बेलुन बेचनेवाली नन्ही “लाली” : लक्ष्मण नेवटिया,
बेलुन बेचनेवाली नन्ही “लाली”
-लक्ष्मण नेवटिया, बिराटनगर
खिलौनोंसे खेलनेकी छोटीसी उमरमें
जीवनके उषाकालके कोमल क्षणोंमें
शहरमें खिलौने बेचनेवाले
रामखेलावनकी नन्ही बेटी “लाली”
आज उदास है, अनमनीसी है,
चाहकर भी सो नहीं पा रही है,
क्योंकी सुबह ही अपने बापके साथ
बेलुन बेच्ने दशहरे मेलेमें जारही है।
दशहरेकी छुट्टियोंमें उसका नन्हा सखा ” सुरज”
अपने मातापिताके साथ मेलेमें जाता है
जो चाहता है खरिदता है, जो चाहता है खाता है।
तर नन्ही” लाली ” फु-फु-फु कर बेलुन फुलाती है
गरिबकी बेटी होनेका फर्ज निभाती है।
नजाने किस जन्मका कर्ज चुकाती है।
आज मेलेके दुसरे दिन फिर नन्हीं लाली भाव विव्हल है
कल बेचना है जिस सुन्दर गुडियाको मेलेमें
बापकी डाँटके डरसे उस गुडियासे खेल नहीं पा रही है।
रातभर बिस्तर पर गुडियाको
सिनेसे चिपकाके सोई है
सुबह जब बिकी बीसमें गुडिया
लाली भी रोई है/ गुडिया भी रोई है।
अपने आँशुओंको पलकोंमें ही छुपा
दो जुनकी रोटीके जुगाडमें
बाप रामखेलावनके साथ
धरती पर मटमैले वस्त्रोंमें
उतरी सुनहरी परी सी नन्ही “लाली”
बालामनकी चाहतोंको दबा
भरे गलेसे आवाज लगारही है-
आइये अपने बच्चों के लिये ले जाइये
रंगबिरंगे बेलुन
दश का एक -बीस के तीन।।


