जीवनदायिनी नदियाँ, नमामि गंगे की आवश्यकता नेपाल में भी-२ : मुरलीमनोहर तिवारी

वर्तमान प्रवाहमार्ग
हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |वर्तमान में सन् १९५४ ई. तक कमला ऊपरिवर्णित धारामार्गो से ही बहती थी । वे धाराएँ अब इसकी छाड़न नदी बन गयी हैं । सन् १९५४ ई. में कमला अपना निजी धारामार्ग छोड़कर अचानक मिथिलांचल की एक छोटी नदी सोनी और भुतही बलान से काफी पश्चिम बहने वाली एक अन्य ’बलान’ (त्रिशूला–बलान) नामक नदी के प्रवाह मार्ग को आत्मसात करके बहने लगी । वर्तमान में कमला की धारा जयनगर के पास से दक्षिण की ओर बहकर आती हुई खजौली थाने में प्रवेश करती है और भटचौरा (भरचौरा) के दक्षिण तथा भकुआ के पूर्व–दक्षिण कोण में तथा चतरा–गोबरौरा के पूर्वोत्तर कोण में सोनी नदी के प्रवाह मार्ग को अपना लेती है । सोनी नदी पूर्व काल में नेपाल की तराई भाग से बहकर आती हुई मधुबनी जिले के कुमरखत गाँव के पूरब तथा कमतौलिया के पश्चिम से होकर बहती थी तथा छौरही एवं बरुआर गाँव के पास होती हुई कमला के तटबंध में समा जाती थी । अब इसका नामोनिशान मिट चुका है । उक्त स्थान से सोनी के ही धारामार्ग से बहती हुई कमला बाबूबरही के पश्चिम ’पिपराघाट’ नामक प्रसिद्ध स्थान पर बलान नदी से मिलती है तथा उसके आगे बलान के अस्तित्व को समाप्त करती हुई उसी के धारामार्ग को अपना बनाकर वर्तमान में बह रही है । पिपराघाट के आगे वर्तमान में जो कमला का धारामार्ग है वह वस्तुतः पहले उक्त बलान नदी का ही धारामार्ग था । बलान को आत्मसात करने के बाद कमला की यह आधुनिक धारा भटगामा, बिथौनी, चपही, गंगाद्वार (गँगदुआर) तथा इमादपट्टी गाँव के पास पहुँचती है । इमादपट्टी के दक्षिण में मधुबनी से संग्राम नामक गाँव तक जाने वाला प्राचीन मार्ग कमला को पार करता है । यह घाट पहले बलान नदी का घाट था, परंतु अब यह कमला नदी का घाट कहलाता है । यही घाट कंदर्पी घाट नाम से प्रसिद्ध है। कंदर्पी घाट के पास से दक्षिण की ओर बहती हुई कमला महरैल गाँव तक पहुँचती है और फिर महिनाथपुर होती हुई झंझारपुर पहुँचती है । झंझारपुर में कमला नदी के ऊपर से रेलवे पुल है । इसके बाद कमला की यह आधुनिक धारा रतौल तथा गंगापुर नामक गाँव के पास से बहती हुई ’राजा खरवार’ के पश्चिम में आकर दक्षिण–पूर्व कोने में मुड़ती हुई जदुपट्टी, पड़री, दोहथा आदि गाँवों से बहती हुई सुप्रसिद्ध गाँव भीठ भगवानपुर तक पहुँचती है । भीठ भगवानपुर कमला से पूरब में स्थित है । दोहथा गाँव के पूरब में पहले बलान नदी तिलयुगा से मिलती थी, परंतु वे नदियाँ अब समाप्त हो गयी हैं तथा वहीं अब बलान को आत्मसात करने वाली कमला का संगम कोसी नदी से होता है । इस प्रकार कमला का मुहाना अब कोसी नदी से मिलकर बनता है ।
कोशी नदी
कोशी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है और बिहार में भीम नगर के रास्ते से भारत में दाखिल होती है । इसमें आने वाली बाढ से बिहार में बहुत तबाही होती है जिससे इस नदी को ’बिहार का अभिशाप’ कहा जाता है ।
