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भारतीय आम चुनाव २०१९, भारतीय विदेश नीति व दक्षिण एशिया का भविष्य : मधुर शर्मा

मधुर शर्मा, दिल्ली | सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि निर्वाचन आयोग मार्च के पहले हफ़्ते में 2019 आम चुनाव की तिथियों की घोषणा कर सकता है। यह चुनाव न केवल भारतीय विश्लेषक दिलचस्पी से देखेंगे बल्कि विश्वभर के क्योंकि किसी क्षेत्रीय या वैश्विक शक्ति के राष्ट्रीय चुनाव पर दुनियाभर की नज़र होती है। किसी भी क्षेत्रीय शक्ति (जैसे भारत) या वैश्विक शक्ति (जैसे अमरीका) का ध्येय होता है कि वह अपनी विचारधारा का प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाए। शीत युद्ध के दौरान इसे बखूबी देखा गया जब अमरीका के पूंजीवाद और सोवियत संघ के साम्यवाद में घोर प्रतिद्वंदता थी। इस प्रतिद्वंदता के कारण विश्व ने कई युद्ध भी देखे (जैसे अफ़ग़ानिस्तान संकट)। अतः अपनी विचारधारा व आंतरिक नीतियों का प्रचार-प्रसारकोई नई बात नहीं है, परन्तु समय के साथ इसके तरीके बदलते हैं। पहले अमूमन ‘सख्त’ (hard power) नीतियाँ अपनाई जाती थीं परअब ज़ोर ‘नरम’ (soft power) नीतियों पर खिसक रहा है। भारत के लिए पिछले वर्षों में इन hard व soft power में सामंजस्य बनाना एक चुनौती रहा है। सख्त व नरम नीतियों के इस द्वन्द की छाप दक्षिण एशिया पर साफ़ देखी जा सकती है।
वर्ष 2014 में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो एक ‘सख्त’नीति की अपेक्षा थी क्योंकि भाजपा व नरेंद्र मोदी दोनों एक सख्त हिन्दू राष्ट्रवादी छवि रखते हैं। यह सख्त छवि देश के आंतरिक सामाजिक व राजनैतिक परिवेश में समझ आई थी पर इस पर विदेश नीति के सन्दर्भ में प्रश्न उठे थे। जो प्रश्न उठे थे उनके उत्तर कुछ समय बाद मिले भी जब भारत ने नेपाल के 2015संविधान में उसको धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करने पर प्रतिक्रिया दर्ज़ कराई। इसके बाद मधेस आंदोलन के दौरान अघोषित नाकाबंदी शायद हाल के वर्षों में भारतीय ‘सख्त’ नीति की चरम सीमा थी। इसका परिणाम यह हुआ कि नेपाल में भारत-विरोधी गतिविधियाँ बढ़ीं जो राष्ट्रवाद को सुलगाने का एक माध्यम बनी। नेपाल चीन के निकट गया व दोनों ने यातायात, व्यापार व संचार सम्बन्धी संधियां करीं जिसे भारत पर नेपाली निर्भरता कम करने के माध्यम के तौर पर देखा गया। ‘सख्त’ नीति के तहत 2015 नाकाबंदी का अतः भारत के लिए कोई अनुकूल प्रभाव नहीं रहा।

इसके बाद भारत की नीति में एक परिवर्तन देखा गया जहाँ ‘सख्त’नीतियों को पीछे रखकर ‘नरम’ नीतियों को आगे लाया गया। इसका एक हाल उदाहरण मालदीव संकट है जहाँ भारत ने हर संभव उकसावेके बाद भी कोई सख्त प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया नहीं दी। श्रीलंका संकट में भी भारत की प्रतिक्रिया सधी हुई थी। डोकलाम संकट में एक तरफ़ तो भारतीय सेना ‘सख्त’ तरीके से सीमा पर थी, वहीं दिल्ली से सधी हुई प्रतिक्रिया दी जा रही थी। यह एक सामंजस्य का उदाहरण था को 2015 की ‘सख्त’ नेपाली नाकाबंदी से काफ़ी भिन्न था। यह एक सरकार का समय के साथ परिपक़्व होने का प्रमाण था।

