Tue. Oct 15th, 2019

अस्पष्ट चीन इकोनामिक कारिडोर नेपाल के लिए एक सबक : अनिल तिवारी

हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | चीन की संदिग्ध CPEC परियोजना पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर केंद्रित है । बंदरगाह ओमान की खाड़ी के मुंह पर रणनीतिक रूप से स्थित है, जो कि एक ऐसा रास्ता है, जिसके माध्यम से मध्य–पूर्वी देशो के तेल से भरे जहाज हिंद महासागर से होते हुए विभिन्न देशो तक पहुंचाई जाती हैं ।
चीनी ग्वादर बंदरगाह पर मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free trade zone), तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) डिपो और उत्पादन उद्योगों के निर्माण में भी निवेश कर रहा है । राजनीतिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि चीन द्वारा सामरिक ग्वादर बंदरगाह में किए गए बड़े निवेश का असली उद्देश्य वहां अपने नौसेना को स्थापित करना है निकटतम भविष्य में । पाकिस्तान में चीन का यह नौसेना बेस हिंद महासागर से जुड़े हुए सभी देशों के लिए गंभीर चिंता का विषय है सुरक्षा के लिहाज से ।
पोर्ट का संचालन सरकारी स्वामित्व वाली चीन ओवरसीज पोर्टस होल्डिंग कंपनी लिमिटेड द्वारा किया जाता है, जिसके पास बंदरगाह पर ४० साल का लीज है और यही नही वहां से जो भी लाभ होगा, उसका भी ज्यादा चीन को जाएगा । हाल ही में स्टेट बैंक आफ पाकिस्तान के गवर्नर ने एक खुला बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘मुझे यह बिल्कुल नहीं पता कि ४६ अरब डालर, जो कि चीन द्वारा निवेश किया गया है, उसमे से कितना कर्ज है, कितना इक्विटी (equity) है और कितना सहायता (kind) है ‘यह इस बात को स्पष्ट दर्शाता है कि पाकिस्तान सरकार को यह पता ही नहीं है कि चीन के द्वारा इतने बड़े निवेश में से वापस कितना, कबतक और कैसे देना है ।
हालांकि बंदरगाह का मुनाफा कम है, परन्तु बंदरगाह का रणनीतिक स्थान चीन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है । यह बंदरगाह CPEC के द्वारा चीन के पश्चिमी प्रांतों को हिन्द सागर से जोड़ता है । चीन इस पूरे निवेश को अपने दो कांटेदार मुद्दों के जवाब के रूप में देखता हैः

१. ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में मलक्का स्ट्रेट पर निर्भरता को समाप्त करना,

२. झिंजियांग–उइघुर क्षेत्र– (Xinjiang–Uighur region) में आर्थिक विकास लाने और उससे वहा उत्पन हुए अलगाववादी सोच को कम करना हैं ।

बीआरआई (BRI) की घोषणा पाकिस्तान की ओर चीन की व्यवहारिक बदलाव के साथ हुई । चीनी ने ग्वादर के रणनीतिक बंदरगाह पर निवेश शरूरू करने से पहले ही, पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा मामलों में शामिल होना शरू कर दिया था और बाद में चीन ने अपने रणनीतिक और मौद्रिक दोनों ही शक्तियों को उपयोग करके अपने निवेश को सुनिश्चित किया ।
वर्तमान मेंः चीन सिर्फ पाकिस्तान में सुरक्षा चिंताओं को ही नहीं उठा रहा है बल्कि उसके आंतरिक सुरक्षा संबंधी मामलों में भी अपनी मनमानी चला रहा है अपने शर्तो पे । विश्लेषकों ने यह चेतावनी दी है कि निकट भविष्य में उन छोटे देशों पर समान भाग्य हो सकता है, जिन्होंने बीआरआई का चयन किया है और चीन को अपने देश के अंदरूनी मामलों में घुसने का मौका दिया है । सावधानीपूर्वक इन सभी चिंताओं पर अच्छे से विचार करने में ही समझदारी होगी । हमारे जैसे नए–नए लोकतांत्रिक देश को जो की अभी प्रगति के पथ पर बढ़ना चालू किया है, उसके लिए इस तरह के समझौता बहुत ही बड़ा जोखिम साबित हो सकता हैं । हमारी संप्रभुता की रक्षा करने की जिम्मेदारी जनमत से चुने हुए सरकार पर है ।
