जिजीविषा : आलोक कुमार
ये सुइयों की चुभन और
कीमों की जलन ने
भर डाला था मुझमें
विषाद और हताशा
दिखते थे मुझे, बस
सूखे पेड़
रेत पर तड़पती मछलियाँ
झिंझोड़ डाला उसके चँद शब्दों ने
धार के साथ तो तिनका भी किनारा पा लेता है
विपरीत परिस्थिति में साबित करो अपना पुरुषार्थ
क्षितिज पर दिखने लगी है
एक नया प्रकाश ।
जगने लगी है चाहत
कि बंद कर लूँ
मुट्ठियों में आकाश
धार के विपरीत चलकर
किनारा पा लेने की आस ।


