शरीर, मन और वाणी
भजन कैसे किया जाए– इसका कोई एक उत्तर नहीं होता है । क्या नहीं होता है ? इसलिए अपने इष्टदेव को हम चाहे जैसे भजें, वह भजन है । भजन का अर्थ होता है– सेवा । जिस प्रकार से हम भगवान की सेवा करें, उसका नाम है– भजन । भगवान का नाम–जप करते हैं, वह भजन, भगवान का ध्यान करते हैं वह भजन, भगवान के नाते हम जगत के प्राणिओं की सेवा करते हैं वह भजन, भगवान की मुर्ति की पूजा करते हैं वह भजन, भगवान की आज्ञा मानते है वह भजन, भगवान के शास्त्र–वाक्याें के अनुसार जीवन व्यतीत करते है, वह भजन, यह सब भजन है । परन्तु एक बात समझ ले तो सब कार्य भजन हो जाय । वह बात है कि हमारे पास तीन चीजें है– शरीर, मन, और वाणी, इन तीनों का उपयोग हम भगवान के भजन में, उनकी सेवा में करें ।
शरीर के द्वारा विलासिता, शौकीनी, मतलबी, ब्रह्मचार्य का नाश और उदण्डता इत्यादि दोषों को छोड़ करके शरीर को लगा दे भगवान की सेवा में । भगवान की सेवा का अर्थ मुर्तिपूजा उनके श्रीविग्रह की पूजा भी है और वह अवश्य करनी चाहिए । नित्य–नित्य करनी चाहिए । परन्तु एक ऐसी पूजा है, जिससे हम जीवनपर्यन्त भगवान की पूजा कर सकते हैं । अपने शरीर से हम जो भी कार्य करें, उसमें यह भाव रखे कि हम भगवान की सेवा कर रहे हैं । शरीर का समस्त उपयोग भगवान की सेवा में करे । भगवान ने कहा हैं– ‘यत्करोषि’ तुम जो भी करो वह सब मेरे को अर्पण करो– ‘तत्कुरुब्वू मदर्पणाम् (गीता ३२७), सोचें हम और अर्पण भगवान को हो । भोजन हम कर और अर्पण भगवान को हो, अब इस बात को समझना है कि यह हो कैसे ?
एक व्यक्ति भोजन इसलिए करता है कि अमुक–अमुक पदार्थ जो शरीर के लिए आवश्यक है, उपयोगी है, उन्हें खाये तो स्वास्थ्य ठीक रहेगा । एक आदमी इसलिए भोजन करता है कि अमुक–अमुक चीजों को खाने से मद–मत हो जाएंगे और अधिक भोग करेंगे । एक आदमी भोजन इसलिए करता है कि शरीर में शक्ति आएगी । तब मातापिता और देश की सेवा कर सकेंगे । एक आदमी भूख मिटाने के लिए किसी प्रकार पेट भर लेता है और एक आदमी इसलिए भोजन करता है कि शरीर मिला है भगवत प्राप्ति के लिए, परन्तु भगवत प्राप्ति होती है भजन से और भजन के लिए शरीर की रक्षा आवश्यक है । शरीर की रक्षा के लिए भोजन आवश्यक है । इसलिए वह वैसा ही भोजन करता है, जिससे सात्विक विचार उत्पन्न हो । भजन में मन लगे, विकार न हो और भजन गेय जीवन बन जाए । इस रूप में ६ प्रकार से भोजन करनेवाले भोजन करते हैं । परन्तु भोजन करनेवालों का भाव भिन्न–भिन्न है । इसलिए उनका फल भिन्न–भिन्न होता है । (कोई खाने के लिए जीता है तो कोई जीने के लिए खाता है ।) इस प्रकार एक व्यक्ति कपड़ा इसलिए पहनता है कि मेरे कपड़ो को देखकर लोग मेरी तरफ आकर्षित हो । लोगों को दिखाने के लिए सजता है । दूसरा, उसे स्वभाविक सजना प्रिय होता है । वह दिखाता नहीं है । एक आदमी इसलिए कपड़ा पहनता है कि समाज में लज्जा की रक्षा करनी चाहिए । उपयोगी वस्त्र पहनने चाहिए और शरीर की रक्षा करनी चाहिए ।
