नेपाल की परराष्ट्र नीति का संस्थागत विकास : श्यामानन्द सुमन
काठमांडू, हिमालिनी, मई अंक । नेपाल के परराष्ट्र नीति का विकास और परिमार्जन करीब ढ़ाई सौ साल पहले से ही होता आ रहा है । सन १७६८ से गोरखा राज्य के तत्कालीन राजा पृथ्वी नारायण शाह के राष्ट्र एकीकरण (विस्तारीकरण) के अभियान से शुरु होता है । इस एकीकरण से पहले हाल के नेपाली भूभाग में बाइसे–चौबीसे के नाम से प्रचलित राज्यों तथा अन्य छोटे बडे सामन्तो का राज्य हुआ करता था । उस समय इन राज्यों का अपना राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और अन्य प्रकार के सम्बन्ध अपनी ही सीमा के अन्दर या पड़ोसी राज्य के छोटे से दायरे में सीमित हुआ करता था । लेकिन राष्ट्र के एकीकरण के बाद नेपाल के सम्बन्ध का दायरा बढ़ता गया और दूसरे राष्ट्रों से सम्बन्ध का विस्तार हुआ । खास कर सबसे पहले नेपाल–चीन युद्ध जो सन् १७८८–९२ में हुआ और जिसका अन्त बेद्रावती सन्धि से हुआ और फिर सन् १८५५–५६ में नेपाल–तिब्बत (चीन) युद्ध होकर थापाथली संधि से अन्त हुआ । फिर ब्रिटिश भारत और नेपाल का युद्ध (१८१४–१६) के बाद नेपाल का भौगोलिक सीमा कायम हुआ । अतः उक्त घटनाओं के बाद नेपाल का वैदेशिक संबंध उत्तर और दक्षिण के पड़ोसी राष्ट्रों से बढ़ता गया ।
एकीकरण के पश्चात् परराष्ट्र मामला सम्बन्धी व्यवस्था करनेवाले एशिया के देशों में नेपाल का स्थान अग्रणी पंक्ति में रहा है । सन् १७६८ में नेपाल एकीकरण के बाद शाहवंशीय राजा (महाराजा) पृथ्वी नारायण शाह ने दूसरे देशों से औपचारिक सम्बन्ध रखने के लिए एक ‘जैसी कोठा’ का व्यवस्था किया था । भले ही उस समय नेपाल का वैदेशिक सम्बन्ध सिर्फ भारत (ब्रिटिश भारत) और चीन के साथ ही सीमित था । (कहा जाता है कि जैसी कोठा में काम करनेवाले कोई ज्योतिषी थे, उसी से जैसी कोठा÷जैसी खाना नाम रखा गया था ।) फिर बाद में दिल्ली (भारत) के तत्कालीन शासकों के साथ कागजी व्यवहार होने से अरबी–फारसी भाषा के भी काम होने लगे । और तभी जैसी कोठा का नाम बदल कर ‘मुन्सी खाना’ रखा गया था । यह नामकरण भीमसेन थापा के प्रधानमन्त्रीत्वकाल सन् १८०४ (वि.सं. १८६०) में हुआ था । फिर समय के अन्तराल राणा शासक काल में भी थोडी बहुत तब्दिली आई । पर काम के सिलसिले में फिर भी अफिस का नाम मुन्सी खाना ही रहा । जंगबहादुुर राणा के प्रधानमन्त्रित्व काल में ब्रिटेन के साथ सम्बन्ध बढने से मुन्सी खाना को तीन डिभिजन (विभाग) में बांटा गया ।
(१) ब्रिटिस इण्डिया डिभिजन,
२) जैसेी कोठा और
(३) मुन्सी क्यापिसिटेन्स अफिस । फिर चन्द्र शमशेर के प्रधानमन्त्रित्व काल में भी परराष्ट्र संबंधी प्रशासनिक ढाँचे में पुनर्गठन किया गया– १) जैसी कोठा, २) सदर अमिनी गोश्वारा, ३) सीमा सर्भे,
४) इण्डिया–ग्रेट ब्रिटेन डिभिजन,
५) मुन्सी क्यापिसिटेन्स ऑफिस,
६) सिंहदबार फरमाइसी अण्डा, जिसे एसोसिएटेड डिभिजन का दर्जा दिया गया । सन् १९३४ से अंग्रेजी में लिखा पढ़ी करते वक्त मुन्सी खाना को डिपार्टमेन्ट और उसके प्रमुख को डाइरेक्टर जेनरल लिखा जाने लगा । इस डिपार्टमेन्ट का काम विशेष कर तिब्बत के ल्हासा स्थित मिशन और भारत में रहे नेपाली मिसन से पत्राचार करना था । उस समय पटना में रहे ‘अलैची कोठी’ और बनारस तथा कोलकता में रहे ‘वकील कार्यालय’ को बाद में दिल्ली दूतावास में रुपान्तरण किया गया ।