प्रधानमंत्री मोदी विदेश नीति नज़दीकी से देखते हैं। उनके विदेशी दौरे इसके प्रमाण हैं। अतः वर्तमान भारतीय विदेश नीति पर उनकी गहरी छाप है। उनकी विदेश नीति पर एक और चीज़ की गहरी छाप है और वह है उनका स्पष्ट बहुमत। जैसे पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की अमरीका नीति (जैसे परमाणु संधि) को उनके वाम घटक दलों काविरोध देखना पड़ा था, मोदी के पास ऐसा कोई विरोध नहीं है। शायद यही कारण था कि मोदी इज़राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। एक नेता की विदेश नीति के परिपक़्व होने में अतः उनके देश (व सरकार) की आंतरिक स्थिरता का काफ़ी महत्त्व होता है। जब देश में स्थिरता होगी तो विदेश नीति तंत्र व मंत्री एवं प्रधानमंत्री विदेशी मामलों को समय दे पाएंगे, वरना देश के आंतरिक मामलों में ही उलझे रहेंगे। इसके अतिरिक्त गठबंधन की सरकार की अपनी बाधाएं होती हैं जिन्हें हमारे पिछले दो प्रधानमंत्रियों ने बखूबी देखा। अतः एक स्पष्ट बहुमत वस्थिर आंतरिक हालत एक कुशल विदेश नीति के लिए आवश्यक हैं। 2019 के चुनाव को इस सन्दर्भ में देखना चाहिए।

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आज दक्षिण एशिया में चीन अपनी जड़े जमा रहा है। पाकिस्तान में वह जड़ जमा भी चुका है व नेपाल में काफ़ी फ़ैल चुका है। श्रीलंका व मालदीव में भी उसकी गहरी छाप है। चीन दक्षिण (व मध्य) एशिया से शुरू कर स्वयं को विश्वपटल पर एक शक्ति के तौर पर स्थापित करना चाहता है। दक्षिण एशिया में भारत उसका एकमात्र प्रतिद्वंदी है। चीन को टक्कर देने के लिए भारत को एक कुशल विदेश नीति चाहिए। भारत को ‘सख्त’ व ‘नरम’ नीतियों में सामंजस्य भी चाहिए। यह सब उसे आंतरिक सामाजिक व राजनैतिक स्थिरता से साथ चाहिए, परन्तु 2019 में किसी भी दल का स्पष्ट बहुमत के साथ आना मुश्किल लग रहा है। कई कयासों के अनुसार ‘महागठबंधन’ की सरकार भी सत्ता मेंआ सकती है जिसमें हर पार्टी अध्यक्ष प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार है। ऐसे में सामाजिक व राजनैतिक अस्थिरता अपेक्षित है जिसका दुष्प्रभाव भारतीय विदेश नीति और दक्षिण एशिया (व विश्व) में भारत की साख पर पड़ेगा।

आज दक्षिण एशिया चीन और भारत के बीच दोराहे पर है और अगर भारत अपने नैतिक क्षेत्रीय दायित्व से आंतरिक अस्थिरता के कारण पीछे हठता है तो दक्षिण एशिया के पास चीन के आलावा कोई विकल्प नहीं होगा और वह चीन की विस्तारवादी नीति में और गहराई सेसमायेगा जिससे पूरे क्षेत्रीय व वैश्विक परिवेश में चीन ने अनुकूल बदलाव होंगे। 2019 चुनाव अतः विश्वभर में दिलचस्पी से देखा जाएगा, खास तौर पर बीजिंग में, जिसे एक अस्थिर भारत से सबसे ज़्यादा लाभ होगा।

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