योगासन – आचार्य श्री स्वामी ध्रुव
योगासन के लाभ— ठीक से किया गया योगासन हमारे पूरे शरीर के माँसपेशियों को लचीला रखता है । रक्त संचरण को संतुलित करने में सहायता करता है । अनावश्यक द्रव्य पदार्थ को शरीर से बाहर निकाल देता है । मेटाब्लोजिम को ठीक रखता है तथा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है ।
पिछले २० वर्षो से योग जीवन यात्रा के दौरान सैकड़ो भक्तों को हमने देखा कि गलत तरीके से योगासन करने के कारण उन्हें एक दूसरी समस्या पैदा हो गई । सभी आसन सबों को नहीं करना करना चाहिए । कौन आसन, कैसे और कितनी बार करना है ? इसका ज्ञान होना जरुरी है ।
प्रमुख आचार्य तो काफी ज्ञानी होते हैं वे इसका ख्याल रखते हैं, परन्तु उनके सहायक योगाचार्य या सह–प्रशिक्षक “नीम हकीम खतरे जान” की तरह होते हैं । वे अज्ञानता और अहंकार के कारण गलत ढंग से प्रशिक्षण देते हैं । जिसका बुरा प्रभाव सामान्य जन को भोगना पडता है ।
योगासन करने के विशेष नियम
१. योगासन करने के समय कभी भी जल्दबाजी और जबरदस्ती यानि क्षमता से अधिक शक्ति लगाकर कोई भी आसन न करें ।
२. ठंढ के मौसम में अधिक से अधिक ४० मिनट, बरसात में ३५ मिनट तथा गर्मी में ३० मिनट से ज्यादा योगासन न करें ।
३. मासिक धर्म और बीमारी की अवस्था में योगासन न करें ।
४. किसी भी व्यक्ति को १० से १२ आसन ही करना चाहिए ।
५. ढीला वस्त्र पहनकर और खुली जगह में ही योगासन करना चाहिए ।
६. अगर आप जाँगिंग–स्वीमिंग–डाँस–रनिंग या वाक करते हैं तो उसके बाद योगासन करें । अंत में प्राणायाम और ध्यान करें ।
७. कभी भी खाली पेट में ही योगासन करना चाहिए, खाने के ३–४ घंटा के बाद योगासन कर सकते हैं और योगासन करने के २०–२५ मिनट बाद ही खाना खा सकते हैं ।
८. योगासन करनेवाले व्यक्ति को दैनिक १०–१२ ग्लास पानी अवश्य पीना चाहिए ।
९. गर्भावस्था की स्थिति के बाद में किसी योग्य गुरु के निर्देशानुसार ही योगासन करें ।
१०. किसी भी प्रकार के आपरेशन के ६ महीने बाद ही उचित परामर्श लेकर योगासन करें ।
वज्रासन
हमारे शरीर में वज्र नाम की एक नाडी है । इसी कारण इस आसन का नाम वज्रासन रखा गया है । इस आसन को करने के लिए दोनों घुटनों को मोड़कर एक छोटे गददे पर ऐसे बैठे कर पैर का दोनों अंगुठा आपस में स्पर्श करता रहे । दोनों हाथ दोनों घुटनों पर रखें । कमर, रीढ़ और गर्दन सीधा रखें । इस आसन में १० मिनट बैठे । इस बीच लंबी,धीमी और गहरी साँस ले एवं छोड़े । इसमें गर्दन, आँखों तथा हाथों की भी क्रिया करें ।
लाभ— आमाशय, मस्तिष्क, कमर,आँखों, घुटनों, जाँघों और सम्पूर्ण पाचन प्रणाली को मजबूत करता है । हर्निया, गैस्ट्रिक, साइटिका तथा कब्ज में लाभ करता है ।
पृथ्वी नमस्कार
