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हकीकत यही है कि समग्र मधेशी के समझने की भाषा है हिन्दी : खगेन्द्र संग्रौला

 

मधेश के विषय में दो दृष्टिकोण व्याप्त हैं । पहला मधेस, भूमि, समाज, सभ्यता, परम्परा, संवेदना और पीड़ा को देखने का सनातन दृष्टिकोण । यह सनातन दृष्टिकोण पहाड़ी समुदाय की है जिसका केन्द्र सिंहदरबार है । मधेस जिसे आन्तरिक उपनिवेश माना जाता है या कहा जाता है । आन्तरिक उपनिवेश से पीडि़त मधेसी संवेदना या दृष्टिकोण एक अलग दृष्टिकोण है । ये दोनों ही दृष्टिकोण परस्पर विरोधी दृष्टिकोण हैं । बाहर से देखने पर यह आभास होता है कि यह घर्षण शांत हो चुका है । सिंहदरबार का अगर माना जाय तो यह लगता है कि मधेस ने संविधान स्वीकार कर लिया है जबकि यह संविधान रक्तरंजित है । संविधान जब बन रहा था तो मधेस पर अखण्ड शक्ति का प्रयोग किया गया । इस संविधान में तीन समुदाय का रक्त मिला हुआ है । कुछ थारुओं के, कुछ पहाडि़यों के और ५५/५६ मधेशियों के रक्त से रंगा हुआ है यह संविधान । रक्तरंजित संविधान को लागू करना हमेशा मुश्किल रहा है । घाव की कमी नहीं है और दुखद पहलू यह है कि जिसने अपने स्वार्थ के लिए यह सब किया उसने आज तक पश्चाताप नहीं किया है । संविधान निर्माण ने जो घाव दिया है वह आज भी जीवित है ।

यह दो दृष्टिकोण आज भी दोनों पक्षों के बीच ज्यों का त्यों है बावजूद इसके यह कहा जा रहा है कि मधेसियों ने संविधान स्वीकार कर लिया है । क्योंकि इसी संविधान के तहत उन्होंने चुनाव लड़ा जीता भी प्रदेश में शासक भी है तो अब किस बात का मलाल या विरोध ? यहाँ अन्याय की बात ही नहीं है क्योंकि उनके ९५ प्रतिशत माँग तो पूरी हो चुकी है । निर्मला की हत्या की बात उठती है, कहा जाता है कि ९५ प्रतिशत अपराधी हिरासत में हैं, गोविन्द केसी की बात उठती है कहा जाता है कि उनकी माँग ९५ प्रतिशत मानी जा चुकी है । बस ५ प्रतिशत की बात है जिसमें मधेश की भी समस्या आती है ।

यह सिंहदरबार का दृष्टिकोण है उसकी भाषा है । किन्तु जब मधेसी की संवेदना की बात आती है तो यह सोच सामने आती है कि उनकी संवेदना का जड़ क्या है ? मधेसियों के ऐतिहासिक संघर्ष के बाद, मधेस पहाड़ के तनाव के बाद, परिवर्तन की इतनी बातों के बाद संविधान तो बना पर मधेस की आँख आज भी पहाड़ को किस दृष्टि से देखती है उसकी भावना क्या है ? देखा जाय तो भावनात्मक दूरी कहीं भी कम नहीं हुई है । संविधान भी बना, कार्यान्वयन भी हुआ, प्रदेशों का निर्माण भी हुआ, पर मधेशी युवा, मुस्लिम अल्पसंख्यकों की जो भावना थी उसमें जो दूरी है वह आज भी कम नही हुई है । उसकी चोट उसका संताप और जिद आज भी अपनी जगह बरकरार है । जब पहचान की बात आती है तो सबसे पहली आधारभूत विषय भाषा की है । नेपाल के लिए संघीयता का मुद्दा उठाने वाले और उसे जनमानस तक पहुँचाने वाले ने कहा था कि पुरानी राज्य सत्ता एकात्मक हो गई है । देश का सभी साधन स्रोत, सभी अख्तियार, सभी अधिकार सिंहदरबार में ही केन्द्रित हो गया । संघीयता में जाने का अर्थ होता है अधिकार का वितरण स्रोत का बँटवारा । आत्मनिर्णय का अधिकार भी देना होता है । आत्मअधिकार का यह अर्थ कदापि नही है कि देश का टुकड़ा कर बिहार में मिला देना । संविधान में प्रदेश को जो अधिकार मिलता है उसकी सीमा में रह कर वह अपनी नीति और नियति का निर्धारण करता है । यह अधिकार प्रदेश को मिलना ही आत्मनिर्णय है । पर आज भी ऐसा कुछ नही हुआ है और न ही बीच की दूरियाँ कम हुई हैं । उनकी आशा थी कि प्रदेश में जब उनकी सरकार होगी तो उनके अधिकार। में सहजता आएगी उनके अधिकारी उनकी भाषा समझेंगे पर ऐसा कुछ हुआ नहीं अधिकारी वही हैं और दुभाषिया भी नही है । यह सब आज भी पूरा नहीं हो पाया है ।