जो भी हो, नेपाल के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध और विदेश नीति का आधुनिकीकरण सन् १९५० के बाद प्रारम्भ होता है । सन् १९५०–५१ में विशाल जनविद्रोह के मार्फत १०४ वर्ष का तानाशाही राणा शासन का अन्त हुआ । इसके परिणाम स्वरूप नेपाल के पुराने शासन पद्धति का अन्त होकर एक नवोदित राष्ट्रीय शासन पद्धति के अनुसार देश के अन्य प्रशासनिक संगठनों के साथ ही अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध संचालनार्थ परराष्ट्र मन्त्रालय की स्थापना हुई । सन् १९५१ में इस मन्त्रालय की स्थापना के साथ ही नेपाल के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध में द्रतुतर प्रगति हुई और संसार के विभिन्न देशों के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध का विस्तारीकरण हुआ । पृथ्वी नारायण शाह के शाही शासन काल से लेकर १०४ वर्ष के राणा कालीन शासन अर्थात् सन् १९५० तक जहा एक ओर सिफं ४ देशों–भारत, ब्रिटेन, फ्रान्स, संयुक्त राज्य अमेरिका– से कूटनीतिक संबंध स्थापित हो सका था । वहीं सन् १९५० के दशक में ही २५ राष्ट्र से औपचारिक सम्बन्ध स्थापित हो गया । अभी तक तो करीब १५० राष्ट्रों से औपचारिक रूप से कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित हो चुका है । और यह क्रम जारी है ।
नेपाल ने हाल तक संसार के विभिन्न देशों के ३८ स्थानों में अपना कूटनीतिक नियोग (राजदूतावास और कन्सुलर नियोग समेत) की स्थापना कर अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति संचालन कर रहा है । इससे द्विपक्षीय, बहुपक्षीय, क्षेत्रीय एवं उप–क्षेत्रीय कूटनीतिक कार्याें का संचालन करता है । उक्त नियोग सब राजनीतिक–कूटनीति के अलावा आर्थिक कूटनीति, आर्थिक सहयोग, पर्यटन, व्यापार, वैदेशिक रोजगारी आदि को भी अञ्जाम देता है ।
विगत के समय में नेपाल बहुत से अन्तर्राष्ट्रीय, क्षेत्रीय तथा उप–क्षेत्रीय, संगठनों का सदस्य हुआ । सन् १९५५ में संयुक्त राष्ट्रसंघ की सदस्यता के साथ ही नेपाल विश्व के अनेक अन्तर्राष्ट्रीय मञ्चों पर सक्रियता के साथ कायम रहा है । सन् १९५५ में एफ्रो–एसियन बांडुङ कन्फ्रेन्स और बाद में असंलग्न राष्ट्र के १९६१ बेलग्रेड में स्थापना काल से सभी सम्मेलनों में भी नेपाल काफी सक्रिय रहा । सन् १९८५ में स्थापित सार्क (दक्षिण एसियाली सहयोग संगठन) का नेपाल संस्थापक सदस्य देश रहा और तभी से अपना सक्रिय सहयोग में व्यस्त है । सार्क के मुख्यालय का काठमांडू में स्थापना होना ही नेपाल के सक्रियता का द्योतक है । साथ ही विकास में महिला सम्बन्धी प्राविधिक समिति का संयोजक भी नेपाल को ही बनाया गया । सार्क का क्षेत्रीय क्षय रोग नियन्त्रण केन्द्र भी काठमांडू में ही रखा गया । नेपाल अभी भी सार्क संगठन का अध्यक्ष है । लेकिन नेपाल के सक्रियता के बावजूद सार्क देशों के विकास का जो अभिष्ट है, वह अभी तक पूरा हुआ नहीं दिखता है । इसके लिए अनौपचारिक तवर से कहा जाए तो इसमें भारत और पाकिस्तान का अपना राजनीतिक सम्बन्ध ही आडे आते दिखता है । हम सिर्फ आशा रख सकते हैं कि भविष्य में एक दिन दोनों देशों को सम्बन्ध अच्छे होंगे, और सार्क की गाड़ी सही पटरी पर विकास के अपने गन्तव्य की ओर रवाना होगी ।
