प्रेम और प्रकृति के कवि बसन्त चौधरी : डॉ. श्वेता दीप्ति
‘यकीं है ये, मेरा दावा नहीं, कि दुनिया में कोई तुमसा नहीं’
तुम आज भी वही हो
मुस्कुराहटें भी वही हैं ।
तुम्हारे वो हाथ चाहे जिसने भी थामे हों
मगर स्पर्श की गरमी मैं ही पाता हूँ ।
हिमालिनी, अंक डिसेम्वर 2018 | आँसुओं की सियाही से भावनाओं को साकार करने वाले और चाहतो के साए में जीने वाले कवि बसंत । एक शख्शीयत, कई रुप चर्चा किसकी करुँ, एक समाजसेवी की, एक उदार और भावुक हृदय की, एक सफल उद्योगपति की या अपने मन के सागर में डूबते उतराते और भावनाओं को शब्दों में गुम्फित कर हमारे सामने आँसुओं की सियाही से, वसंत या चाहतों के साए में प्रस्तुत करने वाले कवि बसन्त चौधरी की । सच तो यह है कि आपका हर पहलु एक पहचान के साथ यह जरुर बताता है कि आप एक असाधारण व्यक्तित्व के मालिक हैं बावजूद इसके दिल में एक मासूम दिल धड़कता है जो हर आम इंसान की तरह हँसना भाी जानता है और रोना भी, तड़पना भी जानता है और फिर खुद को समझाना भी, मनाना भी जानता है और रुठना भी । एक प्रेमिल दिल जिसमें अपनों के लिए ही नहीं बेगानों के लिए भी और अपनी जन्मभूमि के लिए अगाध स्नेह और सम्मान है ।
कुछ वर्ष पूर्व आपकी हिन्दी की पहली कविता संग्रह आई थी आँसुओं की सियाही से । इसके पूर्व आपकी लेखनी अनवरत नेपाली भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त करती आई थी । आँसुओं की सियाही से के लिए मुम्बई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष करुणा शंकर उपाध्याय ने कहा है कि ये प्रेमिल स्वभाव और सौन्दर्यबोध की कविताएँ हैं जो सच भी है क्योंकि कवि खुद कहता है कि–
जब भी कभी उसे हमारी याद आएगी÷ बीते दिनों की दास्ताँ दिल को तड़पाएगी÷ निकाल फेकेगी पहले तो किताब से तस्वीर मेरी÷ उठकर फिर उसे चूमेगी ÷और दामन भीगने तक आँसू बहाएगी । कभी रोएगी÷ कभी हँसेगी÷ और कभी आँसुओं की सियाही से लिखी÷ मेरी गजल गुनगुनाएगी । ऐसा नहीं लगता कि ये सब कहीं ना कहीं हमारे ही जजबात हैं ? बस यही महसूस होना कवि की लेखनी की सार्थकता है ।
बात करुँ अगर वसंत की तो इस संग्रह की भी हर पंक्तियाँ पूरी तासीर के साथ पाठक के दिलों में उतरती है जब कवि कहते हैं कि–
शून्य कुछ भी नहीं होता
लेकिन वही सत्य है–शाश्वत सत्य है ।
मुझे बोध होता है यही है केवल यही
मेरा अंतिम रूप ।
तो हम इस सच से वाकिफ होते हैं कि शून्य कुछ भी नहीं होता । पर शून्य के अस्तित्व पर ही ब्रह्माण्ड टिका हुआ है । सृष्टि का सच और जीवन की परिभाषा ही शून्य है । आदि और अन्त शून्य है, पर इसी शून्य को जब विस्तार मिलता है, तो जीवन के कई रूपों को इसमें आकार मिल जाता है और वही सार्थक जीवन शाश्वत सत्य बन जाता है । कवि की रचना और उनकी रचनात्मकता ही उनके व्यक्तित्व की सार्थकता है और वही शाश्वत सत्य भी, जो चिरायु है और अशेष भी ।
वसंत की कविताओं में बैचेनी है, विकलता है स्वयं के अस्तित्व को लेकर प्रश्न है क्योंकि जब कवि यह कहता है कि– निःशब्द
ऐसा सशक्त शब्द है जो किसी दूसरे शब्द में कभी नहीं ढलता
जीवन भी मुझे ऐसा ही लगता है
न रंग, न रूप, कोई ताना बाना
कभी किसी अर्थ में परिभाषित नहीं होने वाला
अपरिभाषेय ।
तो जाहिर तौर पर उनकी बैचेनी दिखती है परन्तु तत्क्षण ही एक आशा का संचार भी होता है जब प्रेम का आभास उन्हें अपनी ओर खींचता है और वो उसमें ही जीवन की परिभाषा तलाश कर लेते हैं, यथा–
प्रिय !
