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गरज कि काट दिए जिंदगी के दिन ऐ दोस्त, वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में : फिराक गोरखपुरी

 

आधुनिक उर्दू शायरी के सबसे लोकप्रिय शायरों में से एक फिराक गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय था। उन्हें उर्दू कविता को बोलियों से जोड़ कर उसमें नई लोच और रंगत पैदा करने का…आधुनिक उर्दू शायरी के सबसे लोकप्रिय शायरों में से एक फिराक गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय था। उन्हें उर्दू कविता को बोलियों से जोड़ कर उसमें नई लोच और रंगत पैदा करने का श्रेय दिया जाता है।

यूँ माना ज़ि‍न्दगी है चार दिन की 
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी

ख़ुदा को पा गया वायज़ मगर है 
ज़रूरत आदमी को आदमी की 

बसा-औक्रात1 दिल से कह गयी है 
बहुत कुछ वो निगाहे-मुख़्तसर भी 

मिला हूँ मुस्कुरा कर उससे हर बार 
मगर आँखों में भी थी कुछ नमी-सी 

महब्बत में करें क्या हाल दिल का 
ख़ुशी ही काम आती है न ग़म की 

भरी महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर 
तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली 

लड़कपन की अदा है जानलेवा 
गज़ब ये छोकरी है हाथ-भर की

है कितनी शोख़, तेज़ अय्यामे-गुल2 पर 
चमन में मुस्कुहराहट कर कली की 

रक़ीबे-ग़मज़दा3 अब सब्र कर ले 
कभी इससे मेरी भी दोस्ती थी 

1- कभी-कभी, 2- बहार के दिन, 3- दुखी प्रतिद्वन्द्वी 

उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी 
इक नागन-सी लहराने लगी 

जब ज़ि‍क्र तेरा महफ़ि‍ल में छिड़ा क्यों आँख तेरी शरमाने लगी 
क्या़ मौजे-सबा थी मेरी नज़र क्यों ज़ुल्फ़ तेरी बल खाने लगी 
महफ़ि‍ल में तेरी एक-एक अदा कुछ साग़र-सी छलकाने लगी 
या रब यॉ चल गयी कैसी हवा क्यों दिल की कली मुरझाने लगी 
शामे-वादा कुछ रात गये तारों को तेरी याद आने लगी 
साज़ों ने आँखे झपकायीं नग़्मों को मेरे नींद आने लगी 
जब राहे-ज़ि‍न्दगी काट चुके हर मंज़ि‍ल की याद आने लगी 
क्या उन जु़ल्फ़ों को देख लिया क्यों मौजे-सबा थर्राने लगी 
तारे टूटे या आँख कोई अश्कों से गुहर1 बरसाने लगी 
तहज़ीब उड़ी है धुआँ बन कर सदियों की सई2 ठिकाने लगी 
कूचा-कूचा रफ़्ता-रफ़्ता वो चाल क़यामत ढाने लगी 
क्या बात हुई ये आँख तेरी क्यों लाखों कसमें खाने लगी 
अब मेरी निगाहे-शौक़ तेरे रूख़सारों के फूल खिलाने लगी 
फि‍र रात गये बज़्मे-अंजुम रूदाद3 तेरी दोहराने लगी
फि‍र याद तेरी हर सीने के गुलज़ारों को महकाने लगी 
बेगोरो-कफ़न जंगल में ये लाश दीवाने की ख़ाक उड़ाने लगी 
वो सुब्ह‍ की देवी ज़ेरे शफ़क़ घूँघट-सी ज़रा सरकाने लगी 

उस वक्त फ़ि‍राक हुई यॅ ग़ज़ल 
जब तारों को नींद आने लगी

1- मोती, 2- प्रयत्न, 3- कहानी

कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम

रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गये
वाह री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम

होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी
इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम

बेनियाज़ी को तेरी पाया सरासर सोज़-ओ-दर्द
तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम

भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती
उस को भी अपनी तबीयत का समझ बैठे थे हम

हुस्न को इक हुस्न की समझे नहीं और ऐ ‘फ़िराक़’
मेहरबाँ नामेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम

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