अगर बचानी बेटियां, करें आज संकल्प । बेटी का जग में नहीं, कोई और विकल्प ।
बेटी है इक्कीस
डा. रामनिवास ‘मानव’
बेटा–बेटी में नहीं, कहने को कुछ भेद ।
मरती फिर भी बेटियां, इस बात का खेद ।।
क्या देना, उनको यहां, भले–बुरे की सीख ।
जो अपनी ही कोख की, सुन ना पाते चीख ।।
आये दिन होता यहां, सरेआम यह पाप ।
मरती कन्या कोख में, मरवाते मां–बाप ।।
जो कन्या खुद कभी, करती अत्याचार ।
अपनी बेटी को स्वयं, रही कोख में मार ।।
हत्या से कुछ कम नहीं, कन्या–वध का पाप ।
करते फिर भी है स्वयं, जाने क्यों मां–बाप ।।
बेटा है यदि बीस, तो बेटी है इक्कीस ।
कर पता बेटा भला, कब बेटी की रीस ।।
राजनीति, व्यापार हो, शिक्षा हो या खेल ।
बेटों को पीछे बेटियां, अब तो रही धकेल ।।
बेटी से रोशन रहें, दोनों घर–ससुराल ।
दुनिया लगती है सदा, बेटी से खुशहाल ।।
रहें थिरकती बेटियां, रोशन हो घर–बार ।
ज्यों करती है तितलियां, उपवन को गुलजार ।।
बेटी चढ़ी पहाड़ पर, नापा है आकाश ।
बेटी अनुकृति बाप की, मां का है विश्वास ।।
अगर बचानी बेटियां, करें आज संकल्प ।
बेटी का जग में नहीं, कोई और विकल्प ।।
नारनाैल हरियाणा


