राजनीति का शुद्धिकरण,बिल्ली के गले घंटी बांधेगा कौन ? : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)
मुरली मनोहर तिवारी (सीपू), वीरगंज | आज भ्रष्टाचार, झूठे वादे, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाई-भतीजावाद, धनबल से सराबोर राजनीति मधेश को गर्त में ले जा रही है। रोटी, कपड़ा, मकान, रोज़गार, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, दलित-पिछड़ा को अधिकार, पहचान, स्वाभिमान, सम्मान जैसे गंभीर मुद्दे गौण हो गए है। जो मधेशी अन्याय के खिलाफ और बराबरी के अधिकार के लिए, ईमानदारी के साथ निस्वार्थ भावना से मधेश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए आंदोलन किया, उनका प्रदूषित राजनीति में दम घुट रहा है ।
सभी नेता, पार्टियाँ राजनीतिक शुद्धिकरण की बात तो करती है, लेकिन चुनाव के समय शुद्धिकरण को कचरा पात्र में डालकर साम्प्रदायिकता और जातिवाद की जड़ो को सींचते है। पहली आवश्यकता संगठन के भीतर शुद्धिकरण करने की है। वास्तव में जब संगठन में शुद्धिकरण करने का समय आता है तो सभी महत्वपूर्ण तत्व अपने केचुली में छुप जाते है, और बाद में दुहाई देते हुए घड़ियाली आशु बहाते है। सवाल वही है, बिल्ली के गले घंटी बांधेगा कौन ?
ये चक्र ऐसा है कि सबका जमीर तो कहीं, किसी के पास गिरवी रखा हुआ है, फिर ये चक्र टूटेगा कैसे ? लोकतंत्र में कुर्सी का सम्मान करना हर नागरिक का आत्मधर्म और राष्ट्रधर्म है। क्योंकि इस कुर्सी पर व्यक्ति नहीं, चरित्र बैठता है। लेकिन हमारे लोकतंत्र की त्रासदी ही कही जाएगी कि इस पर स्वार्थता, महत्वाकांक्षा, बेईमानी, भ्रष्टाचारिता आकर बैठती रही है।
लोकतंत्र की टूटती सांसों को जीत की उम्मीदें देना जरूरी है और इसके लिए साफ-सुथरी छवि के राजनेताओं को आगे लाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। यह सत्य है कि नेता और नायक किसी कारखाने में पैदा करने की चीज नहीं हैं, इन्हें समाज में ही खोजना होता है। काबिलीयत और चरित्र वाले लोग बहुत हैं पर परिवारवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार उन्हें आगे नहीं आने देता।
राजनीति के शुद्धिकरण को लेकर मधेश के भीतर बहस होता है परंतु कभी भी राजनितिक दलों ने इस दिशा में गंभीर पहल नहीं की। लोकतंत्र की मजबूती एवं राजनीतिक शुद्धिकरण की दिशा में जब-जब प्रयास हुआ है, लोगों ने अपना पूरा समर्थन दिया, सहयोग किया है। देश विदेश की अनेक संस्थाएं यह कह चुकी हैं कि नेपाल दुनिया के ऐसे देशों में शुमार है, जहां बिना लिए-दिए कुछ नहीं होता। जनप्रतिनिधियों की संपत्ति कई सौ गुणा बढ़ रही है। भले ही एक सार्थक शुरुआत का परिणाम सिफर रहा है, वातावरण में भ्रष्टाचार एवं राजनीतिक अपराधीकरण के विरूद्ध नारे उछालने वाले ही धीरे-धीरे उनमें लिप्त पाए जा रहे हैं।
समय की दीर्घा जुल्मों को नए पंख देती है। यही कारण है कि राजनीति का अपराधीकरण और इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार लोकतंत्र को भीतर ही भीतर खोखला करता जा रहा है। एक आम आदमी यदि चाहे कि वह चुनाव लड़कर संसद अथवा प्रदेशसभा में पहुंचकर देश-मधेश की ईमानदारी से सेवा करे तो यह आज की तारीख में संभव ही नहीं है। संपूर्ण तालाब में जहर घुला है, यही कारण है कि कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है, जिसके टिकट पर कोई दागी चुनाव नहीं लड़ रहा हो। यह अपने आप में आश्चर्य का विषय है कि किसी भी राजनीतिक दल का कोई नेता अपने भाषणों में इस पर विचार तक जाहिर करना मुनासिब नहीं समझता।
हर बार सभी राजनीति दल अपराधी तत्वों को टिकट न देने पर सैद्धांतिक रूप में सहमति जताते है, पर टिकट देने के समय उनकी सारी दलीलें एवं आदर्श की बातें काफूर हो जाती है। एक-दूसरे के पैरों के नीचे से फट्टा खींचने का अभिनय तो सब करते हैं पर खींचता कोई भी नहीं। कोई भी जन-अदालत में जाने एवं जीत को सुनिश्चित करने के लिए जायज-नाजायज सभी तरीकें प्रयोग में लेने से नहीं हिचकता। रणनीति में सभी अपने को चाणक्य बताने का प्रयास करते हैं पर चंद्रगुप्त किसी के पास नहीं है। घोटालों और भ्रष्टाचार के लिए हल्ला उनके लिए राजनैतिक मुद्दा होता है, कोई नैतिक आग्रह नहीं।
आज वह तेज व आचरण नेतृत्व में लुप्त हो गया। आचरणहीनता कांच की तरह टूटती नहीं, उसे लोहे की तरह गलाना पड़ता है। विकास की उपलब्धियों से हम ताकतवर बन सकते हैं, महान् नहीं। महान् उस दिन बनेंगे जिस दिन हमारी नैतिकता एवं चरित्र की शिलाएं गलना बंद हो जाएगी और उसी दिन लोकतंत्र को शुद्ध सांसें मिलेंगी। कांग्रेसी कल्चर ख़त्म करके की प्रतिबद्धता करके आई पार्टियां ख़ुद कांग्रेसी कल्चर के अनुयायी हो जाए तब राजनीती का शुद्धिकरण कैसे होगा ?


