सत्ता का नशा : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू )
वीरगंज | सत्ता का नशा अफ़ीम के नशे की तरह होता है। जिसे ये नशा लग जाएं, उसे लगता है कि उसका जन्म सत्ता के लिए हुआ है और आजीवन सत्ता में ही रहेगा। उसके आगे-पीछे सलाहकार-चाटुकार घेरे रहते है, जो दीमक की तरह खोखला करते हुए, उसे अपने जड़ो से अलग करते है।
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध ।
शुभचिंतक का कर्तव्य बनता है कि समय रहते सचेत कराए, हालांकि नशा के कारण आपकी बातों का असर नही होगा, उल्टे आपको ही दोषी क़रार दिया जाएगा। जब आप सत्ता में होते है तो सभी आपसे जुड़ना चाहते है,आपसे वफ़ादारी की कसमें खाते है, उनकी सभी बातें सही लगने लगती है। कुछ ही दिनों में दोनों के दिल,दिमाग और पेट एक हो जाते है। अगर कोई फ़र्क राय दे, तो उसपर संदेह होता है, गुस्सा आता है,मुँह से गालिया निकलने लगती है।
सत्ता में रहते हुए सिर्फ लोकप्रिय नारे गढ़ने से काम नहीं चलता। किसी भी योजना के अन्दरूनी और प्राबिधिक पक्ष का गहन अध्यन करना चाहिए, सुनिश्चित करना पड़ा की योजनाएं जुमलों तक सिमित ना रह जाएं। साइनिंग इंडिया, राइजिंग इंडिया इसके उदाहरण है। योजनाएँ सही हो तो शिवराज सिंह चौहान बनेंगे नहीं तो जीतनराम मांझी की तरह नेपथ्य में चले जाएँगे। सिर्फ शिलान्यास करने या सैलून पारलर का फीता काटने से जनता प्रभावित नहीं होती। किसी एक जाती समूह से घिरे होने पर अन्य लोग दूर होने लगते है। सबको साथ लेकर नेतृत्व करने वाला ही नेता होता है।
आप कितने सफल है इसका मूल्यांकन इस बात से होता है की जमीन से जुड़े कितने नए लोग संपर्क में आए, साथ ही कितने पुराने को साथ रखने में सफल हुए। मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कथा ‘नशा ” में सत्ता के इसी नशे के बारे में लिखा है। जो सत्ता के नशे को अपने वश में कर ले वह मिसाल बनता है, नही तो कहानी बन कर रह जाता है। मर्जी आपकी आखिर सत्ता है आपका, उसका नशा है आपका। समय रहते आपको सचेत और सावधान करके अपना फर्ज पूरा हो रहा है, जो चुप है, जो तटस्थ है, समय उनका भी मूल्यांकन करेगा।