इसके भौगोलिक स्वरूप को देखें तो पता चलेगा कि पिछले २५०वर्षों में १२० किमी का विस्तार कर चुकी है । हिमालय की ऊँची पहाडÞियों से तरह तरह से अवसाद (बालू, कंकड़–पत्थर) अपने साथ लाती हुई ये नदी निरंतर अपने क्षेत्र फैलाती जा रही है । उत्तरी बिहार के मैदानी इलाकों को तरती ये नदी पूरा क्षेत्र तबाह करती जाती है । नेपाल और भारत दोनों ही देश इस नदी पर बाँध बना चुके हैं, हालाँकि कुछ पर्यावरणविदों ने इससे नुकसान की भी आशंका जतायी थी ।
यह नदी उत्तर बिहार के मिथिला क्षेत्र की संस्कृति का पालना भी है । कोशी के आसपास के क्षेत्रों को इसी के नाम पर कोशी कहा जाता है । हिन्दू ग्रंथों में इसे कौशिकी नाम से उद्धृत किया गया है । कहा जाता है कि विश्वामित्र ने इसी नदी के किनारे ऋषि का दर्जÞा पाया था । वे कुशिक ऋषि के शिष्य थे और उन्हें ऋग्वेद में कौशिक भी कहा गया है । सात धाराओं से मिलकर सप्तकोशी नदी बनती है जिसे स्थानीय रूप से कोशी कहा जाता है । महाभारत में भी इसका जिक्र कौशिकी नाम से मिलता है ।
काठमाण्डू से सागरमाथा की चढ़ाई के लिए जाने वाले रास्ते में कोसी की चार सहायक नदियाँ मिलती हैं । तिब्बत की सीमा से लगा नामचे बाजÞार कोशी के पहाड़ी रास्ते का पर्यटन के हिसाब से सबसे आकर्षक स्थान है। अरुण, तमोर, लिखु, दूधकोशी, तामाकोशी, सुनकोशी, इन्द्रावती इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं ।
नेपाल में यह कंचनजंघा के पश्चिम में पड़ती है। नेपाल के हरकपुर में कोशी की दो सहायक नदियाँ दूधकोसी तथा सनकोसी मिलती हैं। सनकोसी, अरुण और तमर नदियों के साथ त्रिवेणी में मिलती हैं । इसके बाद नदी को सप्तकोशी कहा जाता है । बराह क्षेत्र में यह तराई क्षेत्र में प्रवेश करती है और इसके बाद से इसे कोशी कहा जाता है । इसकी सहायक नदियाँ सागरमाथा के चारों ओर से आकर मिलती हैं और यह विश्व के ऊँचाई पर स्थित ग्लेशियरों (हिमनदों) के जल लेती हैं । त्रिवेणी के पास नदी के वेग से एक खड्ड बनाती है जो लगभग १० किलोमीटर लम्बी है । भीमनगर के निकट यह भारतीय सीमा में दाखिल होती है । इसके बाद दक्षिण की ओर२६० किमी चलकर कुरसेला के पास गंगा में मिल जाती है ।
जब सप्तकोशी नदी की बाढ ने बिहार राज्य मेँ तवाही मचाना शुरू किया तब अंग्रेज शासकों ने कोशी तटबन्ध निर्माण कर बाढ नियन्त्रण का अध्ययन शुरू किया । सन १७७९ के आसपास मेजर जे. रेनल, सन् १८६३ में जेम्स फरगुसन और उनके बाद एफए सिलिङफिल्ड ने कोशी बाढ का अध्ययन किया । जब १८६९-७० के बाढ ने बिहार के पूर्णिया मे ताण्डव रचा तब अंग्रेज कोशी तटबन्ध बनाकर बाढ नियन्त्रण के निष्कर्ष पर पहुँचे ।