इसको करने के लिए पहले वज्रासन में बैठ जायें, दोनों हाथों को पीछे की ओर से एक दूसरे से पकड़ लें । साँस छोडते हुए सर को जमीन से स्पर्श करावे एवं क्षमता के अनुसार रुके और साँस लेते हुए ऊपर पूर्व स्थिति में आये । इस क्रिया को पाँच बार करें ।
लाभ— पेट की अनावश्यक चर्बी में कमी, कमर और रीढ को मजबूती मानसिक शान्ति एवं तनाव से मुक्ति, पीनियल एवं पिटयूटरी ग्लैंड को क्रियाशील करता है ।
नोटः स्लिपडिस्क एवं साइटिका के रोगी इस आसन को न करें ।
मत्स्यासन
इसे करने के लिए पदमासन या सामान्य रूप से पालथी कार कर बैठ जायें । इसके बाद धीरे से पीठ के बल लेट जाए । दोनों हाथों को सर के नीचे रखें । १५ बार लंबी, गहरी और धीमी साँस लें एवं छोड़ें । उसके बाद पूर्व स्थिति में लौट जाये ।
लाभ— थायराइड ग्रंथि, स्पाइनल कोड, पीठ और फेफड़ों की कार्य क्षमता में वृद्धि, दम, सर्दी,जुकाम, खाँसी से मुक्ति एवं मस्तिष्क में खून की अतिरिक्त आपूर्ति करता है । जिससे मानसिक क्षमता में वृद्धि होती है ।
ताड़ासन
इस आसन को वृक्षासन भी कहते है । ताड़ासन करने के लिए सीधा खड़ा हो जाये, उसके बाद साँस लेते हुए पंजों के बल खडे हो जाये और दोनों हाथों को ऊपर उठायें । यथासंभव रुके, उसके बाद साँस छोडते हुए पूर्वस्थिति में आये । इस क्रिया को १० बार करें ।
लाभ— आमाशय, मलाशय एवं हृदय की स्नायु को मजबूत करता है । वात एवं गठिया में लाभ प्रदान करता है ।
त्रिकोणासन
सीधा खड़ा हो जाये । दोनों पैरों को दो फुट की दूरी पर रखे । साँस छोड़ते हुए आगे से झुके और दायें हाथ से बायें पैर को स्पर्श करे एवं साँस लेते हुए वापस लौटे । फिर साँस छोड़ते हुए उसी प्रकार बायें हाथ से दायें पैर को स्पर्श करे एवं पूर्व स्थिति में आ जाये । इसे २ मिनट तक करें ।
लाभ— निराशा, शारीरिक एवं मानसिक तनाव से मुक्ति, रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं लम्बाई में वृद्धि, सम्पूर्ण शरीर के केन्द्रीय स्नायु संस्थान को मजबूती, प्रोस्टेन्ट ग्रन्थि को क्रियाशील तथा सेक्सुअल समस्या को संतुलित करता है ।
अर्ध वक्रासन
इस आसन को करने के लिए पहले सीधा खड़ा हो जायें । दोनों हाथों को कमर पर रखें । शरीर के ऊपरी भाग दायें तरफ घुमायें और पीछे की ओर देखें । धीरे–धीरे पूर्वस्थिति में आ जायें उसके बाद फिर बायें तरफ घुमायें और पीछे देखें एवं पूर्वस्थिति में आ जायें । इसे क्रमशः ३–३ बार करें । इसी आसन में पैर के जोड़ों का भी व्यायाम करें ।
लाभ– थाइराइड तथा पेन्क्रियाज ग्लैंड के कार्यक्षमता में वृद्धि कर के मधुमेह एवं वात संबंधी रोग को ठीक करता है । इसके अलावे गर्दन, सिर, पीठ एवं कमर दर्द से मुक्ति और शरीर के रक्त संचार को तेज करता है । रोग प्रतिरोधक एवं मानसिक क्षमता में वृद्धि करता है ।
अर्ध चक्रासन