बेल्ट और रोड के बारे में संदेह मलेशिया से परे फैल रहा है । इसी संदर्भ में पास के ही स्थित म्यांमार ने अपने देश में ऐसे बंदरगाह जो कि चीन द्वारा दिए गए पैसे से बनाएं जा रहे थे, को नाटकीय रूप से घटा दिया है । थाईलैंड ने भी पूरे देश में रेल परियोजनाओं के लिए चीनी वित्त सहायता को खारिज कर दिया है । यहां तक कि वफादार सहयोगी पाकिस्तान, जो ४.६२ बिलियन चीन–पाकिस्तान आर्थिक कारिडोर योजना बनाने के लिए चीनी उपकरणों के आयात पर खर्च किए गए सभी पैसे की वजह से आज चालू खाता (current account deficit) संकट का सामना कर रहा है, ने इस पूरे योजना के दायरे और चरित्र पर पुनः विचार करने के फैसला लिया है ।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पांच साल पहले भूमि आधारित ‘सिल्क रोड इकोनामिक बेल्ट’ और समुद्र–आधारित ‘२१ वीं शताब्दी समुद्री सिल्क रोड‘ की योजना की घोषणा की थी, तब से लेकर अब तक इस पूरे कार्यक्रम को चीन के राज्य संचालित प्रेस ने सबके सामने काफी बढ़ा चढ़ा के दिखाया है । परन्तु असल में दुनिया भर में ऐसे चीनी प्रोजेक्ट जिसका मुख्य केंद्र चीन की शक्ति, प्रभाव और व्यापार को बढ़ाना है, को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा है । शी जिनपिंग ने विदेशों में सिर्फ आधारभूत संरचना को बनाने के लिए नहीं काम किया, असल में वह दुनिया भर में चीनी धन और विशेषज्ञता को एक जाल कि तरह फैलाना चाहते थे । इसी नीति के साथ बेल्ट और रोड योजना तथा और भी कई परियोजनाओं को योजना को लान्च किया गया था, जो कि एक बड़े षडयंत्र का ही भाग था ।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में बेल्ट और रोड योजना को स्थापित करने में शी ने अपना पूरा जोड़ लगा दिया था, जिसका नतीजा यह हुआ कि इस योजना ने वैचारिक और राजनीतिक रूप से लोगो को जोड़ दिया । इस योजना को चीन को महानता के शिखर पे पहुंचने तथा बाद में उसी पे शी जिनपिंग और उनकी पार्टी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के उज्वल भविष्य का मुख्य कारण माना जा रहा है । परन्तु इस पूरे योजना ने दो मौलिक समस्याओं को उजागर कर दिया है ।
जिसमें की पहला आर्थिक है । अभी तक, किसी भी परियोजना को बेल्ट और रोड से जोड़ने पर – चाहे वो लाहौर में मेट्रो हो या गुइजÞहौ में क्लाउड कंप्यूटिंग सेंटर, चीन बड़े आसानी से ऋण दे देता था । लेकिन यह सभी परियोजनाएं बहुत ही अलग–अलग तरह के हैं । जो कि जरूरी नहीं हमेशा चीन के सोचे हुए नक्शे कदम पे फिट हो जाएं । फलस्वरूप, यही ऋण जो कि चीनी राज्य बैंकों से आसानी से मिल रहे है, जिससे काफी उच्च प्रोफÞाइल तथा राज्य के नेतृत्व वाले लोग भी जुड़ा हुआ है, वे लोग भी धोखाधड़ी और लालच के दलदल में फस के रह जाते है । जिसका असली असर पूरे देश को चुकाना पड़ता है । फिच साल्यूशंस, जो कि एक जानी मानी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान है, ने अपने जांच में पाया कि लगभग १००० बीआरआई परियोजनाओं में से, वर्तमान में १०० से भी कम पर काम