ब्रिटिशों ने नेपाल के उदयपुर जिला के बराह क्षेत्र में बाँध निर्माण का प्रस्ताव लाया । नेपाल के राणा प्रधानमन्त्री बीर शम्शेर ने बराह क्षेत्र से ५-६ किलोमीटर नीचे चतरा में बाँध निर्माण का सहमति दिया । ब्रिटिश राज खत्म होने के बाद स्वतन्त्र भारत सरकार इस प्रस्ताव को और गंभीर रूप से उठाया । ६अप्रैल१९४७ को निर्मली मे बाढ़ पीडि़तों का सम्मेलन हुआ था । जिसमे लगभग ६० हजार लोग सम्मिलित हुए थे । इस सम्मेलन मे डा. राजेन्द्र प्रसाद, श्रीकृष्ण सिंह, गुलजÞारीलाल नन्दा, ललित नारायण, हरिलाल आदि देश के बड़े नेता शामिल हुए थे । योजना मन्त्री सी एच भाभा ने कोसी पर बराह मे बाँध के निर्माण की घोषणा की । इससे १२ लाख हेक्टर सिचाई होगी तथा ३३०० मेगावाट बिजली बनेगी । विभिन्न चरण के बिचार–विमर्श और अध्ययन के बाद बीपी कोइराला के प्रधानमन्त्री बनने पर कोशी और गण्डक नदी में बाँध निर्माण के सम्झौते हुए ।१९५४ मे औपचारिक रूप से कोशी परियोजना का निर्माण का काम शुरु कर दिया गया । नेपाल भारत सीमावर्ती हनुमाननगर में सन् १९६५ में कोशी बाँध निर्माण सम्पन्न हुआ ।
कोशी नदी पर सन १९५८ एवं १९६५के बीच बाँध बनाया गया। यह बाँध भारत(नेपाल सीमा के पास नेपाल में स्थित है । इसमें पानी के बहाव के नियंत्रण के लिये ५२ द्वार बने हैं जिन्हें नियंत्रित करने का कार्य भारत के अधिकारी करते हैं । इस बाँध के थोड़ा आगे (नीचे) भारतीय सीमा में भारत ने तटबन्ध बनाये हैं ।
लालबकेया
यह नदी नेपाल में हेटौड़ा के पास चूरे पर्वतमाला से १५२५ मीटर की ऊँचाई से निकलती है । १०९ किलोमीटर लम्बी यह सदानीरा नदी नेपाल में लगभग८०किलोमीटर की दूरी तय करके नेपाल के गौर बाजार कस्बे के पश्चिम से भारत में प्रवेश करती है । भारत में इसका प्रवेश सीतामढ़ी जिले के बैरगनियां कस्बे के पश्चिम गुआबाड़ी गाँव में होता है । भारत–नेपाल सीमा से २९ किलोमीटर दक्षिण जाकर यह नदी खोरीपाकर गाँव में बागमती से उसके दाहिने किनारे पर संगम कर लेती है । इस नदी का कुल जल ग्रहण क्षेत्र८९६ वर्ग किलोमीटर है । गर्मी के मौसम में नदी का प्रवाह बहुत कम हो जाया करता है । लालबकेया के पश्चिमी किनारे की जमीन ऊपर की ओर उठी हुई है मगर पूर्वी किनारे की जमीन कुछ दबी हुई है । इस वजह से बरसात के मौसम में नदी का पानी पूर्वी किनारे पर ही छलकने का प्रयास करता है । इस नदी में किनारों के कटाव की भी गंभीर समस्या है । नदी के भारतीय भाग में इसके दोनों किनारों पर तटबन्ध बने हुए हैं जिनका अब विस्तार नेपाल में भी कर दिया गया है । लालबकेया के पूर्वी तटबन्ध को किसी भी प्रकार की क्षति पहुँचने पर बाढ़ का सारा पानी नेपाल के रौतहट जिले के मुख्यालय गौर बाजार और भारत के सीतामढ़ी जिले के बैरगनियाँ शहर और उसके प्रखण्ड के गाँवों में घुस कर तबाही मचाता है ।