तुम जहाँ कहीं भी होगी
खुश ही होगी
क्योंकि
तुम्हें मालूम नहीं है
कि धूप क्या है ?
धूप से जलने की बात
हरियाली को मालूम नहीं होती
तभी तो तुम में खोते ही
मैं अपने आपको पाता हूँ ।
और यह पा लेना ही कवि को अपने आप में तुष्ट करता है । कई बार आधे अधूरे प्यार की खलिश जीने नहीं देता तो कई बार वह अधूरापन ही जीने की वजह बन जाता है । प्रेम अकसर अप्राप्य ही होता है परन्तु उसकी अनुभूति जीवन का सबसे बड़ा सुख भी होती है । क्योंकि न तो ख्वाहिशें मरती हैं, न ही वह पहले प्रेम की अनकही चाहते हीं–
तुम आज भी वही हो
मुस्कुराहटें भी वही हैं ।
तुम्हारे वो हाथ चाहे जिसने भी थामे हों
मगर स्पर्श की गरमी मैं ही पाता हूँ ।
यही तो पहले प्यार की पहली अनुभूति है जो कभी शेष नहीं होती । जो अक्सर हमारी सोच को महका जाया करती है जिसे सोचना सुखद लगता है, जो अनायास ही अकेलेपन में भी चेहरे पर मुस्कान की लकीर खींच लाती है । और यही प्रेम पूरी शिद्दत के साथ व्यक्त हुई है चाहतों के साए में जहाँ व्यापारी व्यक्तित्व में एक मासूम दिल, जो जीना चाहता है–अपनी ख्वाहिशों के साथ, अपने अहसासों के साथ और अपने जाने–अन्जाने रिश्तों के साथ । जो जीता है अपनों के लिए और अपनों के सपनों के लिए । खुद आपका मानना है कि–
कोई इंसान भी ऐसा नहीं है
जो दिल की राह से गुजरा नहीं ।
आपने खुद माना है कि ‘चाहतों के साए में’ प्रेम के प्रति उनका समर्पण है । आपकी जिन्दगी में प्रेम प्रेरक शक्ति रही है । इस परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट है कि ‘चाहतों के साए में’ सिर्फ प्यार है, प्यार है और बस प्यार है । पूरी की पूरी कायनात इसी प्रेम के इर्द गिर्द घूमती है । प्रकृति के कण–कण में प्यार है, और नारी सृष्टि की सबसे खूबसूरत रचना जो प्रेम की पर्याय है ।
प्रेम जिसकी कोई परिभाषा नहीं है, जो बस एक अहसास है । जो कभी जीने का मकसद देती है तो कभी सब कछ लुटा देने का जज्बा भी ।
चाहतों के साए में एक पूरा का पूरा आकाश समेटे हुए है अपने अन्दर, जिसमें भावनाओं का गुम्फन कभी कविता, कभी गजल, कभी गीत तो कभी नज्म के रूप में अभिव्यक्त होती चली गई है । एक साथ पाठकगण इन सभी विधाओं का रसास्वादन इस कृति पा सकते हैं । इस मायने में यह निःसन्देह एक अद्भुत कृति है । कविता प्रकृति के आँचल में पलती है, टूटा हुआ दिल कविता को जन्म देता है तो कभी अपने इर्द गिर्द की परिस्थितियाँ भावुक मन को बैचेन करती है और तभी शब्द आकार लेते हैं और एक अभिव्यक्त रूप धर कर हमारे समक्ष प्रस्तुत होते हैं ।
चाहतों के साए में स्वयं कवि कहते हैं –
कोई भी तभी कवि बनता है
जब प्रकृति में सौन्दर्य खिलता है
जब केवल फूलों की डालियों पर ही नहीं
पत्तों तक में भी कविता खिलती है ।
और इन सबके बीच अगर यौवन हो तो दिल में कविता का जन्म लेना निश्चय ही तय है । फूलों की खुशबू, बारिश की बूँदें, चाँद की चाँदनी, कोयल की कूक या फिर पपीहे की पुकार, आखिर कविता के आलम्बन यही तो बनते हैं कभी मिलन में तो कभी विरह में ।
प्रेम की दुनिया जिसका कोई रूप नहीं, वह तो निराकार है जहाँ दो आत्माएँ एक होती हैं । जहाँ कोई ‘स्व’ नहीं होता, जहाँ मैं और तुम ‘हम’ में एकाकार हो जाता है–
कुछ नहीं बचता, रिक्त हो जाता हूँ
तुम में ही एकाकार हो जाता हूँ ।
और इसलिए तो कवि कहते हैं कि–
तुम्हें देखने के लिए
ऐसा नहीं कि तुम्हें देखना होगा ।
जिन्दगी जीने के लिए
ऐसा भी नहीं कि साँसें लेनी होंगी ।
प्रेम करने के लिए
यह भी नहीं कि
तुम्हें बाँहों में भरना होगा.