१९५५ में संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता से पहले भी और बाद में अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों तथा उनके विशेष एजेन्सियों में भाग लेता रहा है । जैसे एफएओ १९५१ (खाद्य–कृषि संगठन) युनेस्को (१९५१), डब्लुएचओ (१९५३) इकाफे (१९५४), वल्र्ड बैंक एण्ड आईएमएफ (१९६१) आदि । नेपाल २००४ में बिमस्टेक की सदस्यता प्राप्त की और अभी इस संगठन की अध्यक्षता भी कर रहा है । इसके अलावा उपक्षेत्रीय समूह– भारत, नेपाल, भुटान, बंगलादेश का भी सदस्य रहा है ।
इधर परराष्ट्र मन्त्रालय के प्रशासनिक कार्य क्षमता एवं दक्षता में अभिवृद्धि के दृष्टिकोण से भी समय–समय में सुधार किया गया, जो निम्न विभिन्न अध्ययन एवं सुझाव पर आधारित था–
१. उच्च स्तरीय टास्कफोर्स रिपोर्ट १९९६ (भट्ट रिपोर्ट)
२. आर्थिक, कूटनीति सम्बन्धी नीति– १९९८ (मधुकर राणा रिपोर्ट)
३. आर्थिक कूटनीति सम्बन्धी नीतिगत अध्ययन रिपोर्ट– २००२ (बद्री श्रेष्ठ रिपोर्ट)
४. नये परिस्थिति में परराष्ट्रनीति सम्बन्धी सुझाव– २००६
५. परराष्ट्र मन्त्रालय का संगठन एवं व्यवस्थापन सम्बन्धी अध्ययन– २००७
६. परराष्ट्र मामिला सम्बन्धी अध्ययन संस्थान का आर्थिक कूटनीति सम्बन्धी रिपोर्ट– २००८
७. उच्च स्तरीय आर्थिक कूटनीति संचालन तथा मूल्यांकन कमिटी रिपोर्ट– २००८ (परराष्ट्र मन्त्री स्तरीय)
८. आर्थिक कूटनीतिः सम्भाव्यता एवं समस्या– २००९ (नेपाल के रिटायर्ड राजदूत के संगठन का रिपोर्ट)
सन् १९९० के प्रजातान्त्रिक आन्दोलन के बदौलत बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था की पुरुत्थान के बाद पुनः एक बार परराष्ट्र मन्त्रालय को समय के मांग के अनुसार पुनर्गठन किया गया । सन् २००७ के बाद से इसे प्रशासनिक सेवा से हटाकर परराष्ट्र सेवा का गठन किया गया । ताकि मन्त्रालय तथा इसका काम कारवाही समय सापेक्ष हो सके और अपना काम चुस्त, दुरुस्त और सक्षमता के साथ कर सके । फिर भी परराष्ट्र मन्त्रालय के संगठनात्मक संरचना तथा काम करने के तरीके में अभी भी सुधार करने की काफी गुंजाइस है । वैसे भी किसी भी संगठन या संस्था में सुधार तथा परिमार्जन का कार्य निरन्तर प्रक्रिया में होते रहना चाहिए ।
अन्त में कहा जा सकता है कि विगत के दिनों में नेपाल की परराष्ट्र नीति तथा संगठनात्मक व्यवस्था सामन्ती एवं स्वेच्छाचारी सत्ताधारियों के हित में परिचालित होता था । लेकिन अब आम जनता के हित एवं प्रगति के लिए उद्धत रहेगा । राष्ट्रीय शान्ति, आर्थिक विकास एवं उच्चतर समृद्धि, विकास एवं समृद्धि मुख्य मुद्दा रहेगा । यह सारा प्रजातान्त्रिक एवं जनमुखी व्यवस्था एवं वातावरण में ही सम्भव है ।
संयोग से कहे या नेपाल की जनता की सत् प्रयास से, नेपाल एक नये युग में प्रवेश कर चुका है । देश में राजतन्त्र का अन्त और संघीय गणतान्त्रिक व्यवस्था का आगाज हो चुका है । जनता के चुने प्रतिनिधियों के द्वारा संविधानसभा से निर्मित नेपाल के गणतान्त्रिक संविधान का चुनावों द्वारा सफल कार्यान्वयन हो चुका है । अतः भविष्य में नेपाल की परराष्ट्र नीति का परिचालन भी लोक सम्मत विधि द्वारा नियोजित देश विकास एवं समृद्धि के लिए होगी । ऐसी परिकल्पना की जा सकती है । पड़ोसी देशों एवं अन्य सभी अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों से अच्छे सम्बन्ध के साथ परारष्ट्र नीति का संचालन होने की आशा की जा सकती है ।
(लेखक पूर्व राजदूत एवं परराष्ट्रविद् हैं)