१८९६-९७ में बिहार में भयंकर अकाल पड़ा था और तब इस नदी के पानी से सिंचाई करने की बात सोची गयी यद्यपि सिंचाई से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण काम उस समय लोगों को रोजगार मुहैया करना था । गंडक सर्किल के सुपरिन्टेंडिंग इंजीनियर बकली के अनुरोध पर बटलर नाम के एक इंजीनियर ने नदी पर एक वीयर बना कर नहर निकालने का प्रस्ताव किया जिससे खरीफ के मौसम में चम्पारण जिले के ढाका और पताही प्रखंडों की लगभग ६००० हेक्टेयर तथा रबी के मौसम में२०००हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई करने की योजना थी । परियोजना में नदी के दाहिने किनारे पर छ.द्द किलोमीटर लम्बी मुख्य नहर और५-२किलोमीटर लम्बी दो शाखा नहरें निकालने का प्रस्ताव था । बाद में यह महसूस किया गया कि इतनी जमीन सींचने के लिए जितना पानी चाहिये उतना नदी में था नहीं । फिर भी यह नहरें उतनी ही क्षमता की बनाई गईं । इनका निर्माण मार्च १९०१ में शुरू किया गया और १९०४ में पूरा कर लिया गया था । इस नहर से नील की खेती तथा गन्ने की फसल को सींचने का अनुमान लगाया गया था ।
१९३४के बिहार भूकम्प के समय इस नहर की संरचना को काफी नुकसान पहुँचा था और इससे नहर की सिंचाई क्षमता काफी हद तक प्रभावित हुई थी । आज कल इस नहर प्रणाली से पूर्वी चम्पारण जिले की ४४५० हेक्टेयर के आस(पास सिंचाई किये जाने की बात कही जाती है और तब से अब तक इस नहर प्रणाली के आधुनिकीकरण की बात चल रही है ।
लखनदेई
कहा जाता है कि इस नदी का मौलिक नाम लक्ष्मणावती है परन्तु हवलदार त्रिपाठी ‘सहृदय’ के अनुसार इस नदी का नाम लक्ष्मणा देवी ज्यादा जंचता है । उनका यह भी मानना था कि इस नदी का नाम मैथिल कोकिल विद्यापति की काव्य नायिका लखिमादेई के नाम पर लखनदेई पड़ा है । यह नदी नेपाल में हिमालय के निचले हिस्से में मरिन खोला से निकलती है । २८२ किलोमीटर लम्बी इस नदी का ऊपरी ११२ किलोमीटर नेपाल में पड़ता है । कुल मिलाकर १०६१ वर्ग किलोमीटर जल ग्रहण क्षेत्र वाली इस नदी की बाकी १७०किलोमीटर लम्बाई भारत (बिहार) में पड़ती है और अनुमान किया जाता है कि इस नदी का अधिकतम प्रवाह ३०० क्यूसेक के आसपास होता है। यह नदी आजकल बागमती में बायें किनारे पर मुजफ्फरपुर जिले के कटरा प्रखंड के बकुची–अख्तियारपुर गाँव में मिल जाती है । इस तरह बकुची–अख्तियारपुर में आजकल लखनदेई का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और यहाँ से आगे इस धारा को नये लोग बागमती ही कहने लगे हैं । बड़े–बुजुर्गों के बीच में दरभंगा जिले के कनौजर घाट तक बागमती की धारा लखनदेई के नाम से ही प्रसिद्ध है । १९५४ में बिहार सरकार ने दरभंगा जिले में नदी के निचले हिस्से में लखनदेई की धारा की उड़ाही का काम करवाया था जिसमें उसे कोई खास सफलता नहीं मिली वरन् उसने दूसरी समस्याओं को ही जन्म दिया ।
