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नारी सिर्फ शरीर नहीं उसके अन्दर भी एक जीवन है जिसे वो जीना चाहती है : श्वेता दीप्ति

 

जब भी कोई नारी पुरुषों की ज्यादती की शिकार हुई है, तो पहला सवाल नारी के लिए ही उठता है कि इसके पीछे वह स्वयं वजह होगी । ये नजरिया बदल जाय तो, उसकी नियति भी बदल जायेगी ।

नारी केवल मांसपिंड की संज्ञा नही

सम्पादकीय, हिमालिनी, अंक मार्च २०१८ | महादेवी वर्मा ने कहा था कि, ‘नारी केवल मांसपिंड की संज्ञा नहीं है । आदिम काल से आज तक विकास–पथ पर पुरुष का साथ देकर, उसकी यात्रा को सरल बनाकर, उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर, और अपने वरदानों से जीवन में अक्षय शक्ति भरकर, मानवी ने जिस व्यक्तित्व, चेतना और हृदय का विकास किया है उसी का पर्याय नारी है ।’ काश ! जिस दिन समाज इस बात को समझ लेगा उसी दिन आधी आबादी को उसकी सम्पूर्णता मिल जाएगी । आज तक समाज उसे सिर्फ उसके मातृत्व में, घर की चाहरदीवारी में और माँ, पत्नी, बहन और बेटी के रूप में देखना चाहता है । उसकी सम्पूर्णता इसमें ही मानी जाती है । पर इन सबके अतिरिक्त नारी का एक स्वतंत्र अस्तित्व भी है, जहाँ वो खुद के लिए भी जीना चाहती है । किन्तु यही ख्वाहिश उसके चरित्र की परिभाषा बन जाती है । नारी भोग्या नहीं, नारी सिर्फ शरीर नहीं उसके अन्दर भी एक जीवन है जिसे वो जीना चाहती है । पर जब भी कोई नारी पुरुषों की ज्यादती की शिकार हुई है, तो पहला सवाल नारी के लिए ही उठता है कि इसके पीछे वह स्वयं वजह होगी । ये नजरिया बदल जाय तो, उसकी नियति भी बदल जायेगी ।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस “आईडबल्यूडी” को अंतरराष्ट्रीय क्रियाशील महिला दिवस या महिलाओं के अधिकार और अंतरराष्ट्रीय शांति के लिये संयुक्त बुतपरस्त दिवस भी कहा जाता है जो समाज में महिलाओं के योगदान और उपलब्धियों पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये देश के विभिन्न क्षेत्रों में पूरे विश्व भर में ८ मार्च को हर वर्ष मनाया जाता है, पर अक्सर यह कार्यक्रमों में सिमट कर रह जाता है । फिर भी यह एक दिन सबका ध्यान अवश्य आकृष्ट करता है । इसलिए इस दिन की सार्थकता इस मायने में अवश्य मानी जा सकती है ।
नेपाल की जनता ने अपने ४१वें प्रधानमंत्री को पा लिया है । जनता की उम्मीदों का भारी बोझ वर्तमान सरकार के काँधे पर है । अब ये दीगर है कि ये काँधे झुकते हैं, या बोझ को उठाकर दौड़ने की क्षमता रखते हैं । वर्तमान सरकार के पास एक मजबूत पक्ष यह है कि इनके पास स्पष्ट बहुमत है जिसका फायदा देश हित में सरकार उठा सकती है, बशर्ते नीयत सही हो और सम्पूर्ण देश को मिलाकर चलने की ईमानदार भावना भी हो । मधेशी दल का सरकार को समर्थन एक नया परिदृश्य तैयार कर रहा है । क्या मधेशी नेताओं के द्वारा मुद्दों और मधेश की जनता की भावनाओं को दरकिनार किया जा रहा है ? वैसे दो नम्बर प्रदेश के विकास के लिए केन्द्र के साथ की आवश्यकता तो है परन्तु शहादत को भी याद रखने की आवश्यकता है । खैर, देखना है कि राजनीति का बदलता रंग किस पर असर छोड़ता है और कौन अपनी अडिगता से पीछे हटता है ? उम्मीद है एक बीच का रास्ता जरुर निकलेगा और देश को एक निश्चित दिशा प्रदान करेगा ।

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