मैं प्रेम में नहीं
कविता में प्रेम लिखता हूँ ।
बहुत ही खूबसूरती के साथ वक्रोक्ति का एक सुन्दर उदाहरण कवि की निम्न पंक्तियों में है–
कीचड़ में कमल है
इसका अर्थ यह नहीं
कि कमल में कीचड़ है,
बल्कि यह है कि
कमल में कीचड़ का सापेक्ष खिला हुआ है ।
दर्शन की दुनिया से निकल कर कभी–कभी कवि की लेखनी निराशा के बादलों से घिरी नजर आती हैं जब वो अपनी कविता ‘कतरा–कतरा’ में कहते हैं कि–
अँधेरा टपक रहा है कतरा कतरा
मन में रात घर कर रही है कतरा कतरा
जाने उजाला कहाँ है ?
मृत्यु बढ रही है कतरा कतरा ।
ऐसी ही निराशा उनकी कविता ‘जिन्दगी का हिसाब–किताब’ में भी उभर कर आती हैं–
बढ़ता जा रहा है एकाकीपन
डूबता जा रहा है सूरज
कोहरे में घुली हवा लेते–लेते
उफ विरक्त हो रहा है समय ।
मुझे अपनी सुविधा के अनुसार
मेरे भीतर के आकाश का विचरण करने दो ।
जीने के नाम पर दौड़ते–दौड़ते थक कर चूर हो चुका हूँ मैं
सोने से पहले कुछ पल ही सही
जीने की अनुभूति करने दो ।
ऐ गोधुलि मुझे सहजता से साँस लेने दो ।
परन्तु जल्द ही कवि इस निराशा के भँवर से निकल कर कहता है कि –
हमारे जिन्दा रहने का आकर्षण है प्रेम
जिन्दगी जीने का मकसद है प्रेम ।
बात करुँ गजलों की तो उनकी गजलों के लिए उनके ही शब्द–
तुम पर ऐ जाने जाना जब से नजर पड़ी है
हर फूल हर कली की धड़कन थमी थमी है ।
जी हाँ इनके गजल की हर पंक्तियों की तासीर कुछ ऐसी है । जहाँ दिल थमता भी है, धड़कता भी है और कई बार सरगोशियाँ भी करता है–
ये नशा है, बेखुदी है या तसव्वुर
जेहन पर छाया हुआ सा इक धुआँ है
आजमा ले दिल है क्या मैं जाँ भी दे दूँ
ये तेरे दिवाने सागर की जबाँ है ।
आपने गजलों की दुनिया में सागर उपनाम रखा है । सागर की सार्थकता देखने को मिलती है क्योंकि दिल की कोई भी भावनाएँ ऐसी नहीं हैं जिसे इस कृति में अभिव्यक्ति न मिली हो । यादें हैं, इंतजार है, चाहत है और इन सबके साथ दिल में एक खलिश भी है–
बेखुदी में क्या कहिए किसको क्या समझ बैठे
इक हसीन पत्थर को हम खुदा समझ बैठे
इनसे क्या गिला करते सब खता मेरी थी
एक बेवफा को बावफा समझ बैठे ।
कवि की कोई भी कृति हो उसमें एक अव्यक्त चाह कवि के साथ साथ चलती है । जाने अन्जाने यह दर्द उसे सालता भी है, तड़पाता भी है और बार बार एक हूक उनसे यह कहलाता है कि–
मैं तुम्हें छू नहीं सकता
जैसे चाँद को हाथ बढ़ाकर छुआ नहीं जा सकता ।
तुम में और चाँद में फिर भी एक अन्तर है
चाँद कभी कभी मेरी खिड़की के पास चला आता है
मगर तुम नहीं आती ।
मेरे सामने विवशता के