लखनदेई नदी दक्षिणी नेपाल और भारत के बिहार राज्य में बहने वाली एक नदी है । यह बागमती की एक सहायक नदी है । लखनदेई नदी, नेपाल में इस नदी की मुख्य धारा ’सर्लाही जिल्ला’ तथा इसका स्रोत ’शिवालिक हिल्स’ है । यह नदी नेपाल के बाद भारत में बिहार के सीतामढ़ी जिले में प्रवेश करती है और सीतामढ़ी शहर से होते हुये मुजफ्फरपुर जिले के कटरा में बागमती नदी में विलय हो जाती है । यह नदी बाढ़ की विभीषिका के लिए जानी जाती है । वर्तमान में इस नदी का जो भाग सीतामढ़ी नगर से होकर प्रवाहित होता है, वह नदी का पुराना एवं मृत धार हो गया है । भारत–नेपाल सीमा के ८ किलोमीटर उतर नेपाल भूभाग से ही नदी तल सिल्टेड है, जिसके कारण नदी अपनी पूर्व की दिशा बदलते हुए अधवारा समूह की जमुरा नदी में मिल गई है ।
बकुची–अख्तियारपुर में बागमती और लखनदेई का संगम स्थल ।
इस नदी में पानी का प्रवाह तो बहुत ज्यादा नहीं रहता है मगर जो भी पानी बरसात में इस नदी में आता है वह दोनों किनारों को तोड़ कर बहता हुआ काफी तबाही पैदा करता है । नदी के किनारों पर कहीं–कहीं आसपास के ग्रामीणों या पुराने समय के जमीन्दारों ने तटबन्ध बना रखे थे जिनका सरकार के अनुसार कोई डिजाइन या क्रम नहीं था । कहीं यह तटबन्ध नदी के बाईं तरफ हैं तो कहीं दाहिनी तरफ या फिर दोनों तरफ । एक अच्छी खासी लम्बाई में तटबन्ध कहीं भी नहीं हैं । बताया जाता है कि इन तटबन्धों में से कुछ का निर्माण दरभंगा राज की ओर से भी किया गया था क्योंकि नदी के बायें किनारे से छलकता हुआ बरसाती पानी दरभंगा शहर और महाराजा दरभंगा के महल तक चोट करता था । २००६ में बिहार सरकार ने एक कानून बना कर जमीन्दारों और रियासतों द्वारा बनाये गए तटबन्धों के रखरखाव और मरम्मत का काम, जो कि तब तक राजस्व विभाग देखा करता था, उससे लेकर राज्य के जलसंसाधन विभाग के सुपुर्द कर दिया था । यह एक अलग बात है कि २००९ में जब लखनदेई के तटबन्धों में दरार पड़ी तो राज्य सरकार साफ मुकर गयी कि यह तटबन्ध किसी भी मायने में जलसंसाधन विभाग से सम्बद्ध हैं । फिलहाल, २०१० में राज्य सरकार के जलसंसाधन विभाग द्वारा लखनदेई के तटबन्धों के निर्माण का काम शुरू हुआ है ।
बहरहाल, सांस्कृतिक दृष्टि से बागमती की तरह लखनदेई भी एक बहुत महत्वपूर्ण नदी है । यह नदी बिहार के सीतामढ़ी जिले से होकर बहती है और सीतामढ़ी के जिला मुख्यालय के बीच से इस नदी का प्रवाह होता है । ऐसी मान्यता है कि जगतजननी माँ सीता का जन्म यहीं हुआ था । कहा जाता है कि सीरध्वज जनक के राज्य काल में इस क्षेत्र में एक बार बारह वर्षों की अनावृष्टि के कारण भयंकर अकाल पड़ा । ऋषिमुनियों, पुरोहितों और विद्वानों का सुझाव था कि अगर राजा जनक खेतों में स्वयं हल चलायें तो वर्षा होगी । राजा के लिए जो हल बनवाया गया उसमें सोने का फाल लगाया गया था और निर्धारित समय पर राजा हल चलाने के लिए खेत में उतरे । हल चलाने के क्रम में यह फाल जमीन में गड़े एक मटके से टकराया । मटके में राजा को एक कन्या दिखाई पड़ी । हल के फाल (सीता) से टकरा कर उत्पन्न हुई कन्या का नाम राजा ने सीता ही रख दिया । जनक (विदेह) की पुत्री होने के कारण उस कन्या को जानकी और वैदही भी कहा जाता है ।
अधवारा समूह की नदियाँ
