Fri. Aug 14th, 2020

बज़ाहिर प्यार की दुनिया में जो नाकाम होता है कोई रूसो कोई हिटलर कोई खय्याम होता है : अदम गाेंडवी

उनका असली नाम रामनाथ सिंह था. लेकिन सबने उन्हें ‘अदम गोंडवी’ के नाम से ही जाना. वो अदम गोंडवी जो ताकतवर कुर्सियों के फरमान ताउम्र अपने पोएटिक वक्तव्यों से ख़ारिज करता रहा.

उसने ग़ज़ल में रूमानियत के चोंचले नहीं पाले. जनता की बात कहना चुना और बुराइयों के ख़िलाफ अदबी जंग छेड़ी.

बताने वाले बताते हैं कि गोंडा का ये शायर जब अपने बगावती जज्बात से भरे शेर पढ़ता था तो लगता था कि एक पल में सारी व्यवस्था को बदल देना चाहता है. ये शायरी ग़रीब और पंक्ति में सबसे पीछे खड़े आदमी का हथियार बनी.

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बज़ाहिर प्यार की दुनिया में जो नाकाम होता है
कोई रूसो कोई हिटलर कोई खय्याम होता है

ज़हर देते हैं उसको हम कि ले जाते हैं सूली पर
यही हर दौर के मंसूर का अंजाम होता है

जुनूने-शौक में बेशक लिपटने को लिपट जाएँ
हवाओं में कहीं महबूब का पैगाम होता है

सियासी बज़्म में अक्सर ज़ुलेखा के इशारों पर
हकीकत ये है युसुफ आज भी नीलाम होता है

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जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये

जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये

जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये

मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये.

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर मेंकोठी के ज़ीने से

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अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से.

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