मोदी की धार्मिक यात्रा की तासीर : श्वेता दीप्ति
नागरिक अभिनन्दन के दौरान उनके सम्बोधन ने बड़ी गहराई से नेपाल और भारत के रिश्तों के बीच धार्मिक आधार की गहनता को व्यक्त किया । तालियाँ भी बजीं और आशानुरूप जनकपुर और उसके आस–पास के विकास के लिए सौ करोड़ आर्थिक सहायता की घोषणा भी हुई
डॉ. श्वेता दीप्ति, हिमालिनी, मई अंक, २०१८ | अकस्मात तय हुई भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीसरी नेपाल भ्रमण की चर्चा ने सम्पूर्ण नेपाल में अच्छी खासी तरंग पैदा कर दी थी । जहाँ भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की जनकपुर भ्रमण की खबर ने मधेश के दिल में उत्साह को जन्म दिया वहीं पहाड़ का दिल आरम्भ से बैचेन और सशंकित ही नजर आया । भ्रमण की तैयारी को लेकर कई अप्रिय बातों को तरजीह दी गई । विराटनगर स्थित भारतीय दूतावास में बम विस्फोट और भारत विरोधी गतिविधियों में तेजी, कई राजनीतिक व्यक्ति और दलों द्वारा मोदी भ्रमण की तीव्र आलोचना तथा विरोध भी हुए । गृहमंत्रालय की ओर से सुरक्षा व्यवस्था का लेकर शंका भी जताई गई । इतना ही नहीं बार–बार मधेश आन्दोलन के समय हुई नाकाबन्दी को याद किया गया और सोशल मीडिया पर इसे प्रचारित भी किया गया और एक तबके की ओर से इसी विषय पर यह उम्मीद की जाती रही कि इन सारी वजहों का हवाला देकर मोदी भ्रमण को ऐन–केन–प्रकारेण रोका जाय । परन्तु जब–जब नाकाबन्दी का सवाल उठा तब–तब मधेश आन्दोलन के दौरान हुई निर्दोष मधेशियों की नृशंस हत्या की याद भी आती रही, जिसका मलाल पहाड को न कभी था और न शायद कभी होगा । हद तो तब हुई जब जनकपुर मोदी आ रहे हैं, इस बात पर एक पक्ष यह कहने से भी नहीं चूका कि मोदी आगमन की वजह से अब मधेश अलग हो जाएगा । सभी को यह सालता रहा कि मोदी को सीधे जनकपुर नहीं जाना चाहिए बल्कि अगर वो आ ही रहे हैं तो उन्हें पहले काठमान्डू आना चाहिए । आखिर इतनी अविश्वसनीयता किस पर ? अपने देश की जनता पर या अपनी ही सोच पर ? अगर यही मानसिकता रही तो विलगाव की यह अवस्था किसी तीसरे की वजह से नहीं आएगी इसकी वजह इसी मिट्टी से उत्पन्न होगी । समय को पहचानें और सोच बदलें, आवश्यकता इसकी है । पर इसकी संभावना नजर नहीं आती मधेश अपने दोयम स्थिति से निकलने की अवस्था में नहीं दिख रहा ।
अटकलों के बीच मोदी भ्रमण सम्पन्न हो चुका है । जैसा कि शुरु से ही कहा जाता रहा कि यह उनकी धार्मिक यात्रा थी, इसलिए किसी नई संधि या समझौते के लिए यहाँ कोई गुंजांइश न तो पहले थी और न ही ऐसा कुछ हुआ । यह बात दीगर है कि जब राजनेताओं की कोई भी यात्रा कहीं के लिए भी हो, तो वह राजनीतिक हो ही जाती है । प्रधानमंत्री ओली भारत भ्रमण पर गए थे तभी अरुण ३ के उद्घाटन के कयास लगाए जा रहे थे किन्तु उस वक्त यह सम्भव नहीं हो पाया, जिसे मोदी जी की इस यात्रा में पूरा किया गया । इस परियोजनाओं को लेकर भी जनता विशेष सरकार को कटघरे में खड़ा करती आ रही है और आज भी सरकार के फैसले से संतुष्ट नहीं है । उनकी इस असंतुष्टि की वजह से प्रधानमंत्री ओली को यह स्पष्टीकरण देना पड़ा है कि उन्होंने कोई राष्ट्रघाती कदम नहीं उठाया है । वैसे संतुष्टि वो वृक्ष है जिसमें असंतुष्टि के बीज गहनता से छिपे होते हैं इसलिए आरोप प्रत्यारोप तो जारी रहेंगे सरकार चाहे जो भी रहे । और आलोचना ही सरकार में सतर्कता लाती है इसलिए यह भी आवश्यक ही है ।