हो रहा हैं । यह ऊपर बताई गई परेशानी का स्पष्ट रूप से उजागर करता है । ऐसे योजनाओ का सबसे ज्यादा नुकसान ऐसे राष्ट्रों को है जो कि अपनी सक्षमता या वित्तीय अनुशासन के लिए प्रसिद्ध नहीं हैं । प्रसिद्ध क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडी के मुताबिक, इन योजनाओं में शामिल देशों की औसत क्रेडिट रेटिंग बी २ या उससे भी कम है । आरडब्ल्यूआर सलाहकार के अनुसार, लगभग १५ प्रतिशत बीआरआई परियोजनाएं पहले से ही वित्तीय परेशानी में हैं और निकटतम भविष्य में इस संख्या का बढ़ना निश्चित है ।
कुछ आलोचकों को यह भी कहना है कि चीन एक रणनीति के तहत ऐसे सरकारों पर पैसा फेंकने का का काम सबकुछ जानबूझकर कर रही है ताकि निकट भविष्य में वो संभाल नहीं पाए, और अन्ततः चीन का ऐसे देशों से राजनयिक समर्थन या यहां तक कि सामरिक सुविधाओं को लेने में किसी भी तरीके की परेशानी ना हो । इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण हंबंतोटा में श्रीलंकाई बंदरगाह है, जिसको की वहा की सरकार ने चीन को सौंप दिया क्योंकि वह कर्ज चुकाने में असमर्थ था । कम से कम आठ ऐसे देश जो कि लाओस से जिबूती और वहां से मान्टेनेग्रो तक फैला हुआ है, जो की चीन के फेके हुए ऋण जाल में फंसते जा रहे है ।
उधारकर्ता सरकारों में से कइयों की विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक के साथ नहीं बनती हैं, क्यूंकि वह गैर–आर्थिक या पर्यावरणीय रूप से हानिकारक परियोजनाओं को मंजूरी देने में अनिच्छुक हैं । जिस कारण ऐसी सरकारें बिना कुछ सोचे समझे, किसी भी सौदों पर हस्ताक्षर कर रही हैं, इस बात की परवाह किए बिना की वो इस ऋण को कैसे चुकाएगा । कुछ देशों की विश्व में व्यवसाय रैंकिंग ठीक नहीं है, जिस कारण वहां पर बुनियादी ढांचे में सुधार होने पर भी निवेश कम हो जाता है । आर्थिक सुधार की जरूरत है, लेकिन ऐसा नहीं होता है । परियोजना के लिए स्थान घरेलू राजनीतिक कारणों से चुना जाता है, न कि आर्थिक योग्यता पर । बेल्ट–एंड–रोड योजनाएं स्थानीय भ्रष्टाचार और आर्थिक कारणों से और भी कमजोर हो जाती हैं ।
बेल्ट–एंड–रोड परियोजनाओं के पैमाने और संख्या के निरंतर विस्तार से, चीन ने पर्यवेक्षकों को अपनी महत्वाकांक्षाओं के साथ परेशान कर दिया है और आशंका में है तथा कुछ तो डर रहे हैं । देश के बाद देश में, चीनी धन की इस बाढ़ ने आर्थिक विशेषज्ञों और सार्वजनिक वित्त मंडलियों को सावधान करना शरूरू कर दिया है ।
महाथिर ने आरोप लगाया कि पिछली मलेशियाई सरकार ने देश को चीन के हाथ उसी तरह बेच दिया, जिस तरह श्रीलंका के वर्तमान राष्ट्रपति ने किया था । पाकिस्तानी लोगो ने भी चीनी सहायता और निवेश को बड़े पैमाने पर गले लगा लिया था, परन्तु अब ऐसी अफवाह है कि चीन के हजारों उपनिवेशवादियों को पाकिस्तान में काम करने और वहां से लाभ अर्जित करने के लिए भेज दिया हैं । इसका मतलब यह हुआ कि चीन का दिया हुआ ऋण तो उसको वापस मिलेगा ही और उससे मिला फायदा भी चीनी को ही मिलेगा, पाकिस्तानी लोगो को नहीं । कुछ कम्बोडियन और लाओटियन सीमावर्ती कस्बों में भी ऐसे भय और उनकी नाराजगी को स्पष्ट देखा जा सकता हैं ।
एशियाई इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट बैंक, अधिक अंतरराष्ट्रीय भागीदारी के साथ, हमेशा अन्य बहुपक्षीय बैंकों के समान उच्च मानकों के लिए ही उधार देता है । ऐसा पाया गया कि बेल्ट–एंड–रोड देशों ने २०१८ के पहले आठ महीनों में पहले के मुताबिक २८ प्रतिशत कम अनुबंधों÷कान्ट्रैक्ट पे हस्ताक्षर किया है ।