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स्थानीय तह में अथवा प्रदेश में वहाँ की भाषा होनी चाहिए परन्तु अभी इसकी चर्चा भी नहीं है । भाषा नेपाली ही है और शक्तिशाली सीडीयो ही है । पहले भी पंचायत काल में सीडीयो को जिला का राजा ही कहा जाता था । प्रदेशका निर्माण होने के बाद, संरचना निर्माण और कार्यान्वय के बाद भी अखितयार के केन्द्र में सीडीयो ही है । प्रदेश को मिलने वाला अधिकार, साधन स्रोत का निर्णय उसका परिचालन का अधिकार उन्हें नहीं है । उन्हें प्रहरी नियुक्ति या उनके प्रोन्नति या स्थानांतरण का अधिकार भी नहीं है । कर्मचारियों को उपर के आदेश के अनुसार ही कार्य में लगाया जाता है । देखा जाय तो अभी का प्रदेश टेक्निकल प्रदेश है । अधिकार नहीं देकर सिंहदरबार आज भी उन्हें हेय दृष्टि से ही देख रही है और ऐसी ही प्राविधिक संरचना का निर्माण भी किया है । पहाड़ी समुदाय नेपाली भाषा समझती है, लिम्बू की भाषा राई नहीं समझते हैं, राई में भी अनेक समुदाय हैं जिसकी वजह से राई की भाषा राई ही नहीं समझते हैं । गुरुँग की मगर नहीं समझते पर ये सभी नेपाली समझते हैं । जनजाति एक दूसरे की भाषा नही समझने के कारण माध्यम भाषा के रुप में नेपाली भाषा का प्रयोग करते हैं । कुछ इतिहासकार का तो यह कहना है कि हमें भानुभक्त ने ऐसा बना दिया है उससे भी अधिक तो लाहुरे से आया है सभी जनजाति लाहुरे से आए उन्हें नेपाली सिखाया गया उनका हिन्दूकरण किया गया इसकी वजह से एक अच्छी बात यह हुई कि पारस्परिक सम्पर्क भाषा का निर्माण हुआ ।

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समग्र में तराई–मधेस की सम्पर्क भाषा क्या है ? वह न तो मैथिली है, न ही भोजपुरी, न ही अबधी और न ही थारु वह भाषा है हिन्दी । हिन्दी भाषा का नाम आते ही राष्ट्रवादियों को असहजता महसूस होने लगती है । बहुतों की नजर में हिन्दी भाषा दिल्ली के शासकों की विस्तारवादी भाषा है । परन्तु हकीकत यह है कि समग्र मधेशी के समझने की भाषा है हिन्दी । हिन्दी भाषा के बृहत परिवार के भीतर तराई मधेश की सभी भाषा समाहित हैं । न्यायोचित बात की जाय तो संवाद को सहज करने के लिए तराई मधेश की कामचलाउ भाषा सिर्फ हिन्दी ही है । सिर्फ नेपाली भाषा पर्याप्त नहीं है । अभी भी कई जगह हैं वहाँ जहाँ के लोग नेपाली नही समझते । परन्तु हिन्दी भाषा तो जोड़ तोड़ कर पहाड़ी भी बोल लेते हैं । शेर्पा भी भारतीय रेल के सफर में अपनी भाषा में हिन्दी को मिलाकर अपना काम चला लेते हैं । यह एक गम्भीर विषय है । पहचान, सञ्चार, पारस्पारिक सम्पर्क स्थापना की जब भी बात की जाती है और बीच की दीवार को खत्म करने की बात आती है तो सहज समप्रेषण की बात भी आती है । किन्तु इस विषय पर ध्यान नही दिया जा रहा है ।

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दूसरा संवेदनशील विषय है नागरिकता । नागरिकता सम्बनधी अन्तरिम संविधान ने व्यवस्था किया था जिसे खण्डित माना गया, अपूर्ण माना गया । आज भी नागरिकता के सवालपर माँ के नाम से नागरिकता देने की बात पर सनातनी शासकों को असहजता महसूस होती है । ३४ लाख सीमा पार के लोगों को नागरिकता दिलाने का आरोप मधेसियों पर है । हर कोइृ अपनी इच्छानुसार इसकी संख्या बढा देता है । चित्रबहादुर केसी, सिपी मैनाली, साध्यबहादुर भण्डारी सुनिए अगर २४ लाख गैरनेपाली ने नागरिकता ली है यह कहा जाता है तो ज्ञात होना चाहिए कि आज यह संख्या ४४ लाख हो गई है । खुली सीमा के कारण नकली नागरिकता किसी का लेना स्वाभाविक है । जितना भी नियंत्रण किया जाय कुछ तो नकली होंगे ही । जो नागरिकता लेने के योग्य नहीं हैं वो भी नागरिकता ले चुके हैं पर यह दिया किसने है ? कांग्रेस–एमाले के सीडीयो ने ही तो ? फिर इसका आरोप मधेसियों पर क्यों ?खुद के नियुक्त किए गए सीडीयो नागरिकता बेचते हैं और आरोप मधेसियों पर लगाया जाता है इससे बड़ा अन्याय क्या हो सकता है ?

(‘मधेस मिशन’ अभियान अन्तर्गत ‘मधेस मन्थन’ बहस श्रृंखला में खगेन्द्र संग्रौला द्वारा व्यक्त किए गए विचाराें का सम्पादित अंश। विवेकशील साझा पार्टी द्वारा आज गुरुवार को काठमांडू में यह प्रोग्राम आयोजित  किया गया |)

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