जनकपुर ने दिल खोलकर अपनी परम्परा तथा संस्कृति के साथ भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया और स्वयं मोदी इस क्षण से अभिभूत भी हुए । नागरिक अभिनन्दन के दौरान उनके सम्बोधन ने बड़ी गहराई से नेपाल और भारत के रिश्तों के बीच धार्मिक आधार की गहनता को व्यक्त किया । तालियाँ भी बजीं और आशानुरूप जनकपुर और उसके आस–पास के विकास के लिए सौ करोड़ आर्थिक सहायता की घोषणा भी हुई, रामायण सर्किट की चर्चा भी हुई बावजूद इसके मधेश की जनता उनकी जुवान से मधेश शब्द सुनना चाह रही थी, जो उन्हें सुनने को नहीं मिला । मधेश की पावन मिट्टी और मधेश की शान माँ जानकी के दरबार में खड़े रहकर भी मोदी मधेश शब्द से बचते रहे यह सबने महसूस किया । पर यह राजनीति है, जहाँ भावनाओं के लिए जगह नहीं होती । भावनाओं को सिर्फ उस वक्त भजाया जाता है जब जनता से उसके मत को प्राप्त करना होता है । यह नीति विश्व राजनीति की है इससे कोई अछूता नहीं है । राजनीति के लिए कूटनीति की जरूरत होती है भावनाओं की नहीं । अपनी पहली दोनों नेपाल यात्रा में मोदी जी की जुबान से मधेश शब्द भले ही प्रत्यक्ष रूप में ना आया हो पर अप्रत्यक्ष रूप से मधेश के लिए जो भावनाएँ व्यक्त हुई थीं और जिसकी वजह से वो कोपभाजन के शिकार भी हुए थे, शायद वो इस बार इस प्रसंग से बचना चाह रहे थे । मोदी अपनी पहली दोनों नेपाल यात्रा में जनकपुर जाने की इच्छा व्यक्त कर चुके थे परन्तु किसी ना किसी बहाने उनकी यात्रा को रोका जाता रहा था । इस रुकावट के पीछे कहीं ना कहीं उनका मधेश मोह कारण जरूर बन रहा था । परन्तु इस बार उन्हें जनकपुर यात्रा का अवसर मिल ही गया,अन्ततोगत्वा आननफानन में उनका आना तय भी हुआ और सम्पन्न भी । मोदी जी के स्वागत के लिए स्वयं प्रधानमंत्री ओली जी का जनकपुर जाना यह जाहिर कर चुका था कि कटुता की जो अनावश्यक लहर थी वह कहीं खो चुकी है । स्वयं प्रधानमंत्री ओली की मधेस यात्रा भी सहज हो गई । जहाँ तक मधेश के अस्तित्व और अधिकार का जो सवाल है, उसे दो नम्बर प्रदेश के मुख्यमंत्री लालबाबु राउत ने बहुत शालीन तरीके से अपने सम्बोधन में रख ही दिया । और जिसकी वजह से उन्हें पक्ष विशेष की आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है ।
यह लड़ाई मधेश की, मधेश की जनता की है और इसे मधेश को ही लड़ना होगा । मधेश की मजबूती ही मधेश के अस्तित्व का आधार बन सकती है और जिस दिन यह हो गया उस दिन विश्व मधेश का नाम लेगा ।