अब समय आ गया है कि हमारा देश घोड़ों के कमानो को कस कर पकड़ ले और जल्दबाजी से चल रहे बीआरआई परियोजनाओं के संबंध में हमारी उभरती हुई अर्थव्यवस्था और हमारे देश के नागरिकों के हित को ध्यान में रखते हुए कोई भी निर्णय ले, हमारे उज्वल भविष्य के लिए ।

श्रीलंका के हंबंतोटा अनुभव नेपाल के लिए आने वाले जोखिमों÷चिन्ता का संकेत है,
०३ अगस्त, २०१८ को श्रीलंका के केंद्रीय बैंक ने घोषणा की कि उसने बेल्ट और रोड पहल के तहत प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए ४.१ बिलियन चीनी ऋण प्राप्त किया है । यह ऋण चीन विकास बैंक से ५.२५५ ब्याज दर पर सुरक्षित किया गया था । श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के गवर्नर श्री इंद्रजीत कुमरस्वामी ने कहा कि चीनी उन्हें अपने स्थान के अनुसार –हिन्द महसागर में) बीआरआई के संबंध में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता हैं ।
अत्यधिक ब्याज दरों पर श्रीलंका के बढ़ते ऋण ‘रणनीतिक समर्थन राज्यों’ की स्थापना के विचार को दर्शाता हैं । चीन के विश्लेषकों और कम्युनिस्ट पार्टी के उच्च स्तरीय प्रमुख व्यक्ति के द्वारा प्रस्तावित इस विचार को अद्वितीय समुद्री महाशक्ति बनने की चीनी महत्वाकांक्षा हासिल करने में बहुत महत्व रखता है । चूंकि संयुक्त राज्य अमेरिका ट्रम्प सरकार बहुपक्षीय मंचों में रूचि नहीं रखता है, इसलिए विश्व प्रगतिशील रूप से मल्टी पावर सेंटर स्वीकार करने जा रहा है, जिसमें चीन अभी तक एक मजबूत दावेदार बनके उभरा है ।
हंबंतोटा बंदरगाह के द्वारा चीन हिंद महासागर में अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है, जहां अभी तक भारत को पूर्ण नियंत्रण है । हंबंतोटा बंदरगाह, हिंद महासागर में एक ऐसे जगह पर स्थित है, जो कि दुनिया की सबसे व्यस्त शिपिंग लेनो में से एक हैं । ऐसे महत्वपूर्ण जगह पर चीनी पीएलए नौसेना का नियंत्रण होना का अर्थ सिर्फ और सिर्फ यही हो सकता है कि निकटतम भविष्य में श्रीलंका और उसके समुंद्री इलाकÞे पर चीन की पकड़ इतनी मजबूत हो जाएगी कि श्रीलंका चाह कर भी चीन का कुछ नहीं कह पाएगी, कुछ कर पाना तो दूर की बात है । उपर्युक्त किए गए बातो को पीएलए नेवी युद्धपोत के कमांडिंग अधिकारी डेंग जियानवु ने अपने एक बयान द्वारा अब प्रमाणित कर दिया है, जिसमें वह कहते है कि, ‘ जहां कहीं भी चीनी व्यवसाय है या होगा, वहां पर उन्हें चीनी युद्धपोत भेजें जाएंगे, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए । ’
बंदरगाह पर चीन मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग कंपनी लिमिटेड का अधिकार है, जो कि चीन सरकार की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी कंपनी है । इस कंपनी का बंदरगाह पर ठण्५ हिस्सेदारीरहक है और यही नही कंपनी के पास बंदरगाह का ९९ साल का पट्टा भी है, जो कि उसे मुफ्त व्यापार करने की अनुमति देता है । इसी संदर्भ में विवाद से बचने के लिए, बंदरगाह की सुरक्षा श्रीलंकाई कंपनी को दी गई है । लेकिन उस श्रीलंकाई सुरक्षा कंपनी के रिकार्ड बताते हैं कि वास्तव में चीन ही उस कंपनी का बहुमत शेयरधारक है ।
