Wed. Aug 12th, 2020

चाहतों के साए में, प्यार की फजाओं में, रंग फैल जाते हैं अब भी तेरी आहट पर : बसन्त चौधरी

नेपाल के हिन्दी साहित्य जगत में कवि बसन्त चौधरी की कविताएँ एवं गजल एक नया आयाम पा रही हैं । प्रकृति का सौन्दर्य और जीवन के सार को बताती आपकी रचना मन को छूने वाली होती हैं । आपको उसमें डूबना अच्छा लगता है । कही अनकही कई बातें कई यादें आपको झकझोड़ती हैं, आप खुद को उसमें पाते हैं । आपके समक्ष आज पेश है उनकी कुछ रचनाएँ :

 

यादों के झरोखों से, ख्वाबों के दरीचों तक
हम दीए जलाते हैं, अब भी तेरी आहट पर
चाहतों के साए में, प्यार की फजाओं में
रंग फैल जाते हैं अब भी तेरी आहट पर ।

१.
संध्या में मैं जिन्दगी को आईना
देखते हुए देखता हूँ
और यन्त्रवत दुखी मन से प्रेम समझकर
कविता लिखता हूँ ।
देखने पर कुछ बदला हुआ नजर नहीं आता
छूने पर न छूने जैसा भी नहीं लगता
लेकिन निश्चय ही कहीं कुछ हुआ जरुर होता है
हाँ यह अलग बात है कि बाहर से कुछ नजर नहीं आता
छूने की कोशिश करने पर भी पकड़ में वो नहीं आता ।
मैं तुम्हें छू नहीं सकता
जैसे चाँद को हाथ बढ़ा कर छुआ नहीं जा सकता ।
तुम में और चाँद में फिर भी एक अन्तर है
चाँद कभी कभी मेरी खिड़की के पास चला आता है
मगर तुम नहीं आती ।
वैसे तो चाँद और सूरज भी छुपते नहीं, झुकते नहीं
मगर मैं तुम्हारे प्रेम के सामने
ऐसे झुकता हूँ
जैसे फलों से लदी टहनियाँ भी झुकती नहीं ।
मेरे सामने विवशता के उदास तालाब हैं
पानी मिलने की उम्मदि नहीं
इसलिए मैं तालाब की उसी उदासी को पीता हूँ ।
विराग के भीतर अनुराग को जीता हूँ ।

२.
बढ़ता जा रहा है एकाकीपन, डूबता जा रहा है सूरज ।
कोहरे में घुली हवा लेते लेते
उफ ! विरक्त हो रहा है समय ।
कहाँ है ऋतु में ऋतु का स्वभाव ?
मेरे भीतर जाने क्यों कहीं कुछ हो रहा है
टूटता जा रहा है आभास ।
मैं खुद, खुद से फिसलता जा रहा हूँ
मैं देखता जा रहा हूँ अपना ही ह्रास।
खिलती हैं मेरे भीतर उतसाह की कलियाँ
लेकिन फिर तुरंत ही पीली पड़ जाती हैं
कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरा मन मुझसे माँग रहा है अवकाश ?
कि मेरा मन मुझसे ही चुकता कर रहा है कोई हिसाब ?
या समय की आँखों के तराजू में यही हो गया हो बेहिसाब ?
ऐ समय ! मैं हाथ जोड़ता हूँ, मुझे परेशान न कर ।
वैसे ही मैं परेशान हूँ अपने आलसपन से।
मुझे अपनी सुविधा के अनुसार
मेरे भीतर के आकाश का विचरण करने दो ।
जीने के नाम पर थक कर चूर हो चुका हूँ
सोने से पहले कुछ पल ही सही जीने की अनुभूति करने दो ।
ऐ गोधूलि ! मुझे सहजता से साँस लेने दो ।

जख्म जाग जाते हैं, अब भी तेरी आहट पर
होंठ गुनगुनाते हैं, अब भी तेरी आहट पर
आसमान हँसता है, चाँद जगमगाता है
तारे झिलमिलाते हैं, अब भी तेरी आहट पर
याद के झरोखों से, ख्वाब के दरीचों तक
हम दीए जलाते हैं, अब भी तेरी आहट पर
चाहत के साये में, प्यार की फजाओं में
रंग फैल जाते हैं, अब भी तेरी आहट पर
बेकरार सागर के सूने सूने आँगन में
फूल मुस्कुराते हैं, अब भी तेरी आहट पर ।
४.
अकेला हूँ
मेरे मन में
रात का
एक सुरमई
परदा पड़ा है
उस अँधेरे में
वहाँ कोइृ खड़ा है ।
बुत है कोई,
या मेरी परछाई है वह ?
जिन्दगी का जश्न है
क्यों उदासी में घिरा है ?
मेरी तरह
एक छोर कोई
ढूँढता है
शायद उन रूपों को,
आत्मीयता की धूपों को
वो अब मुझसे दूर है,
मिलते नहीं हैं ।
अब कहीं भी दोस्ती के वो फूल
खिलते नहीं हैं ।
५.
यात्रा तो जीवन का ही है
लेकिन मेरी यात्रा सीमित है
बस तुमसे ही शुरु और तुम पर ही खतम
मैं मंजिल की तलाश में
मंजिल ही ढूँढता हूँ
तुम्हें पाने के लिए
तुम्हीं में वशीभूत होता हूँ ।
जहाँ तुम वहीं मेरा मंदिर
खुद को भुलाकर
मेरा मन
तुम में ही समाहित हो जाना चाहता है ।

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