मोदी जी की तीसरी नेपाल यात्रा पहले हुई यात्राओं की तरह ही शुरुआती दौर से ही आलोचनाओं से घिरी रही, पर आलोचनाओं के तीर चाहे जितने भी चलें, यह अकाट्य सत्य है कि विश्व में मोदी की जो प्रभावशाली छवि है, उसकी वजह से विश्व का ध्यान मोदी की विदेश यात्रा पर रहता है और यही नेपाल के लिए पर्यटकीय दृष्टिकोण से आगामी दिनों में फायदेमंद साबित होगा इसमें कोई शक नहीं है । धार्मिक दृष्टिकोण से भारत और नेपाल में प्रसिद्ध जानकी मंदिर तथा मुक्तिनाथ को उनकी पुरानी पहचान और सम्मान में विश्व समुदाय के समक्ष बढ़ावा ही मिला है । जहाँ तक आलोचनाओं का सवाल है, तो भारत की चर्चा हो और वहाँ के लिए आलोचना या शिकायत ना हो यह तो यहाँ की हवा के लिए नामुमकिन ही है । कभी कभी यह खयाल आता है कि, एक अजीब सी बात है भारत के दो पड़ोसियों के मद्देनजर, एक तो है पाकिस्तान से भारत के तीखे रिश्ते जो कभी दोस्त होने का दावा नहीं करता । इसलिए भारत का विरोध वहाँ की नीयत में शामिल है और यह अपाच्य भी नहीं है । किन्तु दूसरा है नेपाल, जिसके लिए भारत हमेशा से मित्र राष्ट्र रहा है । जिसकी खुली सीमाएँ दिलों को जोड़ती है, जो अपनी साँस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक एकरूपता की वजह से एक दूसरे के करीब सदियों से नहीं युगों से रहे हैं, बावजूद इसके विरोध की हवा यहाँ निरन्तर काफी तेज गति से चलती रही है यहाँ ।
तराई और पहाड़ दोनों ही भारत से नाराज रहा है । जबकि यह एक ही देश के हिस्से हैं पर इनकी नाराजगी अलग अलग है । भारत का सहयोग नेपाल देश के लिए होता है । परन्तु सहयोग कम या ज्यादा होने की की नाराजगी इन दो हिस्सों को भारत के विरोध में खड़ा करता आया है । या तो हमारी उम्मीदें पड़ोस से ज्यादा है या फिर पड़ोस हमारी मानसिकता को नहीं समझ पाया है । पर जाहिर तौर पर सच तो यह है कि कोई भी तीसरा पक्ष अपने फायदे को देख कर ही आपके लिए सहयोग का हाथ बढ़ाएगा क्योंकि वह पहले अपने देश के लिए जिम्मेदार होता है और उसी के परिप्रेक्ष्य में अपने राजनीतिक फैसले ले सकता है, और लेता है । बावजूद इसके आरोप प्रत्यारोप के दौर चलते ही रहते हैं । नेपाल और भारत की नीति में ऐसा कौन सा कमजोर बिन्दु है जो समय असमय विरोध को जन्म देता रहा है ? इस विषय को हमेशा तरजीह देते हुए सुलझाने की जरुरत है । समय अविश्वास को हवा देने का नहीं है अगर यही होता रहा तो देश के विकास की गति कछुए की गति से भी बदतर हो जाएगी ।
नई सरकार गठन पश्चात् भारत के आमंत्रण पर प्रधानमंत्री ओली की भारत यात्रा और इसके बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नेपाल की धार्मिक यात्रा से यह उम्मीद की जा रही है कि रिश्तों की एक नई परिभाषा तैयार हो रही है जहाँ सहयोग की अपेक्षा समानता पर टिकी हुई है । उम्मीद है कि रिश्तों के बीच की नाजुकता को दोनों देश समझेंगे क्योंकि यह रिश्ता सिर्फ राजनीति का नहीं है बल्कि दो ऐसे मित्रों का है जो लड़ते भी हैं तो जरूरत में एक दूसरे के लिए मजबूती से खड़े भी रहते हैं और एक दूसरे का सहारा भी बनते हैं ।