एक राष्ट्र आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से प्रगति करने का प्रयास कर सकता है और उसे ऐसा करने का हर अधिकार है, लेकिन इसके लिए किसी छोटे राष्ट्र की संप्रभुता को ताक पर रखना उचित नहीं हो सकता है । चीन जो कि आज एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं, उसकी यह नैतिक जिम्मेदारी हैं कि वो छोटे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को अपने स्व–हितों के प्राप्ति के लिए खतरे में ना डाले । इन सभी बातो से सिर्फ यही निष्कर्ष निकलता है कि बीआरआई अपने विकास में छोटे और कमजोर राष्ट्रों का समर्थन करने के दावों के बजाय चीन के वास्तविक नीति को दर्शाता है ।
मलेशिया द्वारा नव कालोनी होने से इंकार
मलय प्रायद्वीप, जो समुद्री चोकपाइंट पर है जो प्रशांत और भारतीय महासागरों को जोड़ता है, १८वीं और १९वीं शताब्दी के पूर्व यूरोपीय साम्राज्यवादी साम्राज्यों (पुर्तगाली, ब्रिटिश, फ्रेंच और डच)के लिए बहुत महत्वपूर्ण था । । १८ वीं शताब्दी के दौरान मलाका स्ट्रेट और मलय प्रायद्वीप पर नियंत्रण रखने का मतलब, वैश्विक व्यापार के दो तिहाई से अधिक पर नियंत्रण होना था । इस जगह पर बहुत समय तक साम्राज्यवादी शक्तियां का कब्जा रहा । बाद में ब्रिटिश इस महत्वपूर्ण चोकपाइंट पर विजय प्राप्त करने में सफल रहेस और बाकी इतिहास है । अब इतने वर्षो बाद चीन द्वारा वहीं उपनिवेशवाद का एक नया संस्करणररूप बेल्ट और रोड पहल (बीआरआई) के माध्यम से शरूरू किया जा रहा है । मलेशिया में चीनी परियोजनाओं का गुप्त एजेंडा ः
मेलाका गेटवे ः
महत्वपूर्ण रणनीतिक मलक्का स्ट्रेट में मेलाका गेटवे परियोजना में तीन कृत्रिम द्वीप शामिल हैं और इन द्वीपों पर पावर चीन इंटरनेशनल द्वारा भारी निवेश किया जा रहा है, जो कि लगभग १० बिलियन अमरीकी डालर है । इन पैसों से एक औद्योगिक पार्क, क्रूज टर्मिनल, आफशोर वित्तीय केंद्र और एक भव्य सात सितारा होटल बनाने की परियोजना है । लेकिन इस परियोजना की आड़ में चीन एक नया गहरे पानी के बंदरगाह का निर्माण कर रहा है, जो एक विमान वाहक (एयरक्राफ्ट कैरियर) को समायोजित करने में सक्षम हो सकता है ।
यह संदेह और भी गहरा हो गया, जब एक छोटी सी स्थानीय डेवलपर केएजे कंपनी को इस परियोजना में पार्टनर बना दिया गया । यह सब पूर्व प्रधान मंत्री नजीब रजाक के कार्यकाल के दौरान हुआ, जिनकी पार्टी के उच्च नेताओं का केएजे कंपनी के प्रमुख के साथ घनिष्ठ संबंध होने की बात सभी कोई जानता है । इस बीच मलक्का राज्य के लोग ऐसी विशाल परियोजना की व्यवहार्यता और आवश्यकता पर चिंतित हैं और सरकार से सवाल करना शरूरू कर दिए है । लोगो की बढ़ती हुई इन चिंताओं को देखते हुए राज्य के मुख्यमंत्री ने परियोजना की व्यवहार्यता की जांच शरूरू करने का आश्वासन दिया है ।
पूर्वी तट रेल लिंकः
चीन द्वारा विवादास्पद दक्षिण चीन सागर के साथ मलक्का स्ट्रेट को जोड़ने के लिए एक रेल नेटवर्क बनाने का विचार किया जा रहा है, यह रेल नेटवर्क मलेशिया के पूर्वी तट पर कुआंतान को भी जोड़ देगा, जहां चीन औद्योगिक पार्क पर भारी निवेश कर रहा है । हालांकि, हाल ही में मलेशिया के नव निर्वा्चित प्रधान मंत्री ने चीन को झटका देते हुए, इस रेल नेटवर्क के निर्माण के लिए चीन संचार निर्माण कंपनी पर रोक लगा दिया है ।