इस आसन को वक्रासन और मेरुदंडासन भी कहते हैं । इसे करने के लिए पीठ के बल लेट जाये, दोनों हाथों को सिर के नीचे रखें । इसके बाद दोनों घुटनों को मोड़कर पैर के तलवों की जमीन पर स्पर्श कराये । फिर दोनों घुटनों को दायें तरफ झुकायें और बायें ओर देखें फिर बायें तरफ झुकायें और दायें तरफ देखें । इसे ६–६ बार धीरे–धीरे करें । साँस सामान्य रुप से सुविधानुसार लें एवं छोडेÞ ।
लाभ— रीढ, कमर एवं जोड़ों के दर्द से मुक्ति, पूरे शरीर में स्पूmर्ति, कार्य क्षमता में वृद्धि एवं इम्युन सिस्टम को भी बढ़ाता है ।
पवन मुक्तासन
पीठ के बल सीधा लेट जायें । दोनों घुटनों को मोड़कर पेट के ऊपर रखें और दोनों हाथों से पकड़कर दबाब दें एवं साँस को बाहर निकालें । दबाब देते समय नाक को घुटनों से स्पर्श करावें । ५ सेकेण्ड रुके उसके बाद पूर्व स्थिति में आ जायें । इसे ५ बार करें ।
लाभ— पाचन सम्बन्धी, गैस्ट्रिक, बबासीर, हृदयरोग, कब्ज एवं पेट संबंधी सभी रोग से मुक्ति प्रदान करता है । कमर, घुटनों, जाँघ एवं आमाशय में रक्त संचार तीव्र करता है । कमर, घुटनों, जाँघ एवं अमाशय में रक्त संचार तीव्र करता है । पेट की अशुद्ध वायु को बाहर निकालता है ।
सर्पासन
इसे भुजंगासन भी कहते है । इसे करने के लिए पेट के बल लेट जायें । दोनों हथेलियों को अगल–बगल में रखें । दोनों पैर साथ रहेगा । उसके बाद लंबी साँस लेते हुए कमर के भाग को ऊपर उठाये । छत की तरफ देखें । ३० सेकेण्ड तक रोके । उसके बाद साँस छोड़ते हुए वापस लौटे । इसे ६ बार करें ।
नोट—पेट में घाव, हर्निया का आपरेशन, आँत की बीमारी में यह आसन न करें ।
लाभ– किडनी और पेट की समस्त स्नायु का मजबूत, पेट के मोटापा को कम, भूख में वृद्धि तथा मासिक धर्म को संतुलित करता है ।
सर्वांगासन
इस आसन में हलासन और पश्चिमोत्तासन को भी शामिल किया गया है । इसमें दो चरण है । इसे करने के लिए पीठ के बल लेट जाये, दोनों हाथों को अगल–बगल में रखें, साँस छोड़े एवं रोककर दोनों पैर को उठायें, सर की ओर जितना ले जा सकते हैं ले जायें फिर वापस जमीन पर रखें एवं साँस लें । इसे ४ से ६ बार करें । उसके बाद दोनों हाथों को सिर के नीचे रखें एवं साँस लें एवं रोककर कमर के ऊपर के भाग को उठायें, आगे की ओर झुके एवं वापस लौटें और साँस छोडेÞ । इस क्रिया को भी ४ से ६ बार करें । बाद में बढ़ा सकते हैं ।
नोट– उच्च रक्तचाप, ह्दय रोग, साइटिका एवं स्लिपडिस्क के रोगी इस आसन को न करें ।
लाभ– मानसिक शान्ति, पाचनक्रिया, स्मरण शक्ति एवं मस्तिष्क के शक्ति में वृद्धि, सेक्सुअल समस्या से मुक्ति, एड्रीनेलिन तथा थाइरायड ग्लैंड को मजबूती, लिवर, किडनी और मेटाब्लोजिम को संतुलित करता है । इसके अलावे अस्थमा, मोटापा, मधुमेह, हाइड्रोसिल, बबासीर, खाँसी की समस्या पर नियंत्रण करता है ।