पश्चिम में बागमती तथा पूरब में कमला के बीच छोटी–छोटी नदियों का एक समूह सक्रिय है जो कि उत्तर में नेपाल से भारत (बिहार) में प्रवेश करता है और मुख्यतः तीन धाराओं में बंटा हुआ दिखाई पड़ता है । इन नदियों को आमतौर पर अधवारा समूह की नदियों के नाम से पुकारा जाता है । भारतीय भाग में इन नदियों के विस्तार क्षेत्र में सीतामढ़ी जिले का उत्तर–पूर्वी भाग, मधुबनी जिले का पश्चिमी भाग और दरभंगा जिले का उत्तर–पश्चिम वाला क्षेत्र आता है । इसमें सीतामढ़ी जिले के पुपरी, सोनबरसा, परिहार, सुरसंड, बथनाहा और बाजपट्टी, मधुबनी जिले के हरलाखी, मधवापुर, बासोपट्टी, बेनीपट्टी, बिसफी तथा रहिका प्रखंड का कुछ भाग और दरभंगा जिले के केवटी, जाले, सदर, सिंहवारा, बहादुरपुर, हनुमान नगर और हायाघाट प्रखण्ड आते हैं। आगे चल कर सभी नदियाँ एक दूसरे में समाती हुई दरभंगा–बागमती के नाम से हायाघाट के पास बागमती में मिल जाती हैं ।
अधवारा समूह की पहली मुख्य धारा में जमुरा, झीम, अधवारा, शिकाओ, बुढ़नद, मोहिनी और खिरोई नदियों का नाम आता है । इस समूह की नदियों में सबसे पहला नाम झीम नदी का आता है जो नेपाल की सीमा के अन्दर कलिन्जोर खोला और कुलिजर खोला के सम्मिलित प्रवाह से निर्मित होती है । झीम का उद्गम समुद्र तल से प्रायः ६१० मीटर ऊपर शिवालिक पर्वत माला में होता है । सीतामढ़ी जिले में भारतीय सीमा से लगभग १६ किलोमीटर दक्षिण में झीम के बायें किनारे पर सिंघबाहिनी, अधवारा, गोगा और बांकी नदियों का सम्मिलित प्रवाह अधवारा के माध्यम से इसमें आ मिलता है और तब इस सम्मिलित धारा का नाम अधवारा हो जाता है । सोनबरसा के पास अधवारा से भटवलिया के निकट दाहिने किनारे पर जमुरा नदी संगम करती है । जमुरा नदी खुद लखनदेई के पूरब एक चैर से निकलती है । लखनदेई के पूरब एक दूसरे चैर से निकली शिकाओ नदी बाजपट्टी के उत्तर में अधवारा नदी से दाहिने किनारे पर आ मिलती है । इसी तरह पुपरी के उत्तर–पश्चिम से भदई चैर नाम की श्रृंखला से निकली हुई एक नदी बुढ़नद, ऐग्रोपट्टी होते हुए रानीपुर गाँव के पास अधवारा (अब इसका नाम खिरोई है) से आकर मिल जाती है । यहाँ से खिरोई नदी पहले पुपरी–बेनीपट्टी मार्ग को पार करती है और फिर घोघराहा–कमतौल मार्ग तथा कमतौल रेलवे स्टेशन से लगभग ज्ञ.ट किलोमीटर उत्तर में दरभंगा–सीतामढ़ी रेलवे लाइन को पार करती है । इसके दाहिने किनारे पर नीचे चल कर केतुका गाँव के पास मोहिनी नदी मिलती ह ै। मोहिनी नदी में कुछ पानी लखनदेई नदी से छलक कर भी आ जाता है और कुछ पानी इसके स्थानीय जल–ग्रहण क्षेत्र से भी रहता है । केतुका से दक्षिण दिशा में जाती हुई खिरोई नदी मुजफ्फरपुर–दरभंगा मार्ग को शोभन गाँव के पास पार करती है और अन्ततः एकमीघाट के पास दरभंगा–बागमती में मिल जाती है।