इसका कारण यह बताया जा रहा हैं कि मलेशियाई लोगो में इस परियोजना को चीनी कंपनी को सौंपने के इरादे पर सवाल उठाया जा रहा है, क्योंकि मलेशियाई कंपनी चीन द्वारा उद्धृत राशि (जो कि २७ बिलियन अमरीकी डालर है) के आधे से भी कम दाम पर विकसित कर सकती है । मलेशिया के प्रधान मंत्री ने कहा, ‘यह बहुत अधिक पैसा उधार लेने के बारे में है, जिसे हम बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं और हम चुका नहीं सकते क्योंकि हमें मलेशिया में इन परियोजनाओं की आवश्यकता ही नहीं है’ । मलेशिया प्रधान मंत्री ने निर्भीक होते हुए अपने बीजिंग की राजकीय यात्रा के दौरान दो और प्रमुख चीनी वित्त पोषित परियोजनाओं पर रोक लगाने का औपचारिक घोषणा कर दी ।
वन से भरा हुआ शहरः
सिंगापुर के पास मलेशिया के दक्षिणी सिरे पर चीन की एक विशाल रियल एस्टेट परियोजनास जिसके अन्दर चार कृत्रिम द्वीपों पर महानगर भव्य अपार्टमेंट बनाया जा रहा हैं, जिसमें लगभग ७००००० लोगों को समायोजित किया जा सकेगा । मलेशियाई प्रधान मंत्री ने इस परियोजना का जिक्र करते हुए कहा, ‘यह चीनी निवेश नहीं है बल्कि चीनी नागरिकों को बसने की प्रक्रिया है । ’ उन्होंने चीनी नागरिकों को अपार्टमेंट बेचने की योजना बना रहे अटकलों को देखते हुए यह तक घोषित कर दिया कि किसी भी विदेशी को इस परियोजना के तहत विकसित हो रहे शहर में रहने के लिए वीजÞा नहीं दिया जाएगा ।
मई, २०१८ में हुए हालिया चुनावों में पूर्व प्रधान मंत्री नजीब रजाक के पतन का मुख्य कारण भ्रष्टाचार और घोटालों है, जिनमें से कुछ चीनी निवेश सौदों से जुड़े हुए थे । इसी कारण अभी भी उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है जिसमें उनपर कुछ उच्च प्रोफÞाइल परियोजना को धोके से चीन को दे देने का आरोप है, उन्होंने इसके बदले काफी सारा पैसा लिया, जिसे उन्होंने अपने चुनाव अभियान में खर्च किया । मलेशियाई लोगों ने उन्हें चुनाव में अयोग्य मानते हुए, महाथिर मोहम्मद को नया प्रधान मंत्री चुन लिया । अब मलेशिया को २५० बिलियन अमरीकी डालर के कर्ज से बाहर निकालने की भारी जिम्मेदारी महाथिर मोहम्मद पर है, जिनमें से अधिकांश चीनी निवेश है । मलेशियाई संप्रभुता के बारे में चिंता तब ही उठ गई थी जब चीनी हमले की पनडुब्बी ने नजीब रजाक के कार्यकाल में मलेशिया बंदरगाह तक पहुंच कर, वहा कुछ समय तक रहा ।
साम्राज्यवाद का नया संस्करणः
दुर्भाग्यवश, वर्तमान में यह डर बढ़ रहा हैं कि चीन अपने मौजूदगी को मजबूत बनाने के लिए अपनी नकद और कड़ी शक्ति का उपयोग कर रहा है, और यह स्पष्ट सन्देश दे रहा है कि वह दुनिया के कुछ रणनीतिक स्थानों में नव–उपनिवेशों बनाने की हिम्मत रखता है । इन सभी रणनीतिक स्थानों में से मलकाका स्ट्रेट प्रमुख माना जाता है । इस संदर्भ में, मलेशिया के डिप्टी डिफेंस मिनिस्ट्री ल्यू चिन टोंग ने कहा कि ‘मलेशिया और मलक्का स्ट्रेट चीन के विस्तारित योजना स्ट्रिंग आफ पर्ल का ही एक अंग है, जिसके जरिए चीन शंघाई को जिबूती से जोड़ना चाहता है’ । मलेशिया के प्रधान मंत्री महाथिर मोहम्मद ने कहा, ‘हम ऐसी स्थिति नहीं चाहते हैं जहां हमारे देश में उपनिवेशवाद का एक नया संस्करण हो । ’
नेपाल भी चीन से उच्च ब्याज ऋण प्राप्त करने वालो के क्रम में है । क्या नेपाल, एक छोटे से देश मलेशिया में चीन के बीआरआई परियोजना के तहत फैलाए हुए गंभीर समस्याओं÷चिंताओं से कुछ सबक लेगा ?
