप्त करने के बाद राजा भूपतिन्द्रमल्ल ने अपने लिए एक नए प्रासाद की निर्माण कराई, जिसमें ५५खिड़कियाँ लगवाई गईं । इसके अलावा ९९ चौक, देवी के नाम से पाँच मजिला मंदिर(न्यातः पो) की स्थापना के लिए नींव रखी । कहा जाता है कि इस पुनीत कार्य के लिए वे स्वयं निर्माण–स्थल तक ३ ईंटे उठाकर ले गए । यह मंदिर वर्तमान में न्यातपोल देवल और ५५खिड़कियाँे वाला प्रासाद ५५ झ्याले दरबार के नाम से प्रसिद्ध और पर्यटकों का आकर्षण का केंद्र रहा है । न्यातपोल देवल को यूनेस्को की संरक्षित संपदा सूची में समाविष्ट होने का सौभाग्य प्राप्त है । इस मंदिर के लिए वि.सं. १७५९में नींव डालने का काम किया गया । यहाँ के मंदिरों में एक अन्य प्रमुख मंदिर डोलेश्वर महादेव का है, जिसके संबंध में यह मान्यता है कि यहाँ भगवान केदारनाथ का मस्तक आ गिरा था ।
ललितपुर और कीर्तिपुर की तरह इस यात्रा में भी मुझे पत्रकार मित्र कुमार रंजित का साथ मिला । इस यात्रा काल में तो स्थानीय पुरातत्वविद् ओम धौभडेल से भी मिलने और कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ पाने का सुअवसर मिला । ख्वाप या भदगाँव के नाम से प्रसिद्ध यह जिला वि.सं. १७६९तक मल्ल शासकों की राजधानी थी । अतः उनके द्वारा निर्मित प्रासाद और मंदिर आज के दिनों में भी पर्यटकों के लिए अवलोकन की एक केंद्रबिंदु रही है । यहाँ के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में ३ मंजिला दत्तात्रेय मंदिर, ५ मंजिला न्यातापोल मंदिर, दरबार चौक, ५५ खिड़कियों से युक्त महल, सिद्ध पोखरी और चाँगुनारायण मंदिर रहे हैं । ५५ खिड़कियों से युक्त महल में लगाई गई खिड़कियाँ उत्कृष्ट कला का स्वरूप प्रस्तुत करती हैं ।
मल्ल शासकों की ईष्ट देवी तुलजा भवानी रही हैं । अतः उनके नाम से भी मंदिर का निर्माण हुआ । भक्तपर के एक राजा जगज्योतिर्मल्ल का देवी तुुलजा की अनन्य भक्ति के संबंध में एक प्रसिद्ध किंवदंती है । इसके अनुसार देवी तुलजा उनसे प्रसन्न होकर एक महिला के रूप में पासा (चौसर) खेलने नित्य आया करती थी । उनकी सुंदरता से प्रभावित होने के कारण एक दिन राजा के मन में कुछ बुरे विचार उत्पन्न हुए । देवी को जब उनकी नियत का भान हुआ तो वह वहाँ से अंतर्धान हो उठीं । तदुपरांत वह फिर उनसे चौसर खेलने नही आईं ।
भक्तपुर का इतिहास अत्यंत पुराना है । विद्वान लेखक डॉ. पुरुषोत्तमलोचन श्रेष्ठ के अनुसार भौगर्भिक दृष्टि से भक्तपुर १४करोड़ वर्ष पुरानी बस्ती है । भक्तपुर अवस्थित चित्तपोल में नवपाषण युग की कुदाल और ताथली में अन्य उपकरण की प्राप्ति से इस तथ्य की पुष्टि होती है । चाँगुनारायण मंदिर में स्थापित पाँचवीं शदी के राजा मानदेव का शिलालेख भी इस नगर की प्राचीनता की ओर इंगित करता है ।
विक्रम की १३वीं शताब्दी में इसे समस्त नेपाल मण्डल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त था । लिच्छवी काल में यहाँ घनी बस्ती थी । पर किरातकाल में खोपृंग के नाम से सुविदित इस नगर को विभिन्न अवसर पर अपने नाम के साथ छेड़खानी का भी सामना करना पड़ा है । खोपृंग किरातकालीन जनभाषा है । ‘खो’ का अर्थ होता है अन्न और भात तथा ‘पृंग’ का अर्थ बस्ती । इस प्रकार अत्यधिक अन्न उत्पादन करने वाला यह क्षेत्र खोपृंग कहलाने लगा । मध्यकाल में खोपृंग का संक्षिप्त रूप ख्वप हुआ । फिर इसका अपभ्रंश रूप भक्तग्राम प्रकट हुआ । इसके बाद इसका दूसरा अपभ्रंश नाम भदगाँव हुआ । वहाँ की नेवाः जाति अपनी इस भूमि को इस पुराने नाम से पुकारने में गर्व अनुभव करती है । यहाँ की भदगाउँले टोपी प्रत्येक नेपाली के लिए एक गौरवमय शिरपेच है । इस टोपी ने भी भदगाउँ को अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलायी है । अतः कई पर्यटक यहाँ आने पर काली भदगाउँले टोपी शिर पर धारण करते हुए शान से घूमते हैं । इसके अलावा यह जिला काष्ठकला और मिट्टी के बरतनों के निर्माण के लिए भी प्रसिद्ध है ।
वर्तमान में भक्तपर काठमांडू उपत्यका के अधीन एक जिला के रूप में क्रियाशील है । गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह के राष्ट्रीय एकीकरण के अभियान का भक्तपुर को भी शिकार बनना पड़ा और वि.सं. १८२६ साल के कात्र्तिक महीने में यह क्षेत्र राजा रणजीतमल्ल के प्रभाव से मुक्त होकर पृथ्वी नारायण शाह के कब्जे मे चला गया । पर उन्होंंने वहाँ की स्थानीय जनता की सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं से कोई छेड़खानी नही की । अतः भक्तपुर की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में निरंतरता बनी रही । प्रत्येक वर्ष नए साल के अवसर पर मनायी जाने वाली बिस्केट जात्रा की भी अपनी ही गौरवशाली परंपरा है, जिसमें काठमांडू उपत्यका के विभिन्न समुदाय के लोग सहभागी होकर अपनी विविधतापूर्ण संस्कृति पर गर्व महसूस करते हैं ।
भक्तपुर को पर्यटकीय स्थल के रूप में भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाने का श्रेय जाता है नगरकोट को । काठमांडू से २८कि.मी. की दूरी पर अवस्थित इस स्थल पर आने–जाने की भरपूर सुविधा है । परिवहन की सुविधा होने के कारण कई पर्यटक प्रातःकालीन सूर्योदय के मनमोहक दृश्य को देखने के लिए रात को यहाँ रुकने का कार्यक्रम भी बनाते है । अतः यहाँ विभिन्न वर्ग के पर्यटकों के लिये विभिन्न किस्म की होटले हैं । इसके अलावा समुद्र की सतह से २,०००मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित इस नगर से अन्नपूर्ण पर्वतश्रृंखला के अतिरिक्त १२ अन्य पर्वत श्रृंखलाओं का अवलोकन किया जा सकता है ।
भक्तपुर को प्रसिद्धि दिलाने में यहाँ की जु–जु धौ (दही )भी पीछे नही रही है । कहते हैं कि भक्तपुर आकर जो जु–जु धौ खाकर नही लौटा, उसकी भक्तपुर की यात्रा अधूरी ही है ।
संदर्भ