अधवारा समूह की इन नदियों में खिरोई जिसका आदि नाम क्षीरोदकी था, बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है । कमतौल के दक्षिण इस नदी के पश्चिम किनारे पर ब्रह्मपुर तथा पूरब में अहियारी नाम के गाँव पड़ते हैं । कहते हैं कि ब्रह्मपुर गाँव में ही गौतम ऋषि का आश्रम हुआ करता था । विश्वामित्र के साथ सिद्धाश्रम से मिथिला जाने के क्रम में राम और लक्ष्मण गौतम आश्रम से गुजरे थे । वीरान पड़े इस आश्रम के बारे में राम ने विश्वामित्र से जिज्ञासा की थी जिसके उत्तर में विश्वामित्र ने बताया कि गौतम की पत्नी अहल्या के साथ देवराज इन्द्र ने गौतम का रूप धारण करके छल से सम्भोग किया था । इस संबंध के प्रति कहीं न कहीं अहल्या की भी स्वीकृति थी क्योंकि रूप बदलने के बाद भी अहल्या ने देवराज इन्द्र को पहचान लिया था मगर इन्द्र का सानिध्य पाने के लिए वह कमजोर पड़ गयी । इसी बीच जंगल में गए गौतम ऋषि वापस लौट आये । उन्होंने इन्द्र को अण्डकोष विहीन होने का शाप दिया तथा अपनी पत्नी को भी शाप दिया, ‘‘दुराचारिणी! तू भी यहाँ कई हजार वर्षों तक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राख में पड़ी रहेगी । समस्त प्राणियों से अदृश्य रह कर इस आश्रम में निवास करेगी । जब दुर्धर्ष दशरथ कुमार राम इस घोर वन में पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी । उनका आतिथ्य सत्कार करने से तेरे लोभमोह आदि दोष दूर हो जायेंगे और तू प्रसन्नता पूर्वक मेरे पास पहुँच कर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी ।’’ ऐसा कह कर गौतम ऋषि अपना आश्रम छोड़ तपस्या करने के निमित्त हिमालय की ओर कूच कर गए । विश्वामित्र ने राम को देवरूपिणी महाभागा अहल्या का उद्धार करने का आदेश दिया और राम ने उन्हें शाप मुक्त कर दिया । कहते हैं अहियारी ही वह स्थान है जहाँ अहल्या ने पुनः अपना शरीर प्राप्त किया था और गौतम ऋषि ने उन्हें पुनः स्वीकार किया था ।
अधवारा समूह की नदियों का सूचक मानचित्र
अधवारा समूह के दूसरे अंश के रूप में माढ़ा तथा रातो नदियों का नाम आता है । दोनों नदियाँ नेपाल में क्रमशः ६१० मीटर ऊँचाई से निकलती हैं । माढ़ा नदी में बहुत सी छोटी छोटी नदियों का पानी आता है और यह सुरसण्ड से ७ किलोमीटर पूरब में भारत में प्रवेश करती है । माढ़ा में रघपुरा के पास हरदी, रसलपुर के पास संघी और निहसा के पास रातो नदी आकर मिलती है । हरदी नदी खुद बरवे और कन्टावा आदि नदियों से मिल कर बनती है । कहते हैं कि बरवे का मूल नाम व्याघ्रवती है यद्यपि बागमती या अधवारा समूह की किसी भी नदी को स्थानीय लोग व्याघ्रमती बताना नहीं भूलते क्योंकि यह सारी नदियाँ बाघ (व्याघ्र) की ही तरह झपट्टा मारने के लिए मशहूर हैं । इसके बाद इन दोनों नदियों की सम्मिलित धारा सुरसरी के नाम से दक्षिण–पूर्व दिशा में चलकर धौंस नदी में मिल जाती है। रातो एक पहाड़ी नदी होने के बावजूद सदानीरा नदी है ।