कंबोडिया में चीन के द्वारा इतनी बड़ी मात्रा में किया जा रहा निवेश, क्यों उसकी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है ?
१९वीं शताब्दी के दौरान, ब्रिटिश और फ्रेंच (जो कि उस समय की काफी शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति थी) ने मिस्र को काफी बड़ी मात्रा में उधार देना शरूरू किया । प्रारंभ में उन्होंने सुएजÞ नहर परियोजना में निवेश किया, जो कि सही मायने में मिस्र के विकास हित में था, लेकिन बाद में उन्होंने बहुत से अन्य छोटे–छोटे परियोजनाओं में निवेश करना शरूरू कर दिया था । इस तरह के निवेश के कारण, अंतत मिस्र भारी कर्ज में डूब गया, और इस प्रकार मिस्र के आंतरिक मामलों में यूरोपीय शक्तियों की हस्तक्षेप शरूरू हो गया ।
१८८१ में, मिस्र के राष्ट्रवादियों ने इसको बात को लेकर विद्रोह कर दिया । उन्होंने सभी विदेशी ऋणों या निवेशों पर प्रतिबन्ध लगा दिया । मिस्र के लोगों के ऐसे एकतरफा अधिनियम ने ब्रिटिश रानी को नाराज कर दिया, जिसने बाद में अपनी सेना और नौसेना को मिस्र भेज दिया । इस प्रकार मिस्र अंग्रेजों के अधीन हो गया और अंग्रेजÞो का एक औपनिवेशिक राज्य बनकर रह गया । इस सभी घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए, कोई भी चतुर दिमाग वाला को पूर्व में हुआ यूरोपीय उपनिवेशवाद और चीन द्वारा बीआरआई के माध्यम से हो रहे वर्तमान उपनिवेशवाद के बीच समानता स्पष्ट दिख जाएगी ।
वर्तमान वर्ष कंबोडिया–चीन राजनयिक संबंध की ६० वीं वर्षगांठ को चिह्नित करता है । चीन को कंबोडिया अपना सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार मानता है, जो कि पिछले चार वर्षों से सबसे बड़ा विदेशी प्रत्यक्ष निवेशक रहा है कंबोडिया में । अकेले वर्ष २०१७ में, चीन द्वारा कंबोडिया को ऋण के रूप में ४.२ अरब अमेरिकी डालर दिया गया था और बल्कि अनुदान के रूप में इसका केवल एक छोटा सा हिस्सा ही दिया गया है । वर्ष २०१७ के अंत तक, कम्बोडियन ऋण तेजी से बढ़ गया और ९.६ बिलियन अमरीकी डालर तक पहुंच गया, जिसमें से लगभग ४२.५ अकेले चीन के द्वारा दिए गया ऋण था । जिसका नतीजा यह हुआ कि दुनिया भर के आर्थिक विशेषज्ञो ने कंबोडियन सरकार पर सवाल उठाना शरूरू कर दिया और यहां तक कह दिया कि कंबोडिया अब काफी तेजी से चीन के ‘ऋण–जाल’ की ओर फसता जा रहा है ।
प्राकृतिक संसाधनों को नुकसानः
जंगलों और लुप्तप्राय जानवरों की भारी लागत (नुकसान) पर कंबोडिया में चीन द्वारा एक विशाल कामचय बांध का निर्माण हो रहा है । मानवाधिकार कार्यकर्ता ने इस प्रोजेक्ट के बारे में गंभीर चिंताओं को व्यक्त किया है, जिसकी शरूआत स्थानीय समुदायों को बड़े पैमाने पर विस्थापन करने से हुई है । भूमि उपयोग के संबंध में एक अनुमान के मुताबिक इस परियोजना में लगभग २००० हेक्टेयर भूमि का दुरूपयोग किया गया हैस इस सम्बन्ध में निजी ठेकेदारों के साथ–साथ पर्यावरणविदों का भी यह मानना है कि इस परियोजना में अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं को सही तरीके से कार्या्न्वित नहीं किया जा रहा है, जिससे देश (कंबोडिया) के संसाधनों का शोषण, उस पैमाने पर हो रहा है जो कि कभी भी नहीं देखा गया था ।