उदास तालाब है
इसलिए मैं तालाब की
उदासी को पीता हूँ ।
विराग के भीतर अनुराग को जीता हूँ ।
संयोग और वियोग जीवन की ये दो आधारशिलाएँ ही जीवन को पूर्ण भी करती है और अपूर्ण भी और इसके बीच ही अक्सर जीने का सफर हम तय कर लेते हैं, क्योंकि हम सब जानते हैं कि कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता । फिर भी पागल मन कभी खुद से सवाल करता है, तो कभी उससे जिसे उसने टूट कर चाहा है, इस उम्मीद के साथ कि वह जहाँ भी है क्या मेरी तरह ही मुझे भी याद करती है ? एक तसल्ली की चाह ही यह पूछ बैठता है कि –
क्या कभी
तुम मुझे याद कर के तड़पोगी ?
वियोग के शमशान में आँसू बहाकर
मेरी यादों के जनाजे पर फूल चढ़ाकर
या कर के कोई शिकवा शिकायत ?
कितना अजीब होता है न यह दिल, बैचेनी में भी सुकून खोजता हुआ, तडप में भी करार खोजता हुआ और कभी इन सब में ही जीवन का सार खोजता हुआ । ‘वसंत’ की हर कविता में कवि स्वयं से ही सवाल करता हुआ मिलता है और खुद को ही तसल्ली देता हुआ भी ।
कवि ‘वसंत’ में सिर्फ प्यार नहीं है अपनी मिट्टी, अपने देश से सम्बद्ध चिन्ता भी है, जब वो अपने आस पास अव्यवस्था देखते हैं, दुर्दशा देखते हैं तो उनकी आँखें नम होती हैं और कलम बोल उठती है–
असीम वेदना से
तड़पते हुए देखा है शहर को
पीड़ा में छटपटाते हुए देखा है
कई बार जोर जोर से चीखते चिल्लाते हुए
रोते हुए भी देखा है इस शहर को . ।
कवि कई बार कृतज्ञ है अपने पिता के प्रति जो उनके जीवन का आदर्श हैं । कवि जब अपनी अर्कमण्यता को महसूस करता है तो उस खीझ में पिता मार्गदर्शक बन कर सामने आते हैं ।
जीवन के कई रूपों को उकेरती है वसंत की रचनाएँ जो व्यक्तिगत होते हुए भी मन को भाती है और लुभाती है । कवि की इन पंक्तियों के साथ इतना ही कि –
जीवन की धूप छाँव से नजरें मिलाए जा
हर गम को, हर खुशी को गले से लगाए जा
क्या होगा कल ये फिक्र न कर, मुस्कुराए जा ।
नेपाल की खूबसूरत वादियों की तरह ही हैं कवि वसन्त की कविताएँ जिनमें मनोरमता है, मोहकता है, ताजगी है और सबसे बड़ी खूबी यह कि ये हर दिल की अव्यक्त चाहतों एवं ख्वाहिशों की दास्तान है तभी तो डा. अमरनाथ ने कहा है कि “नेपाल की हवाओं की खुशबू और ताजगी का एहसास कराती है बसन्त चौधरी की कविताएँ, जिनमें प्रेम है और प्रकृति का सौन्दर्य बोध भी । साथ ही संघर्ष है, द्वन्द्ध है, और इनसे उबरने की छटपटाहट भी ।”
बस इतना ही कि–तुम रहो, मैं रहूँ ÷बस यह रात रहने दो÷ फिर करेंगे बात, ÷आज सब बात रहने दो ।