अधवारा नदी समूह का तीसरा मुख्य अंश धौंस, थोमने, जमुनी, बिघी और दरभंगा–बागमती का है । धौंस, नेपाल में तराई के पास की पहाडि़यों से निकलती है और इसमें बिघी, घोघरा, हरदीनाथ, जमुने और थोमने आदि नदियाँ आकर मिलती हैं । इनमें से जमुने नदी नेपाल में जनकपुर जिले के उत्तरी भाग से निकलती है और भारत के मधुबनी जिले में हरलाखी से तीन किलोमीटर उत्तर–पूर्व में प्रवेश करती है । इसके किनारे बिसौल नाम का एक गाँव पड़ता है जिसके बारे में कहा जाता है कि जब विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को सिद्धाश्रम से जनकपुर ले जा रहे थे तब उन्होंने इस गाँव में विश्राम किया था । यहीं से दोनों भाई फूल लाने के लिए ‘फुलहर’ गए थे जहाँ सीता जी भी गिरिजा का पूजन करने के लिए आयी थीं । राम ने सीता को पहली बार यहीं देखा था । फुलहर का मूल नाम पुष्पहर है और यहीं राजा जनक की फुलवारी थी, ऐसा कहा जाता है । घोघरा और बिघी का संगम भारत–नेपाल सीमा के थोड़ा ऊपर होता है जबकि हरदीनाथ और जमुने एक दूसरे से प्रायः दोनों देशों की सीमा पर ही आकर मिलती हैं । धौंस के साथ माढ़ा–रातो समूह की नदियों का संगम मधुबनी जिले के बेनीपट्टी अनुमण्डल में त्रिमुहान घाट के पास होता है जबकि बुढ़नद (अधवारा, जमुरा और शिकाओ की सम्मिलित धारा) से धौंस का संगम करहारा घाट के पास होता है ।
सौलीघाट से थोड़ा उत्तर में धौंस में थोमने नदी आकर उसके बायें किनारे पर संगम करती है । थोमने से संगम के बाद धौंस का नाम दरभंगा–बागमती (व्याघ्रमती) हो जाता है जिसमें आगे चल कर कमला नदी की दो छाड़न धाराएं मिलती हैं । इनमें से पहली धारा का नाम सरसों कमला या बछराजा धार है जो रथौस में धौंस से मिलती है और दूसरी धारा का नाम छजरी कमला है जो कमलाबाड़ी के पास धौंस के बाएं किनारे पर आ मिलती है । बछराजा नदी कमला की एक छाड़न धारा है जो जयनगर से लगभग २० किलोमीटर उत्तर नेपाल में कमला के दाहिने किनारे से निकलती है । बरसात के मौसम में नदी के प्रवाह में अपने जलग्रहण क्षेत्र से आने वाले पानी के साथ–साथ कमला नदी से छलकने वाला पानी भी शामिल हो जाता है । दरभंगा–बागमती कमतौल और रघौली होते हुए एकमी घाट पहुँचती है । यहाँ उसके दाहिने किनारे पर खिरोई नदी आकर मिल जाती है और अब अधवारा नदी का सारा पानी दरभंगा–बागमती के माध्यम से हायाघाट के पास दरभंगा–समस्तीपुर रेल लाइन की पुल संख्या १७ के उत्तर में बागमती नदी से मिल जाता है । अधवारा समूह की नदियों का हायाघाट तक कुल जल ग्रहण क्षेत्र ४९०८ वर्ग किलोमीटर है जिसमें से २३३७ वर्ग किलोमीटर नेपाल में पड़ता है । यहीं से बागमती का नाम करेह हो जाता है । इस स्थान के आगे की नदी की संरचना के बारे में हम पहले ही बता आये हैं । यह क्षेत्र उत्तर में भारत नेपाल सीमा, दक्षिण में हायाघाट के पास करेह नदी, पूर्व में बेनीपट्टी में कमला नदी तथा पश्चिम में सीतामढ़ी जिले में लखनदेई नदी से घिरा हुआ है जिसका रकबा ३००० वर्ग कि.मी. के लगभग है और इन सीमाओं के बीच लगभग ७५० गाँव बसते हैं। बिहार के जिन जिलों से होकर ये नदियाँ गुजरती हैं । क्रमश…