विकास के नाम पर मछुआरों को जबरदस्ती बेदखल करनाः
चीन कंबोडिया के कोह काँग प्रांत के तटीय क्षेत्र में एक विशाल पर्यटन केंद्र का निर्माण कर रहा है । यह परियोजना पहली नजर में निर्दोष और सौम्य प्रतीत होता है, परन्तु जब हम इस परियोजना के साथ थाई नहर (जिसे करा नहर भी बुलाते है), जिसे थाईलैंड में विकसित किया जा रहा है, को जोड़ कर देखते है, तब हमें इसकी असल रणनीतिक उपयोगिता का पता चलता है । थाई नहर के साथ बन रहा यह पर्यटन केंद्र समुद्री सिल्क रूट का अहम हिस्सा है, जो बीआरआई के अन्तर्गत आता है । चीन का प्राथमिक उद्देश्य इस परियोजना के द्वारा अपनी ईंधन की जरूरतों और अन्य व्यापारों के लिए महत्वपूर्ण मलक्का स्ट्रेट पर निर्भरता को समाप्त करना है ।
इस पर्यटन केंद्र के लिए कंबोडियन प्रशासन के द्वारा चीन को ४०, ००० हेक्टेयर भूमि आवंटित किया गया है, जबकि कंबोडियन सरकार ने आजतक किसी भी बड़ी परियोजनाओं के लिए १०, ००० हेक्टेयर भूमि से ज्यादा नहीं दिया है । ऐसा अपवाद केवल चीनी के लिए किया गए है और जिसका परिणाम प्रांत के स्थानीय मछुआरे समुदाय के लोगो को उठाना पड़ा, जिन्हें जबरन उनकी ही अपनी जमीन से बेदखल कर दिया गया, बाद में उन्हें दूसरे जगह स्थानांतरित कर दिया गया और उनको मछली पकड़ना छोड़ कर किसानों की तरह काम करने को मजबूर किया गया । गरीब मछुआरों के लिए अपने पारंपरिक पेशे को त्यागना असंभव है और जिस कारण अब उनकी आजीविका खतरे में है ।
आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेपः
एशियान मंच, जिसमें दक्षिण–पूर्व राष्ट्र शामिल हैं जो कि अब तक इस क्षेत्र में सबसे सार्थक बहुपक्षीय मंच माना जाता था । यह फोरम भी दो साल पहले विभाजित पाया गया, जब एशियान के एक मीटिंग में कंबोडिया ने (जो कि चीन के सबसे मजबूत सहयोगी है) मध्यस्थता के स्थायी न्यायालय के फैसले के किसी भी उल्लेख पर जो दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावों के पक्ष में नहीं है, पर जोरदार विरोध किया । इसके कारण कंबोडिया का अन्य एशियान सदस्यों के साथ सम्बन्ध काफी खराब हो गए, जिसका काफी गहरा असर कंबोडिया के संप्रभुता पर पड़ा ।
इन सबके बदले कंबोडिया ने क्या पाया ः १ ऋण–जाल का खतरा, २ अपनी स्वायत्तता को कमजोर किया, ३ एशियान सदस्यों के साथ सम्बन्ध को काफी खराब कर लिया, जब हम इन सब की तुलना चीन से मिले भारी भरकम कर्ज से करते है, तब हमें यह स्पष्ट पता चल जाएगा कि हमने असल में हमने छोटे फायदे के लिए, काफी भारी कीमत चुकाई है । यह माना जा सकता है कि कुछ परियोजनाएं, देश के विकास में रचनात्मक भूमिका निभा सकती हैं । परन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजनाओं को अपने देश की ही कंपनियों द्वारा किया जा सकता था । जिससे आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था को और उत्पादक और उपयोगी हो जाती ।

अनिल तिवारी, बीरगंज

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