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व्यक्तिवादी सोंच समाज और राष्ट्र के लिए कैन्सर है : आरपी सिंह

 

ई. आरपी सिंह, गोलबजार-१३, सिरहा | व्यक्तिवादी सोंच एवं इसकी बढ़ावा केबल एक समूह, संगठन के लिए ही हानिकारक नहीं होता अपितु समाज, राष्ट्र और मुल्क के लिए कैन्सर की तरह होता हैं | चूंकि व्यक्तिवाद व्यक्ति विशेषाधिकारों को प्राप्त करता है और अपने व्यक्तिगत महत्वकांक्षा पर केन्द्रित रहते हैं, वह समाज को नहीं देख पाता हैं और अन्ततः बिद्रोह होता हैं या फिर वैसे व्यक्ति, समूह, संगठन पतन की ओर अग्रसर हो जाता है |

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ऐसी व्यबस्था में लोकतान्त्रिक की प्रक्रिया की बात उठाने वाले लोगों को असंतुष्ट पक्ष करार दिया जाता है | लोगों को फिर से अपने चंगुल में फसाने हेतु वार्ता/संबाद समूह गठन की ढोंग रचा जाता है जिसमे अपने ही चमचे/झोले को रखा जाता है और वह समूह वैसे व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रवक्ता के काम करता हैं | फिर भी जीत अन्ततः लोकतान्त्रिक बिधि की ही होती है |

इसे निजाद पाने हेतु ही लोकतन्त्र की अवधारणा आया | इसमें एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा से अधिक सामाजिक, सामूहिक निर्णय/सोंच को बढ़ावा दिया जाता हैं | प्रत्यक्ष लोकतन्त्र में तो इसे अधिक ही लोगों की सामूहिक फैसला को हमेशा कद्र किया जाता हैं |

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आज की बात की जाए तो व्यक्तिबादी सोंच के व्यक्ति/संगठन को अपने हर प्रवृति में संशोधन करना लाजिम है वरना उनका पतन निश्चित हैं |

ई. आरपी सिंह
गोलबजार-१३, सिरहा

 

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