मानवता (गजल) : निर्मल रमण पराजुलि
मानवता
मानव हो कर मानविय धर्म, निभाओ तो मै जानु
गिले शिक्वे दिलसे हटाके, मुस्कुराओ तो मै जानु
एक दुसरे मे अच्छी , नही लगती है ये दुरी
दिन दुखीको गले लगाकर, दिखाओ तो मै जानु
ईन्सानीयत भुलकर कोई, ईन्सान नही हो सकता
अपना हाथ पाव जनहित मे जुटाओ तो मै जानु
कबुतर उडाकर बुद्धका सन्देश, देना है हर किसीको
हिंसा और दुस्मनी हर दिलसे, मिटाओ तो मे जानु
घरपरिवार समाज और मुल्क,सुन्दर बनाना है अगर
बिश्वसे बिश्वयुद्द का चक्रब्युह, तुडवाओ तो मे जानु !!!

निर्मल रमण पराजुलि सामाखुशि, काठ्मान्डौ