अब रही वाणी की बातः वाणी से जवान से पाँच पाप होते है–
१. व्यंग्यात्मक वाणीः जो सुननेवालों को जाकर चुभ जाए, वह हर समय किसी को व्यग्य ही करने की खोज में रहते हैं ।
२. असत्य बोलनाः हर हमेशा असत्य ही बोलने में रहता है । इससे उसका लाभ हो या न हो ।
३ं अप्रिय बोलनाः वे जहां पर बोलेंगे, तो उसकी बात कहीं पर लोग पसन्द नहीं करते ।
४. अहितकर बोलनाः दूसरे को हर हमेशा अहित की खोज में रहते, दूसरे को कैसे नुकसान हो ।
५. व्यर्थ बोलनाः कितने मनुष्यों की व्यर्थ बोलने की आदत बनी रहती है । अगला सुने न सुने, वे बोलते रहते है, जिस बात का कोई अर्थ न हो, बात कहीं और होती है वो बोलते हैं कहीं । और इसलिए व्यर्थ बात नहीं बोलनी चाहिए ।
पाण्डवों का राजसूय चल रहा था । उस जमाने में मयदानव थे, जो एक बड़े वैज्ञानिक थे । उन्होंने इस प्रकार का मण्डप बनाया कि जहां जल था, वहां जमीन दीखती और जहां जमीन थी, वहां जल लहराता हुआ दीखता । यह बात सब को ज्ञात नहीं थी । वहां दुर्योधन आये तो देखा कि जल लहरा रहा है, परन्तु वहां थी जमीन, उन्होंने अपने कपड़े ऊपर उठा लिए कि कहीं भीग न जाए । कुछ लोग मुस्कुरा दिए । कुछ और आगे बढ़े तो वहां जल परन्तु समतल जमीन प्रतीत हो रहा था । वहां वे सीधे आगे बढ़े तो उनके सारे कपडेÞ भीग गए । यह देखकर भीमसेन और द्रौपदी दोनों हँस पड़े । भीमसेन ने कह दिया कि आखिर है तो अन्धे का ही पुत्र न ! उनकी यह बात दुर्योधन को तीर की तरह चुभ गई । धर्मराज बोले– क्या कहते हो ? परन्तु जबान से तो बात निकल गई । आज कल लोग अपनी बात को वापस लेते है । गाली दे दी और कहते हैं कि हम अपनी बात ‘वीथ–ड्र’ करते हैं– वापस लेते हैं । वाणी वापस लेने की चीजे नहीं है । उनकी वह बात दुर्योधन को चुभ गई । उसने ठान लिया कि या तो पाण्डव रहेंगे या हम रहेंगे । वैरबुद्ध मूल हो गया । इसलिए ऐसी वाणी न बोले जो दूसरे को चुभ जाए ।
जो भी बोले सत्य बोले । वैसे शब्द कह देना इसका नाम सत्य नहीं है । सत्य भाव से होता है । जैसे कोई मित्र हमारे यहां आए और कोई आकर बोले कि आपके मित्र आये है । उनसे मिलना है । परन्तु भूल से अथवा अन्य किसी परिस्थिति वश मुलाकात नहीं हो पाई और रास्ते में जाते हुए भेंट हो जाए । तब यदि कहे कि मुझे मालूम था आप आए हंै, परन्तु मिल नहीं पाए, झेप होती है और यह कह दे कि आप कब आए तो झूठ होता है । इसलिए छल की भाषा बनाते हैं– ‘आप आज आए ।’ तीन शब्द बोले, परन्तु उच्चारण इस प्रकार किया कि प्रश्नवाचक हो गया । हमे मालूम था कि यह आज आए है और कह भी दिया कि ‘आज आज आए ।’ शाब्दिक रूप से झूठ तो नहीं हुआ, परन्तु हमने उनको समझाया क्या ? हमने अपने बोलने के ढंग से यह बताया कि हमें मालूम नहीं कि आप आज आए है । इसलिए यह झूठ हो गया । परन्तु हम इन शब्दों को न बोल सके और उन्हें इशारे से समझा दे कि आप आज आए, हमे मालूम था तो यह सत्य हो गया । भले ही शब्द न बोलें ।
वायस पालिए अति अनुरागा ।
कबहु निगामि कबहू भए कागा ।


