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मधेश के लिए न शुद्र और ना ब्राह्मण पहले एकता आवश्यक

 

कुमार भागीरथ, विदेह संयोजक, |  मधेश के लिये मधेशीयों को आपस में बाँटने की जरुरत नहीं है | एक विद्वान की ओर से हमेशां सामाजिक एकता का प्रयत्न होना चाहिए न की बँटवारे का | जिस कदर शुद्र को ब्राह्मण से लड़ने के लिए उकसाया जा रहा हैं उतने ही उर्जा से मधेशीयों को नेपाली उपनीवेश से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए तो मधेश को बहुत लाभ पहुँचेगा |

केबल आजादी हमारा मकसद भी नहीं | आजादी तो बस पहला कदम हैं और मकसद हैं वतन बनाना जहाँ हर तपके के लोंग बराबरी से जीवनयापन करें किंतु उसके लिए समाज में बँटवारे की आवश्यकता नहीं |

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माना की मैथिली मधेश को जोड़ने हेतु उचित नहीं किंतु इसका यह मतलव नहीं की उस भाषा को विदेशी भाषा सिद्ध करना आवश्यक हैं और उसके लिए जातीय हिंसा फैलाने वाली दलिलें पेश करें | अपने द्वारा निर्मित मधेश ब्रोचर में हि मैथिलि को मुख्य भाषा के रुपमें जाहेर करना और अभी उसे ही विदेशी भाषा बताना कितना उचित है |

छुवाछुत प्रथा के हम भी विरोधी हैं किंतु उसके लिए केवल ब्राह्मण ही जिम्मेदार नहीं हैं अपितु उस प्रथा को मानने वाले शुद्र भी उतने ही जिम्मेदार हैं | अगर जात पुछने बाले व्यक्ति को खिचकर कण्टाप लगाने की व्यवस्था हो तो ना ही कोई शुद्र होगा और ना ही कोई ब्राह्मण पर इसे तो आप जैसे अहिंसावादी लोग हिंसा ही बताएँगे |

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बिना संघर्ष के और केवल बातचीत से समानता नहीं आती | अगर बातचीत से ही समानता और स्वतंत्रता हासिल होती तो बिर्टेन, अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र एवं अंतर्राष्ट्रीय कुतनितिज्ञ संयुक्त राष्ट्र संघ को भी मालुम हैं कि मधेश में नेपाली उपनीवेश हैं और अत्यधिक मधेशी स्वतंत्रता चाहते हैं तो बातचीत से क्यों नहीं आजाद कराते हैं मधेश को ?

नेपाल की सत्ताधारी जात ही बहरे हैं और बहरे को कुछ सुनाना हो तो आवाज उच्च होना चाहिए | आवाज को उच्च कैसे बनाया जाएँ यह क्रांतिकारी बेहतर जानते हैं |

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